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Mishthi
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My rule - Tit For Tat😎
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*Relation is a Bond* *between persons who* *may not be equal in :* *Qualification*, *Talent*, *Money*, *or* *Age*, *But equal in their* *Commitment to* *understand* *each other.*
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Mishthi
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कितने लोगों को गुनहगार ना होने के बाबजूद सजा भोगने पर मजबूर होना पड़ा , अब समय आगया हमे अपने देश में शांति और सौहार्द का वातावरण चाहिए वह ऑटो सिटी एक्ट का विरोध करना हीहोगा। क्यों कि इसकी आड़ में सामान्य वर्ग प्रताड़ित किया जा रहा है । सब से अधिक भूमि के अतिक्रमण से संबंधित केस हैं । हमे हिम्मत करके जो झूठे केस में बंद है उनको मोरल सपोर्ट देना होगा और उनके लिए न्याय की लड़ाई निष्पक्ष होकर लड़नी होगी। इसी तरह आरक्षण की व्यवस्था 10 वर्ष तक के लिए की गई थी लेकिन आज आरक्षण के कारण योग्य रोड़ों पर घूम रहे हैं और आयोज्ञों के हाथों में महत्वपूर्ण बाग डोर है । हर क्षेत्र में देखिए। सभी व्यवस्थाओं को सुचारू रूप से संचालित करने के लिए व्यवस्थाओं को ठीक करना बहुत जरूरी है और इस पर एक बहुत लंबी बहस होने की आवश्यकता है और धरातल पर ठोस कार्य करने की भी आवश्यकता है। व्हाट्सएप और फेसबुक पर नहीं ग्राउंड लेवल पर।
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भुने हुए चने में खतरनाक पीला रंग मिला हुआ है😡😡
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*ब्राह्मण* " न ब्राह्मणान् परीक्षेत दैवे कर्मणि धर्मवित् । महान् भवेत् परीवादो ब्राह्मणानां परीक्षणे ।। " धर्म को जानने वाले पुरुष को देवसम्बन्धी कार्य में ब्राह्मणों की परीक्षा नहीं करनी चाहिए - क्योंकि ब्राह्मणों की परीक्षा करने से ब्राह्मणों की बडी निन्दा होती है । " श्वत्वं प्राप्नोति निन्दित्वा परीवादात् खरो भवेत् । कृमिर्भतवत्यभिभवात् कीटो भवति मत्सरात् ।। " ब्राह्मणों की निन्दा करने वाला मनुष्य कुत्ते की योनि में जन्म लेता है -- उस पर दोषारोपण करने से अगले जन्म गधा बनता है और उसका तिरस्कार करने से कृमि होता है तथा उसके साथ द्वेष करने से वह कीडे की योनि में जन्म पाता है । " दुर्वता वा सुवृता वा प्राकृता वा सुसंस्कृताः। ब्राह्मणा नावमन्तव्या भस्मच्छन्ना इवाग्नयः।। ब्राह्मण चाहे दुराचारी हों या सदाचारी - संस्कारहीन हों या संस्कारों से सम्पन्न - उनका अपमान नहीं करना चाहिए -- क्योंकि वे भस्म में ढकी हुई आग के तुल्य हैं । " क्षत्रियं चैव सर्पं च ब्राह्मणं च बहुश्रुतम् । नावमन्येत मेधावी कृशानपि कदाचन ।। बुद्धिमान पुरूषों को चाहिए कि क्षत्रिय - साँप और विद्वान ब्राह्मण यदि कमजोर हों तो भी उनका अपमान नहीं करना चाहिए। क्योंकि ये तीनों अपमानित होकर किसी का भी सर्वनाश कर सकते हैं " यथा सर्वास्ववस्थासु पावको दैवतं महत् । तथा सर्वास्ववस्थासु ब्राह्मणो दैवतं महत्।। जिस प्रकार सभी अवस्थाओं में अग्नि महान देवता है -- उसी प्रकार सभी अवस्थाओं में ब्राह्मण महान देवता है । कारण की अग्नि - गौ और ब्राह्मण परमेश्वर के तीन मुख हैं । अंगहीन - काने - कुबडे और बौने - इन सब ब्राह्मणों को देवकार्य में वेद पारंगत विद्वान ब्राह्मणों के साथ नियुक्त करना चाहिए। #ब्राह्मण_की_परीक्षा_पितर_संबंधी_कार्यों_में_करनी_ #चाहिए । " ब्राह्मणाः सर्वभूतानां धर्मकोशस्य गुप्तये । किं पुनर्ये च कौन्तेय संध्यां नित्यमुपासते।। " भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं - हे कौन्तेय ! सारे #प्राणियों_के_धर्म_रूपी_खजाने_की_रक्षा_करने_के_लिए #साधारण_ब्राह्मण_भी_समर्थ_है - फिर जो नित्य सन्ध्योपासन करते हैं - उनके विषय में तो कहना ही क्या है । जिसके मुख से देवगण हविष्य का और स्वर्गवासी पितर कव्य का भक्षण करते हैं -- उससे बढकर कौन प्राणी हो सकता है । " #उत्पत्तिरेव_विप्रस्य_मूर्तिर्धर्मस्य_शाश्वती । #स_हि_धर्मार्थमुत्पन्नो_ब्रह्मभूयाय_कल्पते ।। " ब्राह्मण जन्म से ही धर्म की सनातन मूर्ति है - वह धर्म के लिए ही उत्पन्न हुआ है और वह ब्रह्मभाव को प्राप्त होने में समर्थ है । #स्वमेव_ब्राह्मणो_भुङ्क्ते_स्वयं_वस्ते_ददाति_च । #आनृशंस्याद्_ब्राह्मणस्य_भुञ्जते_हीतरे_जनाः ।। #तस्मात्_ते_नावमन्तव्या_मद्भक्ता_हि_द्विजाः_सदा ।। ब्राह्मण अपना ही खाता है - अपना ही पहनता है - और अपना ही देता है - दूसरे मनुष्य ब्राह्मण की दया से ही भोजन करते हैं - अतः अतः ब्राह्मणों का कभी अपमान नहीं करना चाहिए -- क्योंकि वे सदा मुझ में भक्ति रखने वाले हैं ।वशिष्ठ.!! ❗जय महादेव❗ प्रश्न नहीं स्वाध्याय करें‼️
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ये नव वर्ष हमे स्वीकार नहीं है अपना ये त्यौहार नहीं है अपनी ये तो रीत नहीं है अपना ये व्यवहार नहीं | धरा ठिठुरती है सर्दी से आकाश में कोहरा गहरा है बाग़ बाज़ारों की सरहद पर सर्द हवा का पहरा है | सूना है प्रकृति का आँगन कुछ रंग नहीं , उमंग नहीं हर कोई है घर में दुबका हुआ नव वर्ष का ये कोई ढंग नहीं | चंद मास अभी इंतज़ार करो निज मन में तनिक विचार करो नये साल नया कुछ हो तो सही क्यों नक़ल में सारी अक्ल बही | उल्लास मंद है जन -मन का आयी है अभी बहार नहीं ये नव वर्ष हमे स्वीकार नहीं है अपना ये त्यौहार नहीं | ये धुंध कुहासा छंटने दो रातों का राज्य सिमटने दो प्रकृति का रूप निखरने दो फागुन का रंग बिखरने दो | प्रकृति दुल्हन का रूप धार जब स्नेह – सुधा बरसायेगी शस्य – श्यामला धरती माता घर -घर खुशहाली लायेगी | तब चैत्र शुक्ल की प्रथम तिथि नव वर्ष मनाया जायेगा आर्यावर्त की पुण्य भूमि पर जय गान सुनाया जायेगा | युक्ति – प्रमाण से स्वयंसिद्ध नव वर्ष हमारा हो प्रसिद्ध आर्यों की कीर्ति सदा -सदा नव वर्ष चैत्र शुक्ल प्रतिपदा | अनमोल विरासत के धनिकों को चाहिये कोई उधार नहीं , ये नव वर्ष हमे स्वीकार नहीं है अपना ये त्यौहार नहीं है अपनी ये तो रीत नहीं है अपना ये त्यौहार नहीं | -राष्ट्रकवि रामधारीसिंह दिनकर
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