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#✒️ કવિની કલમ
✒️ કવિની કલમ - टूटे हुए आशिक की व्यथा हमने चाहा था जिसे जान से भी ज़्यादा कभी, वो ही छोड़ गया तन्हा बीच रास्ता सभी। तो हर रात तेरी याद में कटती है मेरी , अब है सभी। आँख रोती है मगर दर्द छुपाती जिसके वादों पे सजाए थे कई ख़्वाब हमने , वो ही ख़्वाबों की मेरी बस्ती जला बैठा अभी। टूटकर चाहा था, ये मेरी ख़ता शायद , दिल के बदले में मुझे दर्द मिला है तभी। अब किसी से भी मोहब्बत का भरोसा न रहा, ज़ख्म इतने हैं कि जीने की वजह भी न रही। हँसते हुए खुद को देखे, एक अरसा हुआ आईना देखूँ तो बस तेरी कमी दिखती अभी। फिर से मुस्कुरा लो तुम", लोग कहते हैं, '؟7RT कौन समझाए ये दिल रोज़ मरा करता है। लिखितः प्रकाश पंडित टूटे हुए आशिक की व्यथा हमने चाहा था जिसे जान से भी ज़्यादा कभी, वो ही छोड़ गया तन्हा बीच रास्ता सभी। तो हर रात तेरी याद में कटती है मेरी , अब है सभी। आँख रोती है मगर दर्द छुपाती जिसके वादों पे सजाए थे कई ख़्वाब हमने , वो ही ख़्वाबों की मेरी बस्ती जला बैठा अभी। टूटकर चाहा था, ये मेरी ख़ता शायद , दिल के बदले में मुझे दर्द मिला है तभी। अब किसी से भी मोहब्बत का भरोसा न रहा, ज़ख्म इतने हैं कि जीने की वजह भी न रही। हँसते हुए खुद को देखे, एक अरसा हुआ आईना देखूँ तो बस तेरी कमी दिखती अभी। फिर से मुस्कुरा लो तुम", लोग कहते हैं, '؟7RT कौन समझाए ये दिल रोज़ मरा करता है। लिखितः प्रकाश पंडित - ShareChat