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मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीरामचन्द्र और आदर्श रामराज्य :
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सनातनी आर्यावर्त्त भारत में रघुवंश- रामकथा के मुद्दे पर वाल्किकि रामायण तथा गोस्वामी जी द्वारा रचित रामचरितमानस का प्रभाव विश्व- समुदाय के सत्ताधिशो पर किस प्रकार होना चाहिये, इसी के बारे में निष्पक्ष तर्जमात्मक अनुचिंतन का समय आज उपगत। सकारात्मक दृष्टिकोण लेकर मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीरामचन्द्र जी का अमलिन चरित्रवत्ता तथा आदर्श चरित को भरते नजर में रखकर, आंतरिक कार्यवाही सुरु करना ही भारत से लेकर क्रमशः समूचे विश्व में "रामराज्य" की स्थापना को फलवती कर सकता है। क्योंकि, विष्णु भगवान श्रीराम जी ही एक ऐसे विशेष अवतार- पुरुष है, जिन्होंने सनातनी आर्यावर्त्त में घोर अन्याय और अत्याचार के खिलाफ मर्यादाओं का पालन करते हुए अभिनव क्रांति ला दी थी।।
श्रीराम जी का जन्म सिर्फ एक घटना नहीं; मानव से महामानव बनने की सचमुच एक नव्य- भव्य क्रांति थी। एक आम मनुष्य भी स्वयं अपना सही मूल्यांकन कर सकता है, यदि उनके मन में भगवत- चेतनाप्लुत सुदृढ गठनमूलक सुसंहत चिंताधारा होगी। प्रभु श्रीराम जी एकांत में रहते हुए भी सार्वजनिक जीवन को महत्व देते थे। उनकी रुचि अपने में सीमित नहीं थी, वल्कि समूह में विस्तारित थी। साथ में रहने वाले अपने तथा आसपास में रहनेवाले दूसरों का विकाश कैसे हो, संतोष के फूल उनके जीवन में कैसे खिले और कम साधनों में बड़ी सफलता कैसे मिले-- श्रीराम जी ने लोक हितार्थ ऐसे ही सोचने और कार्यरूप देने की गुण में अत्यंत गुणवान थे। इसीलिए सही अर्थ में श्रीराम जी को जानने या समझने के लिए उन से जुड़े "सात सोपान" के बारे में जानना चाहिए।।
राम कथा के इस सात सोपान विशिष्ट सात खंड यानी रामायण के "सात कांड" श्रीराम जी के एक- एक अलग "रूप" को दर्शाती है। "बाल कांड" उनके सरल और सहजता को खुलासा करता है तो, दर्पण तुल्य "अयोध्या कांड" में उनके युवावस्था की सही तस्वीर प्रतिबिंबित होती है।।
श्रीराम जी अपने जीवन में तीन ऋषियो से तीन अलग- अलग प्रश्न पूछे थे। भारद्वाज ऋषि से पूछे थे-- "किस मार्ग से जाए ?" बाल्मीकि ऋषि से पूछे थे-- "कंहा निवास करें ?" और तीसरा प्रश्न अगस्त्य ऋषि से-- "राक्षसों का विनाश कैसे होगा ?" यानी ऐसे सावित होता है की, युवावस्था में सही गुरु या विबेकी मार्गदर्शक कोई मिल जाए तो सफलता अवश्य मिलेगी-- इसी में बिल्कुल सन्देह नहीं है।।
अयोध्या कांड में असंतुलन के ऐसे अनेक अवसर भी आये थे; लेकिन विबेकी श्रीराम जी की दूरदर्शिता पूर्ण अकाट्य वचन के साथ सुसंहत कार्य- कुशलता से सब संतुलित हो गयी थी। श्रीराम जी कम बोलते थे। "मौन" गुण का अंतर्निहित महत्त्व जानते थे। लेकिन जब भी बोलते थे, अपनी वचन माधुर्य से सबको अपना बना लेते थे। यानी उनके कम बोलचाल किंतु संतुलन रक्षा करके बोलने की अनन्य आदर्श ही एक सकारात्मक सफल जीवन- यापन के लिए आवश्यक संतुलन को दर्शाता है।।
यदि असल में हम अपने घर- परिवार, समाज, राज्य, मातृभूमि तथा विश्व समुदाय में रामराज्य देखना चाहते हैं, तो हमें श्रीराम जी से तथा उनकी रामराज्य- प्रजाओं के आदर्श से बहुत कुछ सीखना होगा-- जैसे, ओ सब लोग कैसे लोकतांत्रिक भाईचार के साथ रहते थे, इसका भी सही चित्र देखना पड़ेगा। आज विश्व में फैले "रावण राज" इस बात की चेतना जागृत करता है की, इसी से सही तरीके से निवृत्ति पाने के लिए प्रत्येक घर, समाज और व्यक्ति- विशेष के मन में अव्यर्थ प्रतिषेधक रूपिणी "रामायण" अर्थात "रामचरित मानस" होना अनिवार्य है।।
रघुवंश में प्रभु श्रीराम जी को जो कुछ व्यवस्थाएं पसंद नहीं थी, उन्होंने स्वतः बदल दी थी। रामायण का उत्तरकांड पढ़ने से 14 वर्ष बनबास से लौटने के बाद, प्रभु जी के दृष्टि में वे सब आदर्श विरोधी अव्यवस्था किस हदतक जम गई थी और संस्कारित होने के बाद "प्रजातंत्र स्थापन" के लिए कौनसी बदलाव आयी थी-- ये सब मन- दर्पण में प्रतिम्बिबित होकर जागृति की सही रास्ते पर अवश्य ले आएगी।।
जय श्री राम
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