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#✍ कविता 📓
✍ कविता 📓 - 9٨ ٤٤ सफर भी छूट जाएगा, शहर पैदा हुए थे हम, वो दर भी जाएगा, जहाँ छूट जाएगा , थे हम, जिस आँगन में गिरे जहाँ सीखा संभलना था, भी छूट कभी सोचा ना था हमने, वो घर जाएगा.. 9٨ ٤٤ सफर भी छूट जाएगा, शहर पैदा हुए थे हम, वो दर भी जाएगा, जहाँ छूट जाएगा , थे हम, जिस आँगन में गिरे जहाँ सीखा संभलना था, भी छूट कभी सोचा ना था हमने, वो घर जाएगा.. - ShareChat