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#✍️ साहित्य एवं शायरी
✍️ साहित्य एवं शायरी - तोहफ़ा  कुबूल है जिंदगी का हर मैंने ख्वाहिशों का नाम, बताना छोड़ दिया जो दिल के क़रीब हैं , वो मेरे अजीज़ है मैंने गैरों पें हक़ जताना छोड़ दिया जो समझ ही नहीं सकते दर्द मेरा मैंने उन्हें ज़ख्म , दिखाना छोड़ दिया गुजरती हैं दिल पे, हक़ीक़त हैं मेरी 077 लिए मैंने दिखावे के मुस्कुराना छोड् दिया जो महसूस ही नहीं करते ज़रूरत मेरी मैंने उनका साथ निभाना छोड़ दिया जो चाहतें है रहना बस नाराज़ मुझसे मैंने उन्हें बार बार, मनाना छोड़ दिया जो मेरेअपने हैं वो मिलेंगे ज़रूर मुझे मैंने बेवजह बंदिशे लगाना छोड़ दिया तोहफ़ा  कुबूल है जिंदगी का हर मैंने ख्वाहिशों का नाम, बताना छोड़ दिया जो दिल के क़रीब हैं , वो मेरे अजीज़ है मैंने गैरों पें हक़ जताना छोड़ दिया जो समझ ही नहीं सकते दर्द मेरा मैंने उन्हें ज़ख्म , दिखाना छोड़ दिया गुजरती हैं दिल पे, हक़ीक़त हैं मेरी 077 लिए मैंने दिखावे के मुस्कुराना छोड् दिया जो महसूस ही नहीं करते ज़रूरत मेरी मैंने उनका साथ निभाना छोड़ दिया जो चाहतें है रहना बस नाराज़ मुझसे मैंने उन्हें बार बार, मनाना छोड़ दिया जो मेरेअपने हैं वो मिलेंगे ज़रूर मुझे मैंने बेवजह बंदिशे लगाना छोड़ दिया - ShareChat