🕉️हमारी संस्कृति हमारा गर्व🚩
#🇮🇳गर्व से कहो हम हिन्दू हैं🇮🇳 #श्रीमद्भागवत के आलोक में यह सिद्धान्त विशेष रूप से गौड़ीय वैष्णव परम्परा में प्रतिपादित किया जाता है कि भगवान एक ही परम तत्त्व हैं, परन्तु वे अनेक दिव्य स्वरूपों में अपनी लीलाओं का विस्तार करते हैं। इस परम्परा के अनुसार श्रीकृष्ण को मूल पुरुषोत्तम तथा अन्य विष्णु-स्वरूपों को उनके विस्तार (विलास/अंश) के रूप में समझा जाता है। अन्य वैष्णव सम्प्रदाय इस विषय की व्याख्या भिन्न प्रकार से कर सकते हैं।
श्रीकृष्ण – स्वयं भगवान
एते चांशकलाः पुंसः कृष्णस्तु भगवान् स्वयम्।
इन्द्रारि-व्याकुलं लोकं मृडयन्ति युगे युगे॥
(श्रीमद्भागवत 1.3.28)
वर्णित सभी अवतार भगवान के अंश या कला हैं, किन्तु श्रीकृष्ण स्वयं भगवान हैं।
इसीलिए भागवत का निष्कर्ष है कि व्रज में बाँसुरी बजाने वाले, गोप-गोपियों के प्रियतम, यशोदानन्दन श्रीकृष्ण ही समस्त अवतारों के मूल आश्रय हैं।
भगवान विष्णु के तीन पुरुषावतार:
जब सृष्टि की रचना, पालन और उसमें भगवान का प्रवेश होता है, तब वही श्रीकृष्ण तीन पुरुषावतारों के रूप में प्रकट होते हैं।
१. कारणोदकशायी (महाविष्णु):
अनन्त कारण-सागर में योगनिद्रा में स्थित महाविष्णु के रोमकूपों से असंख्य ब्रह्माण्ड प्रकट होते हैं।
यस्यैक-निश्वसित-कालमथावलम्ब्य
जीवन्ति लोम-विलजा जगदण्ड-नाथाः।
(ब्रह्मसंहिता 5.48)
यह पुरुषावतार सम्पूर्ण ब्रह्माण्डों की उत्पत्ति का कारण है।
२. गर्भोदकशायी विष्णु:
प्रत्येक ब्रह्माण्ड में प्रवेश करके भगवान गर्भोदकशायी विष्णु के रूप में स्थित होते हैं। उन्हीं की नाभि से कमल उत्पन्न होता है, जिस पर ब्रह्माजी प्रकट होते हैं।
भागवत (3.8) में इसका अत्यन्त सुन्दर वर्णन मिलता है।
३. क्षीरोदकशायी विष्णु:
फिर भगवान प्रत्येक जीव के हृदय में परमात्मा तथा क्षीरसागर में क्षीरोदकशायी विष्णु के रूप में स्थित होकर सम्पूर्ण जगत का पालन करते हैं।
अण्डान्तरस्थ-परमाणु-चयान्तरस्थं
गोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि॥
(ब्रह्मसंहिता 5.35)
अर्थात् वही भगवान प्रत्येक ब्रह्माण्ड में तथा प्रत्येक परमाणु के भीतर भी विराजमान हैं।
इन तीनों से भी परे हैं श्रीकृष्ण
श्रीमद्भागवत बताता है कि भगवान का सर्वोच्च धाम भौतिक सृष्टि से परे है।
न यत्र मायाऽ किमुतापरे हरिः।
(भागवत 2.9)
उस दिव्य धाम में न जन्म है, न मृत्यु, न काल का प्रभाव।
गौड़ीय वैष्णव परम्परा के अनुसार यही सर्वोच्च धाम गोलोक वृन्दावन है, जहाँ श्रीकृष्ण नित्य अपनी मधुर लीलाओं में विराजते हैं।
ब्रह्मसंहिता (5.29) में वर्णन है—
चिन्तामणि-प्रकर-सद्मसु कल्पवृक्ष-
लक्षावृतेषु सुरभीरभिपालयन्तम्।
लक्ष्मी-सहस्र-शत-सम्भ्रम-सेव्यमानं
गोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि॥
अर्थात् चिन्तामणि से बने भवनों, कल्पवृक्षों और सुरभि गौओं से युक्त गोलोक में अनन्त लक्ष्मियाँ श्रद्धापूर्वक जिनकी सेवा करती हैं, वे आदि पुरुष श्रीगोविन्द हैं।
इस प्रकार गौड़ीय वैष्णव दृष्टि से क्रम इस प्रकार समझा जाता है—
सर्वोच्च परम तत्त्व — श्रीकृष्ण (स्वयं भगवान)
प्रथम विस्तार — महाविष्णु (कारणोदकशायी)
द्वितीय विस्तार — गर्भोदकशायी विष्णु
तृतीय विस्तार — क्षीरोदकशायी विष्णु (परमात्मा)
अर्थात् सृष्टि के संचालन के लिए भगवान विष्णु तीन पुरुषावतारों में प्रकट होते हैं, किन्तु इन सबका मूल आश्रय श्रीकृष्ण माने जाते हैं। इसलिए भक्तजन कहते हैं कि सर्वेश्वर श्रीकृष्ण नित्य गोलोकधाम में विराजमान हैं और उन्हीं से समस्त विष्णु-स्वरूप एवं अवतार प्रकट होते हैं।
अन्त में श्रीमद्भागवत का सार यही है कि परम सत्य केवल ऐश्वर्यमय भगवान ही नहीं, अपितु प्रेमस्वरूप, रसस्वरूप, गोपाल श्रीकृष्ण हैं—जो गोलोक में नित्य विहार करते हुए अनन्त ब्रह्माण्डों का संचालन अपने विभिन्न दिव्य विस्तारों के माध्यम से करते हैं।
~जय श्री कृष्ण~
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