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#✒️ કવિની કલમ
✒️ કવિની કલમ - मनव्यथा वीराने की चुप राहों में मैं खुद से बातें करती हूँ, सूनी रातों की चादर ओढ़े तन्हा आहें भरती हूँ। टूटी चौखट, बिखरे सपने , धूल में दबी हैं चाहतें , अपने ही घर के सन्नाटों से हर दिन लड़ती रहती हूँ। किससे कह दूँ दर्द ये अपना, किसको अपना मानूँ मैं॰ हँसते चेहरे ओढ़ के अक्सर अंदर से मरती हूँ । एक झूले की धीमी हलचल पूछ रही है हाल मेरा, मैं बीते कल की यादों में हर पल यूँ ही झूलती हूँ। कोई आए॰ हाथ थाम ले, ये मन अब भी कहता है, सूखे पत्तों जैसे जीवन में इक बारिश  ٤ ব্ুননী लिखितः प्रकाश पंडित मनव्यथा वीराने की चुप राहों में मैं खुद से बातें करती हूँ, सूनी रातों की चादर ओढ़े तन्हा आहें भरती हूँ। टूटी चौखट, बिखरे सपने , धूल में दबी हैं चाहतें , अपने ही घर के सन्नाटों से हर दिन लड़ती रहती हूँ। किससे कह दूँ दर्द ये अपना, किसको अपना मानूँ मैं॰ हँसते चेहरे ओढ़ के अक्सर अंदर से मरती हूँ । एक झूले की धीमी हलचल पूछ रही है हाल मेरा, मैं बीते कल की यादों में हर पल यूँ ही झूलती हूँ। कोई आए॰ हाथ थाम ले, ये मन अब भी कहता है, सूखे पत्तों जैसे जीवन में इक बारिश  ٤ ব্ুননী लिखितः प्रकाश पंडित - ShareChat