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जहानाबाद टाइम्स में प्रकाशित लेख
इनका नाम अनिल कुमार श्रीवास्तव है।
वह पूर्वोत्तर रेलवे के इज्जतनगर मंडल के बरेली सिटी स्टेशन पर विद्युत विभाग में तैनात थे।
लेकिन यह उनकी पूरी पहचान नहीं है।
वह एक ज्योतिषाचार्य हैं।
एक साहित्यकार हैं।
एक समाजसेवक हैं।
एक कवि हैं।
साल 2002 में उन्होंने एक सपना देखा।
पूर्व राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम के जीवन से प्रेरित होकर उन्होंने उनकी पूरी जिंदगी को कविता में लिखने का फैसला किया।
उन्होंने राष्ट्रपति भवन से संपर्क किया।
काफी प्रयासों के बाद उन्हें इसकी अनुमति मिली।
उन्होंने दिन-रात मेहनत की।
ढाई सौ पन्नों की एक पूरी किताब लिखी—
हर शब्द कविता में,
हर पंक्ति में देशभक्ति,
हर भाव में प्रेरणा।
यह किताब आज की युवा पीढ़ी के लिए एक दिशा बन सकती थी।
लेकिन…
इनाम की जगह उन्हें सज़ा मिली।
रेलवे विभाग को उनका यह काम पसंद नहीं आया।
उन्होंने अनुमति मांगी—
मिली नहीं।
और फिर शुरू हुआ उत्पीड़न का सिलसिला।
साल 2010 में उन्हें नौकरी से निकाल दिया गया।
15 साल तक उन्होंने लड़ाई लड़ी।
कोर्ट ने उनके पक्ष में आदेश दिया।
उन्हें ड्यूटी पर वापस लिया गया।
लेकिन…
जैसे ही वह लौटे—
उन्हें तुरंत सस्पेंड कर दिया गया।
और फिर रिटायरमेंट दे दिया गया।
न्यायालय के आदेश को नजरअंदाज कर दिया गया।
उन्होंने हार नहीं मानी।
राष्ट्रपति को लिखा।
प्रधानमंत्री को लिखा।
रेल मंत्री, मुख्यमंत्री—सबको लिखा।
लेकिन कहीं सुनवाई नहीं हुई।
इस लड़ाई के बीच भी वह रुके नहीं।
उन्होंने नेत्रदान, रक्तदान, अंगदान के लिए लोगों को प्रेरित किया।
लावारिस शवों का अंतिम संस्कार किया।
अस्थियों का गंगा में विसर्जन किया।
उन्हें अटल बिहारी वाजपेई जैसे नेताओं से प्रशंसा पत्र मिले।
मेनका गांधी, राम नाईक जैसे लोगों ने सराहा।
लेकिन…
अपने ही विभाग ने उन्हें तोड़ दिया।
आज वह पूछते हैं—
“क्या साहित्यकार होना इतना बड़ा अपराध है?”
फिर भी…
वह अब भी लड़ रहे हैं।
क्योंकि कुछ लोग हारने के लिए नहीं,
सच्चाई के लिए जीने के लिए बने होते हैं। #❤️Love You ज़िंदगी ❤️


