तुम्हें देखकर नहीं__
प्यारे.. तुम्हें समझकर प्रेम हुआ है हमें,
कि, तेरे नाम का एक सूक्ष्म धागा-
अन्तर्मन में कहीं बांध रखा हैं...
न कलाई पर प्रत्यक्ष होता हैं,
न किसी गिरह में परिलक्षित होता हैं,
बस, इतना सा संबंध है,
कि, हर संवाद के उपरांत
एक सिरा__
अनायास तुम्हारी दिशा में ठहर जाता हैं,
न आकर्षित करता हैं,
न अवरुद्ध हीं करता हैं -
फिर भी जितना दूर निकल जाऊं,
पुनः लौट आने का कारण-
यही कहीं__
निःशब्द बंधा रह जाता हैं...!!
❣️🫰
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