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शिकवा पतझड़ से नहीं बहारों से है सागर से दोस्ती है रंजिश किनारों से है हमारे दिल टूटने की खबर नहीं छपी हम को ये शिकायत अख़बारों से है जल ना जाना तुम इसे पढ़ते हुए कहीं हमारी दास्ताँ लिखी गई अंगारों से है अच्छे लगते हैँ हमें दीवाने अपने जैसे एक पल अपनी बनती नहीं समझदारों से है यूँ ही नहीं दिआ है तोहफ़े में खंजर तुझे अब तेरा काफ़िला भर गया गद्दारों से है ख़ुशक़िस्मत लोग कहाँ याद करते हैँ तुझे खुदा तेरी तमाम शोहरत हालात के मारों से है अब देखें क्या अंजाम हो इस दास्ताँ का 'अक़्स ' दुश्मनो से है दोस्ती ओर दुश्मनी यारों से है (सनी पारचा 'अक़्स ') #💝 शायराना इश्क़