“अगर मैं तुमसे प्रेम करूँ, तो तुमसे कुछ नहीं चाहूँगा…
तुम्हारा प्रेम भी नहीं।”
यह पंक्ति सुनते ही मन राधा-कृष्ण की ओर चला जाता है।
राधा का प्रेम इसलिए सर्वोच्च कहा गया क्योंकि उसमें अधिकार नहीं था, केवल समर्पण था।
उन्होंने कभी कृष्ण को बाँधना नहीं चाहा —
न विवाह की इच्छा,
न साथ रहने की शर्त,
न ही अपने प्रेम के बदले कुछ पाने की अपेक्षा।
कृष्ण वृंदावन छोड़ गए, पर राधा का प्रेम
विरह में और गहरा हो गया।
उन्होंने यह नहीं कहा —
“यदि प्रेम है, तो मेरे पास रहो।”
बल्कि उनका प्रेम दूरी में भी उतना ही निर्मल रहा।
भक्ति साहित्य में इसे “विरह भक्ति” कहा गया है —
जहाँ मिलन से अधिक तड़प साधना बन जाती है।
जहाँ भाव यह होता है —
“तुम्हारी प्रसन्नता, मेरे अधिकार से अधिक महत्वपूर्ण है।”
हमारी संस्कृति ने प्रेम को केवल पाने या बाँधने का
माध्यम नहीं माना,
बल्कि स्वयं को अर्पित कर देने की साधना माना है।
आज के समय में जहाँ प्रेम को अक्सर
possession और ownership से जोड़ा जाता है,
वहीं विरह भक्ति हमें सिखाती है कि
सच्चा प्रेम अधिकार नहीं, अर्पण होता है।
कभी कभी विरक्त होना पड़ता है प्रेम को
प्रेमी के उसके गंतव्य तक पहुचाने के लिए...
चेतना जाग्रत करनी होती है
कभी कभी प्रेम में समर्पण के लिए...
जैसे राधा* ने विरह चुनी कृष्ण से
कृष्ण* के लिए..
तुम्हें क्यों लगता है, उनका प्रेम आसान था
ईश्वरत्व होकर भी एक महान बलिदान था..
प्रेम को जकड़ा नहीं, जिया जाता है..
जरूरत पर विरह की पीड़ा को सहा जाता है..
प्रेम कोई पद नहीं,जिसे जीत लोगे तुम
जितना हारोगे, उतनी ही प्रेम जीतोगे तुम
ऐ ज्यादा गहरा हो गया तो बस इतना जान लो 🤗
प्रेम को बंधन नहीं, मुक्ति मान लो.. 😊 #❤️Love You ज़िंदगी ❤️ #💝 इज़हार-ए-मोहब्बत #💝 शायराना इश्क़ #💔मरीज-ए-इश्क❤ #🥰लव शायरी😘


