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#❤️जीवन की सीख 🥺🖤😔
❤️जीवन की सीख - 46,/ 1:30 (अरे, खाकर डकार मारने वालों सुनो) हर पिता अपनी बेटी की शादी में खर्चा, अपनी औकात से बाहर जाकर करता है। मगर फिर भी खाने वाले और आने वाले, ये कहकर नुक़्स निकाल देते हैं, कि इसमें क्या बड़ाई है इतना तो सब करते हैं। अरे.. खाकर डकार मारने वालो, जरा इतना तो सोच लिया करो, क़र्ज़ के नीचे दबी उस पिता की पगड़ी को, एक नज़र तो देख लिया करो! क्योंकि आपको नहीं पता. क्या-्क्या बेचकर इस पिता ने, अपनी आन बचाई है! बेटी को कोई ताना ना दे, इसलिए खुद को झुकाकर... उसकी शान बड़ाई है। | कविता केशव 190 कविता केशव AK Follow Anuradha Paudwal अरे, खाकर डकार मारने वालों एक more Add a comment 46,/ 1:30 (अरे, खाकर डकार मारने वालों सुनो) हर पिता अपनी बेटी की शादी में खर्चा, अपनी औकात से बाहर जाकर करता है। मगर फिर भी खाने वाले और आने वाले, ये कहकर नुक़्स निकाल देते हैं, कि इसमें क्या बड़ाई है इतना तो सब करते हैं। अरे.. खाकर डकार मारने वालो, जरा इतना तो सोच लिया करो, क़र्ज़ के नीचे दबी उस पिता की पगड़ी को, एक नज़र तो देख लिया करो! क्योंकि आपको नहीं पता. क्या-्क्या बेचकर इस पिता ने, अपनी आन बचाई है! बेटी को कोई ताना ना दे, इसलिए खुद को झुकाकर... उसकी शान बड़ाई है। | कविता केशव 190 कविता केशव AK Follow Anuradha Paudwal अरे, खाकर डकार मारने वालों एक more Add a comment - ShareChat