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#❤️जीवन की सीख
❤️जीवन की सीख - क्या समझेगा कोई मेरे बर्दाश्त का मैंने वो वक्त भी जी कर अंदाज़ा. गुज़ारा है, जहाँ लोग मर जाने की दुआ करते हैं. मैं हँसती रही वहाँ, जहाँ अंदर से हर रोज़ थोड़ा-्थोड़ा मर रही थी. ম चलती रही वहाँ, जहाँ कदम उठाना भी बोझ लगता था. किसी ने नहीं देखा वो रातें , जहाँ नींद ( 3: साथ होते थे. नहीं, सिर्फ ক্িমী ने नहीं सुना वो खामोशी, জী चीख-चीख कर भी बाहर नहीं आ पाती ೫ हैं "तू मजबूत है" आज जो उन्हें कहते मजबूती नहीं. বমা পনা য मेरे दर्द की आखिरी हद है. क्या समझेगा कोई मेरे बर्दाश्त का मैंने वो वक्त भी जी कर अंदाज़ा. गुज़ारा है, जहाँ लोग मर जाने की दुआ करते हैं. मैं हँसती रही वहाँ, जहाँ अंदर से हर रोज़ थोड़ा-्थोड़ा मर रही थी. ম चलती रही वहाँ, जहाँ कदम उठाना भी बोझ लगता था. किसी ने नहीं देखा वो रातें , जहाँ नींद ( 3: साथ होते थे. नहीं, सिर्फ ক্িমী ने नहीं सुना वो खामोशी, জী चीख-चीख कर भी बाहर नहीं आ पाती ೫ हैं "तू मजबूत है" आज जो उन्हें कहते मजबूती नहीं. বমা পনা য मेरे दर्द की आखिरी हद है. - ShareChat