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परशुराम कुंड की पावन कथा – जहाँ भगवान परशुराम को मिला मातृ-हत्या के दोष से उद्धार
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#जय परशुराम
भारत की पावन धरती पर एक ऐसा तीर्थ भी है, जिसके बारे में मान्यता है कि वहीं भगवान विष्णु के छठे अवतार भगवान परशुराम को मातृ-हत्या के दोष से मुक्ति मिली। आज वही स्थान परशुराम कुंड के नाम से श्रद्धापूर्वक पूजनीय है।
महर्षि जमदग्नि और उनकी धर्मपत्नी माता रेणुका तप, संयम और सतीत्व की प्रतिमूर्ति थे। माता रेणुका का पतिव्रत इतना प्रभावशाली था कि वे प्रतिदिन नदी से कच्चे मिट्टी के घड़े में जल भरकर आश्रम लाती थीं, और उनके तपोबल से वह घड़ा कभी नहीं टूटता था।
लेकिन एक दिन नियति ने अलग ही परीक्षा ली।
नदी तट पर जल भरते समय माता रेणुका की दृष्टि संयोगवश गंधर्वों की जलक्रीड़ा पर पड़ गई। उनका मन केवल एक क्षण के लिए विचलित हुआ, किंतु उसी पल उनका तप खंडित हो गया। परिणामस्वरूप कच्चा घड़ा तुरंत टूट गया और वे खाली हाथ आश्रम लौट आईं।
महर्षि जमदग्नि ने अपने योगबल से पूरी घटना जान ली। क्रोध में उन्होंने अपने पुत्रों को आदेश दिया कि वे अपनी माता का वध करें।
चारों बड़े पुत्रों ने मातृभक्ति के कारण इस कठोर आदेश को अस्वीकार कर दिया। कहते हैं कि ऋषि के शाप से वे तत्काल जड़वत हो गए।
उसी समय सबसे छोटे पुत्र परशुराम वहाँ पहुँचे। उनके सामने जीवन का सबसे कठिन धर्मसंकट था—एक ओर पिता की आज्ञा, दूसरी ओर अपनी जननी का स्नेह।
अंततः उन्होंने पिता की आज्ञा को सर्वोच्च धर्म मानते हुए काँपते हुए हाथों से अपना परशु उठाया और भारी मन से माता रेणुका का वध कर दिया।
पुत्र की आज्ञाकारिता से प्रसन्न होकर महर्षि जमदग्नि ने वरदान माँगने को कहा।
भगवान परशुराम ने बिना किसी विलंब के अपनी माता को पुनर्जीवित करने और अपने भाइयों को पूर्ववत करने का वर माँगा। ऋषि के वरदान से माता रेणुका और उनके सभी पुत्र पुनः जीवित हो गए।
किन्तु एक पीड़ा अभी भी शेष थी।
परशुराम के हाथों में धरा हुआ परशु रक्त से सना हुआ था और वह उनके हाथों से अलग ही नहीं हो रहा था। मानो मातृ-हत्या का सूक्ष्म दोष उसी परशु के रूप में उनका साथ छोड़ने को तैयार न हो।
उस दोष से मुक्ति पाने के लिए भगवान परशुराम वर्षों तक अनेक तीर्थों की यात्रा करते रहे। अंततः वे अरुणाचल प्रदेश में बहने वाली पवित्र लोहित नदी के तट पर पहुँचे।
वहाँ उन्होंने एक दिव्य कुंड में स्नान किया।
जैसे ही उन्होंने उस पवित्र जल का स्पर्श किया, एक अद्भुत चमत्कार हुआ। वर्षों से उनके हाथ से चिपका हुआ परशु स्वयं नीचे गिर पड़ा और वे उस दोष से मुक्त हो गए।
तभी से वह स्थान परशुराम कुंड के नाम से प्रसिद्ध हो गया और करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बन गया।
आज भी मकर संक्रांति के पावन पर्व पर हजारों श्रद्धालु इस कुंड में स्नान करते हैं। उनकी श्रद्धा है कि यहाँ का पवित्र जल केवल शरीर को ही नहीं, बल्कि मन और आत्मा के पाप, पश्चाताप और संताप को भी शुद्ध कर देता है।