#कथा कहानी एक समय की बात है, एक विद्वान कथावाचक भरे पंडाल में रामायण की कथा कह रहे थे। प्रसंग अशोक वाटिका का चल रहा था। कथावाचक ने कहा— "हनुमान जी ने जब अशोक वाटिका में प्रवेश किया, तो वहाँ चारों ओर सफेद पुष्प खिले हुए थे, जो शांति और सात्विकता का प्रतीक थे।"
अभी उन्होंने इतना कहा ही था कि अचानक पंडाल में एक तेजस्वी वानर प्रकट हुए। वे कोई और नहीं, स्वयं हनुमान जी थे। उन्होंने गर्जना करते हुए कहा— "ठहरिए! आप गलत कह रहे हैं। मैं स्वयं वहाँ गया था, मैंने अपनी आँखों से देखा है कि अशोक वाटिका में फूल सफेद नहीं, बल्कि लाल थे!"
कथावाचक हनुमान जी को पहचान गए। उन्होंने हाथ जोड़कर बड़ी विनम्रता से कहा— "हे पवनपुत्र! शास्त्रों में और संतों की वाणी में तो इन्हें सफेद ही बताया गया है। आप प्रत्यक्षदर्शी हैं, यह सत्य है, परंतु यदि आप अपनी बात की पुष्टि के लिए किसी की गवाही (साक्षी) दिला दें, तो मैं अपनी कथा सुधार लूँ और इसे ही परम सत्य मान लूँगा।"
हनुमान जी ने प्रभु श्री राम और माता सीता का स्मरण किया। भक्त की पुकार सुनकर भगवान राम और माता सीता स्वयं वहाँ प्रकट हो गए। पूरा पंडाल जयकारों से गूंज उठा।
हनुमान जी ने माता की ओर देखा और कहा— "माता, आप ही बताइये, क्या वहाँ फूल लाल नहीं थे?"
जगज्जननी माता सीता ने मंद मुस्कान के साथ कहा— "नहीं पुत्र हनुमान! फूल तो वास्तव में श्वेत (सफेद) ही थे।"
हनुमान जी आश्चर्यचकित रह गए। तब माता सीता ने रहस्य खोलते हुए कहा— "हे पुत्र! जब तुम अशोक वाटिका में मुझे कष्ट में देख रहे थे और राक्षसों का अत्याचार देख रहे थे, तब तुम अत्यंत क्रोधित थे। तुम्हारे नेत्र क्रोध से रक्तवर्ण (लाल) हो गए थे। तुम्हारी आँखों की उस लाली के कारण तुम्हें वहाँ की हर सफेद वस्तु भी लाल ही दिखाई दे रही थी।"
यह सुनकर हनुमान जी भावुक हो गए। उन्हें समझ आया कि उनकी भक्ति और करुणा ने उनकी दृष्टि ही बदल दी थी। कथावाचक और सभी भक्त इस अद्भुत अलौकिक प्रेम को देखकर अश्रुपूर्ण हो गए।
राधे राधे #🌹☕️ गुड मॉर्निंग स्पेशल ☕️🌹


