Manoj Pandey TV
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https://www.gyanvigyanbrhamgyan.com/2026/07/human-psychology-social-duality-and.html #🌷शुभ रविवार #🌞गुड मॉर्निंग☕🌞 सुदासे (सुदासो - स + उ + द): संसार का संतुलन 'देने और लेने' (Give and Take) के नियम पर निर्भर है। जब मनुष्य केवल 'लेने' की वृत्ति (स्वार्थ) से भर जाता है, तो आत्मा का पतन और सामाजिक अराजकता अनिवार्य हो जाती है।
दस्रा (दसो दिशाओं का ऐश्वर्य): यदि मनुष्य आंतरिक रूप से अतृप्त है, तो उसे दसों दिशाओं का वैभव भी मिल जाए, तब भी वह अपने मानसिक क्लेशों और अशांति से मुक्त नहीं हो सकता।
वसु (वसाने वाले संसाधन): जब तामसिकता बढ़ती है, तो पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश जैसे पंचतत्व (संसाधन) भी मानव की असीमित भूख के आगे कम पड़ने लगते हैं।
बिभ्रता (वि + भ्र + ता): 'वि' (विशेष) प्रकार की 'भ्र' (भ्रामक) जानकारियाँ और वैज्ञानिक अहंकार मिलकर समाज में 'ता' (तामसिक) वातावरण का सृजन करते हैं, जिससे पृथ्वी का प्राकृतिक संतुलन बिगड़ जाता है।
पृक्षो (पृ + अक्षो): 'पृ' (प्राकृतिक असंतोष) और 'अक्षो' (दृष्टि दोष)। सत्य को देखने में असमर्थ और आत्म-केन्द्रित लोगों की संख्या में अपार वृद्धि होना।
वहतम-अश्विना (वह + तम + अश्विना): 'वह' (प्रवाह) + 'तम' (अज्ञानता/जड़ता)। समाज में अज्ञानता का ऐसा प्रवाह है कि सूर्य (ज्ञान) के उदय होने पर भी मानव मस्तिष्क अंधकार से घिरा है। 'अश्विना' आज की तेज रफ्तार मशीनी अंधी दौड़ का प्रतीक बन चुका है जो प्राकृतिक बुद्धि को नष्ट कर रहा है।
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