sn vyas
#💐विनायक चतुर्थी 💐 #विनायक चतुर्थी
अनिरुद्ध विनायक चतुर्थी 17 जुलाई
〰️〰️🌼〰️〰️🌼🌼〰️〰️🌼〰️〰️
अनिरुद्ध विनायक चतुर्थी व्रत शुक्रवार, 17 जुलाई 2026 को रखा जायेगा ।
भगवान श्री गणेश जी को चतुर्थी तिथि का अधिष्ठाता माना जाता है तथा ज्योतिष शात्र के अनुसार इसी दिन भगवान गणेश जी का अवतरण हुआ था इसी कारण चतुर्थी भगवान गणेश जी को अत्यंत प्रिय रही है। विघ्नहर्ता भगवान गणेश समस्त संकटों का हरण करने वाले होते हैं. इनकी पूजा और व्रत करने से सभी कष्ट दूर हो जाते हैं।
प्रत्येक चंद्र माह में दो चतुर्थिया पड़ती हैं। हिंदू धर्मग्रंथों के अनुसार चतुर्थी भगवान गणेश की तिथि है। शुक्ल पक्ष के दौरान अमावस्या या अमावस्या के बाद की चतुर्थी को विनायक चतुर्थी के रूप में जाना जाता है और कृष्ण पक्ष के दौरान पूर्णिमा के बाद पड़ने वाले चतुर्थी को संकष्टी चतुर्थी के रूप में जाना जाता है।
चतुर्थी पूजा मुहूर्त
〰️〰️〰️〰️〰️〰️
चतुर्थी तिथि प्रारम्भ: 17 जुलाई, प्रातः 06:27 बजे से।
चतुर्थी तिथि समाप्त: 18 जुलाई, प्रातः 04:42 बजे तक।
चतुर्थी मध्याह्न मुहूर्त: प्रातः 11:05 बजे से दोपहर 01:50 बजे तक ।
वर्जित चन्द्रदर्शन समय: प्रातः 08:37 बजे से रात्रि 09:33 बजे तक ।
हिंदू पंचांग में भगवान गणेश की उपासना के लिए चतुर्थी तिथि को सबसे उत्तम माना गया है। हर महीने के कृष्ण पक्ष में ‘संकष्टी चतुर्थी’ और शुक्ल पक्ष में ‘विनायक चतुर्थी’ का व्रत रखा जाता है। गणेश पुराण और मुद्गल पुराण के अनुसार, साल के बारह महीनों में आने वाली विनायक चतुर्थी के दिन भगवान गणेश के अलग-अलग नामों और स्वरूपों की पूजा की जाती है।
इसी क्रम में, आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को ‘अनिरुद्ध विनायक चतुर्थी‘ के नाम से जाना जाता है। इस दिन विघ्नहर्ता श्री गणेश के ‘अनिरुद्ध’ स्वरूप की आराधना की जाती है।
अनिरुद्ध‘ स्वरूप का अर्थ और महत्व
〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️
संस्कृत भाषा में ‘अनिरुद्ध‘ का अर्थ होता है- “जिसे कोई रोक न सके” (Unstoppable) या “बाधारहित”। भगवान गणेश का यह स्वरूप अत्यंत शक्तिशाली और अजेय माना गया है।
इस दिन भगवान गणेश के अनिरुद्ध स्वरूप की पूजा करने का विशेष महत्व है:
निर्बाध सफलता:
〰️〰️〰️〰️〰️〰️जो व्यक्ति किसी नए कार्य, व्यापार या प्रोजेक्ट की शुरुआत कर रहा हो और उसमें बार-बार रुकावटें आ रही हों, उसे अनिरुद्ध विनायक चतुर्थी का व्रत अवश्य करना चाहिए। इस व्रत के प्रभाव से सभी बाधाएं अपने आप दूर हो जाती हैं।
संकल्प की पूर्ति: अनिरुद्ध स्वरूप इच्छाशक्ति (Willpower) का प्रतीक है। इस दिन पूजा करने से व्यक्ति का मानसिक बल बढ़ता है और वह अपने लक्ष्यों को आसानी से प्राप्त कर लेता है।
शत्रु और नकारात्मकता का नाश:
〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️भगवान गणेश का यह अजेय स्वरूप जीवन की हर नकारात्मक ऊर्जा और शत्रुओं के बुरे प्रभाव को समाप्त कर देता है।
विनायक चतुर्थी पूजा और ‘मध्याह्न काल‘
〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️
यहाँ यह जानना अत्यंत महत्वपूर्ण है कि संकष्टी चतुर्थी (कृष्ण पक्ष) में जहाँ चंद्र दर्शन और शाम की पूजा का महत्व होता है, वहीं विनायक चतुर्थी (शुक्ल पक्ष) में पूजा हमेशा ‘मध्याह्न‘ (दोपहर के समय) की जाती है। शास्त्रों के अनुसार, भगवान गणेश का प्राकट्य दोपहर के समय ही हुआ था, इसलिए मध्याह्न काल की पूजा सबसे अधिक फलदायी मानी जाती है।
अनिरुद्ध विनायक चतुर्थी पूजा विधि
〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️
इस दिन व्रत रखकर दोपहर के समय भगवान गणेश की विधि-विधान से पूजा करनी चाहिए। इसकी सरल पूजा विधि इस प्रकार है:
प्रातः कालीन स्नान और संकल्प: सुबह जल्दी उठकर स्नानादि कर लें। स्वच्छ (लाल या पीले) वस्त्र धारण करें और हाथ में जल तथा पुष्प लेकर व्रत का संकल्प लें।
पूजा स्थल की तैयारी: दोपहर (मध्याह्न) के समय घर के मंदिर या ईशान कोण (उत्तर-पूर्व) में एक लकड़ी की चौकी रखें। उस पर लाल कपड़ा बिछाकर भगवान गणेश की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें।
अभिषेक और श्रृंगार: गणपति बाप्पा को शुद्ध जल और पंचामृत से स्नान कराएं। उन्हें कुमकुम या सिंदूर का तिलक लगाएं।
दूर्वा और पुष्प अर्पण: भगवान गणेश को उनकी अति प्रिय ‘दूर्वा‘ (हरी घास) की 21 गांठें अर्पित करें। लाल रंग के पुष्प (विशेषकर गुड़हल) चढ़ाएं और जनेऊ पहनाएं।
भोग (नैवेद्य)👉 गणेश जी को मोदक, मोतीचूर के लड्डू, ऋतुफल और नारियल का भोग लगाएं।
मंत्र जाप👉 पूजा के समय रुद्राक्ष या चंदन की माला से “ॐ अनिरुद्धाय नमः” या “ॐ गं गणपतये नमः” मंत्र का 108 बार जाप करें।
कथा और आरती👉 विनायक चतुर्थी की व्रत कथा पढ़ें और अंत में धूप-दीप से कपूर जलाकर भगवान गणेश की आरती करें।
व्रत के नियम और ‘चंद्र दर्शन निषेध‘
विनायक चतुर्थी के व्रत में कुछ विशेष नियमों का पालन करना अनिवार्य है:
चंद्र दर्शन की मनाही👉 हिंदू धर्म शास्त्रों के अनुसार, शुक्ल पक्ष की चतुर्थी के दिन चंद्रमा के दर्शन करना सख्त वर्जित है। पौराणिक कथा के अनुसार, भगवान गणेश ने चंद्रमा को उनके रूप के अहंकार के कारण श्राप दिया था। मान्यता है कि जो भी व्यक्ति इस दिन चंद्रमा के दर्शन करता है, उस पर ‘मिथ्या कलंक’ (झूठा आरोप) लगने का भय रहता है।
फलाहार का नियम👉 यह व्रत पूरे दिन रखा जाता है। व्रती (व्रत रखने वाला व्यक्ति) पूरे दिन अन्न का सेवन नहीं करता। शाम को फलाहार (फल, दूध, साबूदाना आदि) ग्रहण किया जा सकता है।
सात्विकता: इस दिन घर में तामसिक भोजन (लहसुन, प्याज, मांस, मदिरा) का सेवन नहीं करना चाहिए और मन में किसी के प्रति बुरे विचार नहीं लाने चाहिए।
षोडशोपचार पूजा विधि
〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️
इस व्रत की शुरुआत सूर्योदय से पूर्व या सूर्योदय काल से ही करनी चाहिए। सूर्यास्त से पहले ही गणेश विनायक चतुर्थी व्रत कथा-पूजा होती है। गणेश जी को दूर्वा तथा लड्डू अत्यंत प्रिय है अत: गणेश जी पूजा में दूर्वा और लड्डू जरूर चढ़ाना चाहिए साथ मे गुड़, गन्ने और मूली का उपयोग भी करना चाहिए। इस दिन मूली भूलकर भी नहीं खानी चाहिए कहा जाता है कि मूली खाने धन -धान्य की हानि होती है। इस व्रत में चंद्रोदय के समय चन्द्रमा को गुड़ आदि का अर्घ्य देना चाहिए। साथ ही संकटहारी गणेश एवं चतुर्थी माता को गुड़, मूली आदि से अर्घ्य देना चाहिए।
अर्घ्य देने के उपरांत ही व्रत समाप्त करना चाहिए। इस दिन निर्जला व्रत का भी विधान है माताएं निर्जला व्रत अपने पुत्र के दीर्घायु के लिए अवश्य ही करती है। इस दिन तिल का प्रसाद खाना चाहिए।
पूजन सामग्री👉 (वृहद् पूजन के लिए ) -शुद्ध जल,दूध,दही,शहद,घी,चीनी,पंचामृत,वस्त्र,जनेऊ,मधुपर्क,सुगंध,लाल चन्दन,रोली,सिन्दूर,अक्षत(चावल),फूल,माला,बेलपत्र,दूब,शमीपत्र,गुलाल,आभूषण,सुगन्धित तेल,धूपबत्ती,दीपक,प्रसाद,फल,गंगाजल,पान,सुपारी,रूई,कपूर।
विधि- गणेश जी की मूर्ती सामने रखकर और श्रद्धा पूर्वक उस पर पुष्प छोड़े यदि मूर्ती न हो तो सुपारी पर मौली लपेटकर चावल पर स्थापित करें -और आवाहन करें -
गजाननं भूतगणादिसेवितम कपित्थजम्बू फल चारू भक्षणं |
उमासुतम शोक विनाशकारकं नमामि विघ्नेश्वर पादपंकजम ||
आगच्छ भगवन्देव स्थाने चात्र स्थिरो भव |
यावत्पूजा करिष्यामि तावत्वं सन्निधौ भव ||
और अब प्रतिष्ठा (प्राण प्रतिष्ठा) करें -
अस्यैप्राणाः प्रतिष्ठन्तु अस्यै प्राणा क्षरन्तु च |
अस्यै देवत्वमर्चार्यम मामेहती च कश्चन ||
आसन-रम्यं सुशोभनं दिव्यं सर्व सौख्यंकर शुभम |
आसनं च मया दत्तं गृहाण परमेश्वरः ||
पाद्य (पैर धुलना)
उष्णोदकं निर्मलं च सर्व सौगंध्य संयुत्तम |
पादप्रक्षालनार्थाय दत्तं ते प्रतिगह्यताम ||
अर्घ्य(हाथ धुलना )-
अर्घ्य गृहाण देवेश गंध पुष्पाक्षतै :|
करुणाम कुरु में देव गृहणार्ध्य नमोस्तुते ||
आचमन
सर्वतीर्थ समायुक्तं सुगन्धि निर्मलं जलं |
आचम्यताम मया दत्तं गृहीत्वा परमेश्वरः ||
स्नान
गंगा सरस्वती रेवा पयोष्णी नर्मदाजलै:|
स्नापितोSसी मया देव तथा शांति कुरुश्वमे ||
दूध् से स्नान
कामधेनुसमुत्पन्नं सर्वेषां जीवन परम |
पावनं यज्ञ हेतुश्च पयः स्नानार्थं समर्पितं ||
दही से स्नान
पयस्तु समुदभूतं मधुराम्लं शक्तिप्रभं |
दध्यानीतं मया देव स्नानार्थं प्रतिगृह्यतां ||
घी से स्नान
नवनीत समुत्पन्नं सर्व संतोषकारकं |
घृतं तुभ्यं प्रदास्यामि स्नानार्थं प्रतिगृह्यताम ||
शहद से स्नान
तरु पुष्प समुदभूतं सुस्वादु मधुरं मधुः |
तेजः पुष्टिकरं दिव्यं स्नानार्थं प्रतिगृह्यताम ||
शर्करा (चीनी) से स्नान
इक्षुसार समुदभूता शंकरा पुष्टिकार्कम |
मलापहारिका दिव्या स्नानार्थं प्रतिगृह्यताम ||
पंचामृत से स्नान
पयोदधिघृतं चैव मधु च शर्करायुतं |
पंचामृतं मयानीतं स्नानार्थं प्रतिगृह्यताम ||
शुध्दोदक (शुद्ध जल ) से स्नान
मंदाकिन्यास्त यध्दारि सर्वपापहरं शुभम |
तदिधं कल्पितं देव स्नानार्थं प्रतिगृह्यताम ||
वस्त्र
सर्वभूषाधिके सौम्ये लोक लज्जा निवारणे |
मयोपपादिते तुभ्यं वाससी प्रतिगृह्यतां ||
उपवस्त्र (कपडे का टुकड़ा )
सुजातो ज्योतिषा सह्शर्म वरुथमासदत्सव : |
वासोअस्तेविश्वरूपवं संव्ययस्वविभावसो ||
यज्ञोपवीत
नवभिस्तन्तुभिर्युक्त त्रिगुण देवतामयम |
उपवीतं मया दत्तं गृहाणं परमेश्वर : ||
मधुपर्क
कस्य कन्स्येनपिहितो दधिमध्वा ज्यसन्युतः |
मधुपर्को मयानीतः पूजार्थ् प्रतिगृह्यतां ||
गन्ध
श्रीखण्डचन्दनं दिव्यँ गन्धाढयं सुमनोहरम |
विलेपनं सुरश्रेष्ठ चन्दनं प्रतिगृह्यतां ||
रक्त(लाल )चन्दन
रक्त चन्दन समिश्रं पारिजातसमुदभवम |
मया दत्तं गृहाणाश चन्दनं गन्धसंयुम ||
रोली
कुमकुम कामनादिव्यं कामनाकामसंभवाम |
कुम्कुमेनार्चितो देव गृहाण परमेश्वर्: ||
सिन्दूर
सिन्दूरं शोभनं रक्तं सौभाग्यं सुखवर्धनम् ||
शुभदं कामदं चैव सिन्दूरं प्रतिगृह्यतां ||
अक्षत
अक्षताश्च सुरश्रेष्ठं कुम्कुमाक्तः सुशोभितः |
माया निवेदिता भक्त्या गृहाण परमेश्वरः ||
पुष्प
पुष्पैर्नांनाविधेर्दिव्यै: कुमुदैरथ चम्पकै: |
पूजार्थ नीयते तुभ्यं पुष्पाणि प्रतिगृह्यतां ||
पुष्प माला
माल्यादीनि सुगन्धिनी मालत्यादीनि वै प्रभो |
मयानीतानि पुष्पाणि गृहाण परमेश्वर: ||
बेल का पत्र
त्रिशाखैर्विल्वपत्रैश्च अच्छिद्रै: कोमलै :शुभै : |
तव पूजां करिष्यामि गृहाण परमेश्वर : ||
दूर्वा
त्वं दूर्वेSमृतजन्मानि वन्दितासि सुरैरपि |
सौभाग्यं संततिं देहि सर्वकार्यकरो भव ||
दूर्वाकर
दूर्वाकुरान सुहरिता नमृतान मंगलप्रदाम |
आनीतांस्तव पूजार्थ गृहाण गणनायक:||
शमीपत्र
शमी शमय ये पापं शमी लाहित कष्टका |
धारिण्यर्जुनवाणानां रामस्य प्रियवादिनी ||
अबीर गुलाल
अबीरं च गुलालं च चोवा चन्दन्मेव च |
अबीरेणर्चितो देव क्षत: शान्ति प्रयच्छमे ||
आभूषण
अलंकारान्महा दव्यान्नानारत्न विनिर्मितान |
गृहाण देवदेवेश प्रसीद परमेश्वर: ||
सुगंध तेल
चम्पकाशोक वकु ल मालती मीगरादिभि: |
वासितं स्निग्धता हेतु तेलं चारु प्रगृह्यतां ||
धूप
वनस्पतिरसोदभूतो गन्धढयो गंध उत्तम : |
आघ्रेय सर्वदेवानां धूपोSयं प्रतिगृह्यतां ||
दीप
आज्यं च वर्तिसंयुक्तं वहिन्ना योजितं मया |
दीपं गृहाण देवेश त्रैलोक्यतिमिरापहम ||
नैवेद्य
शर्कराघृत संयुक्तं मधुरं स्वादुचोत्तमम |
उपहार समायुक्तं नैवेद्यं प्रतिगृह्यतां ||
मध्येपानीय
अतितृप्तिकरं तोयं सुगन्धि च पिबेच्छ्या |
त्वयि तृप्ते जगतृप्तं नित्यतृप्ते महात्मनि ||
ऋतुफल
नारिकेलफलं जम्बूफलं नारंगमुत्तमम |
कुष्माण्डं पुरतो भक्त्या कल्पितं
प्रतिगृह्यतां ||
आचमन
गंगाजलं समानीतां सुवर्णकलशे स्थितन |
आचमम्यतां सुरश्रेष्ठ शुद्धमाचनीयकम ||
अखंड ऋतुफल
इदं फलं मयादेव स्थापितं पुरतस्तव |
तेन मे सफलावाप्तिर्भवेज्जन्मनि जन्मनि ||
ताम्बूल पूंगीफलं
पूंगीफलम महद्दिश्यं नागवल्लीदलैर्युतम |
एलादि चूर्णादि संयुक्तं ताम्बूलं प्रतिगृह्यतां ||
दक्षिणा(दान)
हिरण्यगर्भ गर्भस्थं हेमबीजं विभावसो: |
अनन्तपुण्यफलदमत : शान्ति प्रयच्छ मे ||
आरती
चंद्रादित्यो च धरणी विद्युद्ग्निंस्तर्थव च |
त्वमेव सर्वज्योतीष आर्तिक्यं प्रतिगृह्यताम ||
पुष्पांजलि
नानासुगन्धिपुष्पाणि यथाकालोदभवानि च |
पुष्पांजलिर्मया दत्तो गृहाण परमेश्वर: ||
प्रार्थना
रक्ष रक्ष गणाध्यक्ष रक्ष त्रैलोक्य रक्षक:
भक्तानामभयं कर्ता त्राता भव भवार्णवात ||
अनया पूजया गणपति: प्रीयतां न मम कहकर प्रणाम कर आरती के लिए खड़े हो जाये।
श्री गणेश जी की आरती
〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️
जय गणेश,जय गणेश,जय गणेश देवा |
माता जाकी पारवती,पिता महादेवा ||
एक दन्त दयावंत,चार भुजा धारी |
मस्तक पर सिन्दूर सोहे,मूसे की सवारी || जय ...
अंधन को आँख देत,कोढ़िन को काया |
बांझन को पुत्र देत,निर्धन को माया || जय ...
हार चढ़े,फूल चढ़े और चढ़े मेवा |
लड्डुअन का भोग लगे,संत करें सेवा || जय ...
दीनन की लाज राखो,शम्भु सुतवारी |
कामना को पूरा करो जग बलिहारी || जय ...
अर्घ्य अर्पित करने की विधि
〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️
तिथि की अधिष्ठात्री देवी तथा रोहिणीपति चंद्रमा को शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को गणेश-पूजन के पश्चात अर्घ्य प्रदान करना चाहिए। गणेश पुराण के अनुसार, चंद्रोदय काल में गणेश के लिए तीन, तिथि के लिए तीन और चंद्रमा के लिए सात अर्घ्य प्रदान करना चाहिए। इस व्रत में तृतीया तिथि से युक्त चतुर्थी तिथि ग्राह्य है। तृतीया के स्वामी गौरी माता और चतुर्थी के स्वामी श्रीगणेश जी हैं। व्रत तोड़ने के बाद महिलाओं का शकरकंदी खाने की परंपरा भी है।
पानी की छींटें से बचें
〰️〰️〰️〰️〰️〰️
विनायक चौथ व्रत के दिन जब आप चांद के अर्घ्य दे रही हों उस दौरान महिलाओं को इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि चांद को अर्पित किए जा रहे जल के छींटें आपके पैर या शरीर पर बिलकुल न पड़ें।
गणेश चतुर्थी व्रत दान
〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️
इस दिन जो व्यक्ति भगवान गणेश का चतुर्थी व्रत रखते हैं और जो व्यक्ति व्रत नहीं रखते हैं वह सभी अपनी सामर्थ्य के अनुसार गरीब लोगों को दान कर सकते हैं. इस दिन गरीब लोगों को सूती वस्त्र, छाता, जूता आदि दान कर सकते हैं. भगवान गणेश को घी बेसन तथा गुड़ के लड्डुओं का भोग लगाने के बाद प्रसाद को गरीब लोगों में बांटना चाहिए. लड्डुओं के अतिरिक्त अन्य खाद्य वस्तुओं को भी गरीब लोगों में बांटा जा सकता है।
अनिरुद्ध विनायक चतुर्थी व्रत कथा
〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️
एक बार शिवजी और माता पार्वती नर्मदा नदी के किनारे बैठे थे। तभी माता पार्वती ने कहा कि उन्हें चौपड़ खेलना है। शिवजी ने भी सहमति दे दी। लेकिन परेशानी यह थी कि इस खेल की हार-जीत का फैसला कौन करेगा। तभी शिवजी ने एक तिनके मात्र से ही एक पुतला बनाया और उसमें प्राण-प्रतिष्ठा कर दी। उन्होंने उस पुतले से कहा कि हम चौपड़ खेल रहे हैं लेकिन हार-जीत का फैसला करने वाला कोई नहीं है तो तुम्हें बताना होगा कि आखिर में कौन जीता और कौन हारा।
फिर शिवजी और माता पार्वती ने चौपड़ खेलना शुरू किया। तीन बार बाजी हुई और तीनों बार माता पार्वती ही विजय रहीं। लेकिन जब बच्चे से पूछा गया कि कौन जीता तो उसने महादेव का नाम लिया। यह सुन माता पार्वती क्रोधित हो गईं। उन्होंने उस बच्चे को लंगड़ा होने और कीचड़ में पड़े रहने का श्राप दे दिया। बच्चे ने माता से माफी मांगी और कहा कि उससे अज्ञानतावश ऐसा हुआ। इसमें कोई द्वेष भाव नहीं था।
इस पर माता ने कहा कि यहां नागकन्याएं आती हैं और गणेश पूजन करती हैं। जैसा वो कहें उसके अनुसार, तुम गणेश व्रत करो। इस तरह तुम मुझे प्राप्त करोगे। इतना कहकर माता पार्वती और शिवजी कैलाश पर्वत पर चली गईं। ऐसे ही एक वर्ष बीत गया। फिर वहां नागकन्याएं आई और इस बालक को गणेश जी के व्रत की विधि बतलाई। लगातार 21 दिन तक उस बालक ने व्रत किया। उसकी श्रद्धा देख गणेशजी प्रसन्न हो गए। गणेश जी ने बालक से कहा कि वो मनोवांछित फल मांग सकता है। तब बच्चे ने कहा कि उसे इतनी शक्ति दे कि वो अपने पैरों पर चल पाए और कैलाश पर्वत पर अपने माता-पिता के पास जाए। उस बालक को वरदान देकर वो अंतर्ध्यान हो गए।
गणेश जी की आरती
〰️〰️〰️〰️〰️〰️
जय गणेश, जय गणेश, जय गणेश देवा।
माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा।।
एकदंत, दयावन्त, चार भुजाधारी,
माथे सिन्दूर सोहे, मूस की सवारी।
पान चढ़े, फूल चढ़े और चढ़े मेवा,
लड्डुअन का भोग लगे, सन्त करें सेवा।। ..
जय गणेश, जय गणेश, जय गणेश, देवा।
माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा।।
अंधन को आंख देत, कोढ़िन को काया,
बांझन को पुत्र देत, निर्धन को माया।
‘सूर’ श्याम शरण आए, सफल कीजे सेवा।।
जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा ..
माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा।
दीनन की लाज रखो, शंभु सुतकारी।
कामना को पूर्ण करो जय बलिहारी।
साभार~ पं देव शर्मा🔥
〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️