nkkalyani282212
भारतीय फौज का एक ऐसा अफसर, जिसकी बहादुरी की तारीफ उसके दुश्मन भी किया करते थे… एक ऐसा योद्धा, जिसका नाम सुनकर पाकिस्तान की सेना तक सतर्क हो जाती थी। वो नाम था — लेफ्टिनेंट जनरल हनुत सिंह। भारतीय सेना के इतिहास में हनुत सिंह को सबसे बेहतरीन टैंक कमांडरों और रणनीतिकारों में गिना जाता है। वे भारतीय सेना की गौरवशाली टैंक रेजिमेंट 17 पूना हॉर्स के कमांडिंग ऑफिसर थे।
साल 1971 में भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान जम्मू-पंजाब के शकरगढ़ सेक्टर में बसंतर की लड़ाई हुई। यह युद्ध भारतीय सेना और पाकिस्तानी बख्तरबंद इकाइयों के बीच एक बेहद महत्वपूर्ण टैंक युद्ध था। भारतीय सेना की ओर से मोर्चे पर 17 पूना हॉर्स ने अद्भुत साहस और युद्ध कौशल का प्रदर्शन किया। हनुत सिंह के नेतृत्व में भारतीय टैंकों ने पाकिस्तान की मजबूत बख्तरबंद ताकत को भारी नुकसान पहुंचाया। उनके नेतृत्व और रेजिमेंट की बहादुरी ने 17 पूना हॉर्स को भारतीय सेना की सबसे प्रसिद्ध टैंक रेजिमेंटों में शामिल कर दिया।
इस लड़ाई के दौरान सबसे बड़ी चुनौती थी दुश्मन द्वारा बिछाई गई लैंड माइंस। इंजीनियर कोर रास्ता साफ करने में जुटी थी, लेकिन दूसरी तरफ पाकिस्तानी टैंक तेजी से आगे बढ़ रहे थे। 15 दिसंबर की रात स्थिति बेहद गंभीर हो गई। ऐसे समय में हनुत सिंह ने इंतजार करने के बजाय आगे बढ़ने का फैसला किया। जब उन्हें बताया गया कि माइंस फील्ड अभी पूरी तरह साफ नहीं हुई है और आगे बढ़ना बेहद खतरनाक है, तो उन्होंने दृढ़ता से कहा कि अगर अभी रास्ता पार नहीं किया गया तो दुश्मन को रोकना मुश्किल हो जाएगा। आदेश का पालन हुआ और 17 पूना हॉर्स के टैंक आगे बढ़ गए।
इसी युद्ध में एक और महान योद्धा ने अपनी वीरता की अमिट मिसाल कायम की — सेकंड लेफ्टिनेंट अरुण खेत्रपाल। उनका टैंक दुश्मन की गोलाबारी में बुरी तरह क्षतिग्रस्त और आग की लपटों में घिर गया, लेकिन उन्होंने पीछे हटने से इनकार कर दिया। उन्होंने आखिरी सांस तक लड़ते हुए अपनी स्थिति की रक्षा की और वीरगति प्राप्त की। उनकी अदम्य वीरता के लिए उन्हें मरणोपरांत परम वीर चक्र से सम्मानित किया गया। वहीं, युद्ध में असाधारण नेतृत्व और साहस के लिए हनुत सिंह को महावीर चक्र प्रदान किया गया।
हनुत सिंह केवल युद्धभूमि के बहादुर अधिकारी ही नहीं थे, बल्कि एक बेहतरीन रणनीतिकार भी थे। एक प्रसंग के अनुसार, जब सेना की बख्तरबंद तैयारियों का जायजा लिया जा रहा था और उनसे युद्ध की स्थिति में टैंकों की संभावित गति के बारे में पूछा गया, तो उन्होंने तकनीकी और लॉजिस्टिक चुनौतियों को स्पष्ट किया। उनका मानना था कि यदि टैंकों को पर्याप्त ईंधन, गोला-बारूद, स्पेयर पार्ट्स और लॉजिस्टिक सपोर्ट मिले, तो भारतीय सेना बहुत तेज गति से आगे बढ़ सकती है। यही उनकी खासियत थी—वे केवल बहादुरी की बात नहीं करते थे, बल्कि युद्ध की हर तकनीकी चुनौती को गहराई से समझते थे।
साल 1986 में ऑपरेशन ब्रासटैक्स के दौरान एक बार फिर हनुत सिंह की रणनीतिक क्षमता सामने आई। यह भारतीय सेना के इतिहास के सबसे बड़े सैन्य अभ्यासों में से एक था। राजस्थान के रेगिस्तानी इलाके में भारतीय सेना की विशाल तैनाती ने पाकिस्तान में चिंता पैदा कर दी और दोनों देशों के बीच तनाव काफी बढ़ गया। उस समय हनुत सिंह को इस बड़े सैन्य अभियान में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी गई। उनकी रणनीतिक तैनाती और भारतीय सेना की तैयारियों ने पाकिस्तान पर जबरदस्त सैन्य दबाव बनाया।
हालांकि ब्रासटैक्स के दौरान युद्ध की आशंका बढ़ गई थी, लेकिन अंततः कूटनीतिक प्रयासों से तनाव कम हुआ। पाकिस्तान के राष्ट्रपति जिया-उल-हक भारत आए और तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी से मुलाकात की। इसे बाद में क्रिकेट डिप्लोमेसी के नाम से भी याद किया गया। इस मुलाकात के बाद दोनों देशों के बीच बढ़ा तनाव धीरे-धीरे कम हुआ।
हनुत सिंह की पहचान सिर्फ एक सैनिक या टैंक कमांडर के रूप में नहीं थी। वे ऐसे अधिकारी थे जिन्होंने युद्धभूमि में साहस, अनुशासन, नेतृत्व और रणनीति का अद्भुत मेल दिखाया। उन्होंने अपने सैनिकों का नेतृत्व हमेशा आगे रहकर किया और कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी अपने निर्णय पर अडिग रहे।
भारतीय सेना के इतिहास में ऐसे योद्धाओं का योगदान कभी भुलाया नहीं जा सकता। लेफ्टिनेंट जनरल हनुत सिंह उस सैन्य परंपरा के प्रतीक थे जिसमें व्यक्तिगत जीवन से ऊपर राष्ट्र और कर्तव्य को रखा जाता है। भारत माता के इस महान सपूत को शत-शत नमन। 🇮🇳🙏
जय हिंद! 🇮🇳 वंदे मातरम्!
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