ShareChat
click to see wallet page
search
#🙏🏻अंतर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस #❤️जीवन की सीख #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #📖जीवन का लक्ष्य🤔 #👍 डर के आगे जीत👌
❤️जीवन की सीख - मजदूर दिवस  সমত সমন! मे लिखता हू क्षण क्षण नवसृजन - गाथा  श्रमिक दिवस विस्मृत करता नित्प ही निज जीवन ्व्यथा " मेरे श्रमर्बिदु पोषित करते राष्ट्र के वेभव को  श्रेय नहीतो भी अतृप्ति नहीं यही मेरी प्रथा।। सृजन उत्थान मे मेरी ही तो व्याप्ति ह सर्वथा " ৭ লিবরনা চৈনা ননমূতান ক্রী নিল নুনন ক্রথা;  मेरे मत समुन्नत करते परम पावन लोकतत्र को मजदूरों के सम्मान में मजदूर दिवस आएगा  विडबना फिरशी मेरे हित बनी कोई व्यवस्था? कया आर्ण इसका उसे कोई भानहो पायेगार दिवर्सों की भाति बह गति देगा कर्म को  0|प मे अन्न उगाता, आधी ही भूख स्वप की मिटाता  वह नित्प दुहराच मे सब कड्डवे पूट पी जाएगा।  निज कृश काया पर चिथड़े हीहू सदेव सजाता " देता हू सुंदर वसन मेरे हर देशवासी के तन को  आओ आज प्रण ले यह हम सव मिलकर " फिरशी मे अपने भाग से कर्यो वचित रह जाता? सस्मित रहे सव श्रमिक सृजक हर निशिबासर  कोई तड़पे नही कभी अपने प्राप्य को ননমে मेरे हथीड़े की अनुगूँज मे उठती हे स्वर लहरी  सरबरमे सर्बको मिल पाए अधिकार बराबरा।  जूझता हूॅनित सहन करता हू दुःख अतिभारी  WT WatTT M1u-=`{" mamtal प्रशात धीर गभीर सदा देय करता परिश्रम को ٠   M1Pn' स्वप्न देखता हू पर खुशहाली का राजग प्रहरी।।  पमिस  सृष्त 10 ನ[ತ &K {17೫ vermal | मजदूर हपर मजबूर मुझ्ो वर्यो समझा जाता? कुत्सा अपमान अवज्ञा पीद़्ा को डेल जाता  ٢١   देती बदन को वेदना पूभित करती '1+1 फिरभी॰एक आाशा दीपक लिए बठता णाता। मजदूर दिवस  সমত সমন! मे लिखता हू क्षण क्षण नवसृजन - गाथा  श्रमिक दिवस विस्मृत करता नित्प ही निज जीवन ्व्यथा " मेरे श्रमर्बिदु पोषित करते राष्ट्र के वेभव को  श्रेय नहीतो भी अतृप्ति नहीं यही मेरी प्रथा।। सृजन उत्थान मे मेरी ही तो व्याप्ति ह सर्वथा " ৭ লিবরনা চৈনা ননমূতান ক্রী নিল নুনন ক্রথা;  मेरे मत समुन्नत करते परम पावन लोकतत्र को मजदूरों के सम्मान में मजदूर दिवस आएगा  विडबना फिरशी मेरे हित बनी कोई व्यवस्था? कया आर्ण इसका उसे कोई भानहो पायेगार दिवर्सों की भाति बह गति देगा कर्म को  0|प मे अन्न उगाता, आधी ही भूख स्वप की मिटाता  वह नित्प दुहराच मे सब कड्डवे पूट पी जाएगा।  निज कृश काया पर चिथड़े हीहू सदेव सजाता " देता हू सुंदर वसन मेरे हर देशवासी के तन को  आओ आज प्रण ले यह हम सव मिलकर " फिरशी मे अपने भाग से कर्यो वचित रह जाता? सस्मित रहे सव श्रमिक सृजक हर निशिबासर  कोई तड़पे नही कभी अपने प्राप्य को ননমে मेरे हथीड़े की अनुगूँज मे उठती हे स्वर लहरी  सरबरमे सर्बको मिल पाए अधिकार बराबरा।  जूझता हूॅनित सहन करता हू दुःख अतिभारी  WT WatTT M1u-=`{" mamtal प्रशात धीर गभीर सदा देय करता परिश्रम को ٠   M1Pn' स्वप्न देखता हू पर खुशहाली का राजग प्रहरी।।  पमिस  सृष्त 10 ನ[ತ &K {17೫ vermal | मजदूर हपर मजबूर मुझ्ो वर्यो समझा जाता? कुत्सा अपमान अवज्ञा पीद़्ा को डेल जाता  ٢١   देती बदन को वेदना पूभित करती '1+1 फिरभी॰एक आाशा दीपक लिए बठता णाता। - ShareChat