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#😓প্রয়াত বর্ষীয়ান প্রাক্তন মন্ত্রী😔
😓প্রয়াত বর্ষীয়ান প্রাক্তন মন্ত্রী😔 - अहा जिंदगी 01-03-2024 दैनिम भारकर बीती सियासत से वाकिफ़ कराती है किताब सेतु प्रकाशन / भारतीय राजनीति और मेरा  जीवन/मोहसिना क़िदवाई / १९९ रुपये ज़िंदगी के ९२ वसंत देख श्रीमती मोहसिना क़िदवाई ने चुकीं छह दशक तक भारतीय सियासत को न केवल क़रीब से देखा  है, बल्कि वे उसका एक अहम हिस्सा भी रही हैं। वर्ष १९६० में महज़ २८ साल की उम्र में उत्तर प्रदेश विधान परिषद का चुनाव जीतकर उन्होंने अपने सार्वजनिक जीवन का आग़ाज़ किया था। उन्हें नेहरूगांधी परिवार की तीन पीढ़ियों (नेहरू इंदिरा और राजीव गांधी) से रूबरू होने का मौक़ा मिला। मोहसिना का क़रीब ६० साल का राजनीतिक कॅरियर कई उतार चढ़ावों , पड़ावों और दिलचस्प घटनाओं से लबरेज़ है। ऐसे में उनकी यह आत्मकथा (जिसे शब्द जाने माने पत्रकार और लेखक रशीद क़िदवाई ने दिए हैंl) उस दौर में और भी अहम हो जाती है, जबकि उनकी मूल सियासी पार्टी कांग्रेस एक बदतरीन दौर से गुज़र रही है। उनके अनुभव और उनकी अंतर्दृष्टि हताश कांग्रेसियों की हौसला अफ़ज़ाई कर सकती है। लेकिन उनकी यह कहानी सिर्फ़ कांग्रेसियों के लिए नहीं है। यह किताब हर उस सजग पाठक के लिए उपयोगी है, जो बीते दौर की राजनीति को समझने की इच्छा रखता है। किताब का अनुवाद पत्रकार जावेद आलम ने किया है। जयजीत अकलेचा अहा जिंदगी 01-03-2024 दैनिम भारकर बीती सियासत से वाकिफ़ कराती है किताब सेतु प्रकाशन / भारतीय राजनीति और मेरा  जीवन/मोहसिना क़िदवाई / १९९ रुपये ज़िंदगी के ९२ वसंत देख श्रीमती मोहसिना क़िदवाई ने चुकीं छह दशक तक भारतीय सियासत को न केवल क़रीब से देखा  है, बल्कि वे उसका एक अहम हिस्सा भी रही हैं। वर्ष १९६० में महज़ २८ साल की उम्र में उत्तर प्रदेश विधान परिषद का चुनाव जीतकर उन्होंने अपने सार्वजनिक जीवन का आग़ाज़ किया था। उन्हें नेहरूगांधी परिवार की तीन पीढ़ियों (नेहरू इंदिरा और राजीव गांधी) से रूबरू होने का मौक़ा मिला। मोहसिना का क़रीब ६० साल का राजनीतिक कॅरियर कई उतार चढ़ावों , पड़ावों और दिलचस्प घटनाओं से लबरेज़ है। ऐसे में उनकी यह आत्मकथा (जिसे शब्द जाने माने पत्रकार और लेखक रशीद क़िदवाई ने दिए हैंl) उस दौर में और भी अहम हो जाती है, जबकि उनकी मूल सियासी पार्टी कांग्रेस एक बदतरीन दौर से गुज़र रही है। उनके अनुभव और उनकी अंतर्दृष्टि हताश कांग्रेसियों की हौसला अफ़ज़ाई कर सकती है। लेकिन उनकी यह कहानी सिर्फ़ कांग्रेसियों के लिए नहीं है। यह किताब हर उस सजग पाठक के लिए उपयोगी है, जो बीते दौर की राजनीति को समझने की इच्छा रखता है। किताब का अनुवाद पत्रकार जावेद आलम ने किया है। जयजीत अकलेचा - ShareChat