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#शब्द संवाद #📚कविता-कहानी संग्रह #✍️ साहित्य एवं शायरी #📓 हिंदी साहित्य
शब्द संवाद - खुढरीबैगाना | पी एस यादप ' अजनवी' ना तुमने कुछ जाना और ना हमने कुछ जाना।  इश्क हो गया यह भी तो पहले लोगों ने पहचाना।  दिए की लौ जल रही है यह उसका एक भ्रम था, ख्द जल रही है बाती दिए ने यह भी ना जाना।  मैं आज भी भ्रम में और कल भी था मैं भ्रम में।  रोज हूं मैं कुछ बात करू होकर = सोचता  तम में। ही मैं सब कुछ भूल जाता हूं मगर पास जाते हकीकत में वफा का राज भी मैने नही जाना।  वफा के भाव में दिन रात नए पैगाम लिखता हूं जाग कर रात भर तेरा ही हर ख्वाब लिखता हूं। रिश्ता  हकीकत में नहीं तू मेरा फिर यह কমা मेरे जेह़न में तू बसा मैंने खुद से ही है पहचाना।  आंख में दिलबर हमेशा साथ रहते हो। तड़पती - बैठकर पास में मेरे, कान में कुछ बात कहते हो। टूटती मुद्राओं में हमेशा एक ख्वाब ही मिलता, कशिश में रहकर भी रिश्ता मुझे यूं ही निभाना।  ब्योम में उड़ते ये पंछी मुझे कुछ याद दिलाते हैं । खतों के वाहक थे कभी आज याद बन जाते हैं । तेरी जरूरत का बेशक  कभी था एक ठिकाना मैं गर्दिशों का मारा फकीर जैसे खुद से बेगाना।  पूछता हूं मैं खुद से मैं कैसे अभी तक जिंद् हूँ । उसके मैं सांसो से शर्मिंदा हू পাম ম धड़कने सामने जो नहीं मेरे ख्वाब में आज वही आता, बहुत मुश्किल है,उस कातिल को यूं भूल पाना।  चुपके से रोना और चुपके से खुद पे मुस्कुराना ।  बहुत मुश्किल है खुद की किस्मत बदल पाना। सांसें हैं तब तलक तो निगाहों में बसा रहने दो, मर कर किसे पता क्हां पर, किसको है जाना। खुढरीबैगाना | पी एस यादप ' अजनवी' ना तुमने कुछ जाना और ना हमने कुछ जाना।  इश्क हो गया यह भी तो पहले लोगों ने पहचाना।  दिए की लौ जल रही है यह उसका एक भ्रम था, ख्द जल रही है बाती दिए ने यह भी ना जाना।  मैं आज भी भ्रम में और कल भी था मैं भ्रम में।  रोज हूं मैं कुछ बात करू होकर = सोचता  तम में। ही मैं सब कुछ भूल जाता हूं मगर पास जाते हकीकत में वफा का राज भी मैने नही जाना।  वफा के भाव में दिन रात नए पैगाम लिखता हूं जाग कर रात भर तेरा ही हर ख्वाब लिखता हूं। रिश्ता  हकीकत में नहीं तू मेरा फिर यह কমা मेरे जेह़न में तू बसा मैंने खुद से ही है पहचाना।  आंख में दिलबर हमेशा साथ रहते हो। तड़पती - बैठकर पास में मेरे, कान में कुछ बात कहते हो। टूटती मुद्राओं में हमेशा एक ख्वाब ही मिलता, कशिश में रहकर भी रिश्ता मुझे यूं ही निभाना।  ब्योम में उड़ते ये पंछी मुझे कुछ याद दिलाते हैं । खतों के वाहक थे कभी आज याद बन जाते हैं । तेरी जरूरत का बेशक  कभी था एक ठिकाना मैं गर्दिशों का मारा फकीर जैसे खुद से बेगाना।  पूछता हूं मैं खुद से मैं कैसे अभी तक जिंद् हूँ । उसके मैं सांसो से शर्मिंदा हू পাম ম धड़कने सामने जो नहीं मेरे ख्वाब में आज वही आता, बहुत मुश्किल है,उस कातिल को यूं भूल पाना।  चुपके से रोना और चुपके से खुद पे मुस्कुराना ।  बहुत मुश्किल है खुद की किस्मत बदल पाना। सांसें हैं तब तलक तो निगाहों में बसा रहने दो, मर कर किसे पता क्हां पर, किसको है जाना। - ShareChat