My Bite
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बस एक कशीस और......
दिले-ए-जान निकल जाए।
हथियार बदल गए हैं अभी,
पर कम्बख्त के अंदाज नही।
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बम गोला बारूद लोलीं के
हांथों से निकाले गए,
उफ्फ उ कर गोली हाय रे बन्दूक
पगलीं के आँखों से मारे गए।
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ये इश्क फरमाना कहाँ से सिखा,
ऐ दिल..................।
कम्बख्त समझ नही आता कुछ,
कर्जदार कौन है गुनहगार कौन है।
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इन हिचकियों को भी,
हमसे बहुत प्यार है सनम।
जब भी आती हैं...
नाम जाना पहचाना होता है।
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हुस्न इश्क पे पता नही,
अब क्या-क्या रंग लाएगा।
अभी तो इश्क-ए- बुखार है,
शायद कल उतर जाएगा।
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बंद करदो इन आइनो को,
पल-पल ही देखना सनम।
इन्हें कोई मसखरा देखे,
हमे गँवारा.............नही।
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डर लगता है तेरी हर बातों से,
ये पागलपन.........
फिर हमे कही आशिक न बना दे।
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कत्ल होने की भी एक,
खास वजह होती है....
और कम्बख्त इश्क भी,
सबको ही बेवजह होती है!
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अजब है दास्तान इस दिले बेहाल का,
किसी ने देखा तक नही.....
और हम दिल-ए-हसरत के,
बेबस बरबस गुलाम हुए बैठे हैं।।
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चलने दे इश्क के खंजरों को,
इन्हें नाराज न कर...
रूह सुकून में रहे कुछपल
पगली बस आवाज न कर।
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ये हसीन से ख्वाब है,
हम रहते इनके राहों मे।
कभी हम इसके बाहों मे,
कभी ये हमारी बाहों मे।
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आज फिर से जमकर के,
खंजर चलाया है उसने।
ओठो को रखकर गुलाब पे,
दिल को फिर से जलाया है उसने।
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सही तो कहा है तुमने,
मुस्कुराना सिखा था तुमसे।
अब तुम साथ नही तो......
बस हँसकर काम चला लेते हैं।
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ऐ हुस्न हम गजल अब,
क्या लिखेँ तुझपे..........
कल से प्यार जताना,
छोर दिया है है पगलीं ने!
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दूर होकर भी यादों मे कोई समाने लगे,
गैर होकर भी अपना कोई बनाने लगे।
बेताब हो जाए कसम से जान निकल जाए,
मर जाए कोई भी......
जब चाँद भी देखकर खुदसे मुस्कुराने लगे।।💕💞
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............✍रवि प्रताप सिंह("पंकज")🍒
🌳🌳🌳🌳🌳मनमोहन🌳🌳🌳🌳🌳
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