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#GodMorningSaturday #शराब_पीना_महापाप . गोपीचंद और भरथरी ने अलवर के किले पत्थर ढोये। एक समय श्री गोरखनाथ जी से गोपीचंद तथा भरथरी जी ने कहा कि गुरूदेव! हमारा मोक्ष इसी जन्म में हो, ऐसी कृपा करें। आप जो भी साधना बताओगे, हम करेंगे। श्री गोरखनाथ जी ने कहा कि राजस्थान प्रान्त में एक अलवर शहर है। वहाँ का राजा अपने किले का निर्माण करवा रहा है। तुम दोनों उस राजा के किले का निर्माण पूरा होने तक उसमें पत्थर ढ़ोने का निःशुल्क कार्य करो। अपने खाने के लिए कोई अन्य मजदूरी सुबह-शाम करो। उसी दिन दोनों भक्त आत्मा गुरू जी का आशीर्वाद लेकर चल पड़े। उस किले का निर्माण बारह वर्ष तक चला। कोई मेहनताना का रूपया-पैसा नहीं लिया। अपने भोजन के लिए उसी नगरी के एक कुम्हार के पास उसकी मिट्टी खोदने तथा उसके मटके बनाने योग्य गारा तैयार करने लगे। उसके बदले में सुबह-शाम केवल रोटी खाते थे। कुम्हार की धर्मपत्नी अच्छे संस्कारों की नहीं थी। कुम्हार ने कहा कि दो व्यक्ति बेघर घूम रहे थे। वे मेरे पास मिट्टी खोदते तथा गारा तैयार करते हैं। केवल रोटी-रोटी की मजदूरी लेंगे। आज तीन व्यक्तियों का भोजन लेकर आना। मटके बनाने तथा पकाने वाला स्थान नगर से कुछ दूरी पर जंगल में था। कुम्हारी दो व्यक्तियों की रोटी लेकर गई और बोली कि इससे अधिक नहीं मिलेगी। भोजन रखकर घर लौट आई। कुम्हार ने कहा कि बेटा! इन्हीं में काम चलाना पड़ेगा। तीनों ने बाँटकर रोटी खाई। कई वर्ष ऐसा चला। अंत के वर्ष में तो केवल एक व्यक्ति का भोजन भेजने लगी। तीनों उसी में संतोष कर लेते थे। किले का कार्य बारह वर्ष चला। कुम्हार ने अपने घड़े पकाने के लिए आवे में रख दिए। अंत के वर्ष की बात है।* गोपीचंद तथा भरथरी ने कुम्हार से आज्ञा ली कि पिता जी! हमारी साधना पूरी हुई। अब हम अपने गुरू श्री गोरखनाथ जी के पास वापिस जा रहे हैं। मेरा नाम गोपीचंद है। इनका नाम भरथरी है। उस समय कुम्हार की पत्नी भी उपस्थित थी। मटकों की ओर एक हाथ से आशीर्वाद देते हुए दोनों ने एक साथ कहा पिता का हेत माता का कुहेत। आधा कंचन आधा रेत।। यह वचन बोलकर दोनों चले गए। जिस समय मटके निकालने लगे तो कुम्हार तथा कुम्हारी दोनों निकाल रहे थे। देखा तो प्रत्येक मटका आधा सोने का था, आधा कच्चा था। हाथ लगते ही रेत बनने लगा। कुम्हार ने कहा, भाग्यवान! वे तो कोई देवता थे। तेरी त्रुटी के कारण आधा मटका रेत रह गया। मिट्टी की मिट्टी रह गई। आधा स्वर्ण का हो गया। कुम्हारी को अपनी कृतघ्नता का अहसास हुआ तथा रोने लगी। बोली कि मुझे पता होता तो उनकी बहुत सेवा करती। कबीर, करता था तब क्यों किया, करके क्यों पछताय। बोवे पेड़ बबूल का, आम कहाँ से होय।। इस प्रकार गोपीचंद और भरथरी जी अपने गुरू जी के वचन का पालन करके सफल हुए। जो अमरत्व उस साधना से मिलना था, वह भी अटल विश्वास करके साधना करने से हुआ। यदि विवेकहीन तथा विश्वासहीन होते तो विचार करते कि यह कैसी भक्ति? यह कार्य तो सारा संसार कर रहा है। मोक्ष के लिए तो तपस्या करते हैं या अन्य कठिन व्रत करते हैं। परंतु उन्होंने गुरू जी को गुरू मानकर प्रत्येक साधना की। गुरू जी के कार्य या आदेश में दोष नहीं निकाला तो सफल हुए। गोरखनाथ जी ने उनको जो नाम जाप करने का मंत्रा दे रखा था, उसका जाप वे दोनों पत्थर उठाकर निर्माण स्थान तक ले जाते तथा लौटकर पत्थरों को तरास (काँट-छाँट करके सीधा कर) रहे थे, वहाँ तक आते समय करते रहते थे। दोनों युवा थे। कार्य के परिश्रम तथा पूरा पेट न भरने के कारण मन में स्त्री के प्रति विकार नहीं आया और सफलता पाई। गुरू एक वैद्य होता है। उसे पता होता है कि किस रोगी को क्या परहेज देना है? क्या खाने को बताना है? यानि पथ्य-अपथ्य डॉक्टर ही जानता है। रोगी यदि उसका पालन करता है तथा औषधि सेवन अथार्त भक्त नाम जाप करता है तो स्वस्थ हो जाता है यानि मोक्ष प्राप्त करता है। इसी प्रकार गोपीचंद तथा भरथरी जी ने अपने गुरू जी के आदेश का पालन करके जीवन सफल किया। इसी प्रकार साधक को सफल होने के लिए गुरु के प्रत्येक आदेश को मन-कर्म-वचन से मानकर साधना करनी चाहिए। तभी पूर्ण मोक्ष शाश्वत धाम सतलोक प्राप्त होगा। Sa True Story YouTube #शराब_पीना_महापाप
शराब_पीना_महापाप - मुक्तिबोध ;i- (12I-121) अपने गुरूजी के आदेश पर गोपीचंद और भरथरी ने अलवर शहर के राजा के किले में पत्थर ढोने की नौकरी की। SPIRITUAL LEADER SANT RAMPAL JI m@@ @SAINTRAMPALJIM SUPREMEGOD.ORG SAINT RAMPAL JI MAHARAJ मुक्तिबोध ;i- (12I-121) अपने गुरूजी के आदेश पर गोपीचंद और भरथरी ने अलवर शहर के राजा के किले में पत्थर ढोने की नौकरी की। SPIRITUAL LEADER SANT RAMPAL JI m@@ @SAINTRAMPALJIM SUPREMEGOD.ORG SAINT RAMPAL JI MAHARAJ - ShareChat