Sagar Singh
389 views • 1 months ago
अहंकारी व्यक्ति खुद को सबसे श्रेष्ठ साबित करना चाहते हैं जबकि नम्रता से युक्त व्यक्ति सबमें ईश्वर देखते हुए भक्ति का प्रेमानंद अमृत पा जाते हैं तो वहीं दूसरी तरफ ज्ञानी सबमें मौजूद ईश्वर को अपने मैं स्वरुप में अनुभव करते हैं।एक तो सबसे श्रेष्ठ बाहरी चीज है और सब में श्रेष्ठ भीतरी चीज है। सबसे श्रेष्ठ और सब में श्रेष्ठ दोनों ही परस्पर विरोधी शब्द है लेकिन अच्छे अच्छे विद्वानों को यह समझना मुश्किल लग सकता है । सबसे श्रेष्ठ होने वाले बाकी सब को अपने से नीचे घटिया साबित कर पाए तब होते हैं जैसे विश्वसुंदरी। जबकि सब में श्रेष्ठ के लिए कोई प्रतियोगिता नहीं किसी को नीचे दिखाना नहीं है और खुद को ऊपर साबित करना नहीं पड़ता है।बस ""सब घट मेरा साईंया खाली घट न कोई।"" हर जीव हर पदार्थ मतलब चराचर जगत में जीवित निर्जीव सभी में एक ही परमेश्वर सत्ता विराजमान है यही अनुभव कर लिया तो फिर हो गया --सब -में श्रेष्ठ=ईश्वर को विद्यमान देखें । फिर वो किस से घृणा करे किस पर फिदा हो मोहित होकर वासना ग्रस्त हो बेईमानी मांसाहार शराब दुराचार रिश्वतखोरी झूठ फरेब कपट मिलावट नहीं कर सकता और यदि किसी से किया मानो एकांत में या रात्रि में किसी तरुण सुन्दर स्त्री को देखते हुए वासना जागी तो फिर ईश्वर गायब हो गया और यदि रात्रि में किसी सुनसान जगह पर डाकु लुटेरे देखकर बहुत भयभीत हो गए तो भी ईश्वर गायब हो गया, ईश्वर को विद्यमान देखते हुए वासना या फिर डर, स्वार्थी लगाव या घृणा हो नहीं सकती और यदि हुई तो आप ईश्वर को भूल गए जो संतों शास्त्रों का सबसे बड़ा सुत्र है "*" वासुदेव: सर्वम् इति।"*" सागर सिमरोल 🙏🏻 #🌞 Good Morning🌞 #📖जीवन का लक्ष्य🤔 #❤️जीवन की सीख #🙏सुविचार📿 #Suvichar
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