Radhey Krishna
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५२ ह व्ह्यू · ४७६ प्रतिक्रिया | 🏗️ घर की उम्र 100 साल बढ़ानी है? इन 5 Products के बिना घर मत बनाना! 🏠✨ . . नमस्ते दोस्तों! 🙏 क्या आप जानते हैं कि एक छोटा सा केमिकल आपके घर को लाखों के नुकसान से बचा सकता है? अक्सर लोग पेंट और टाइल्स पर तो खूब पैसा लगाते हैं, लेकिन उन 5 जरूरी चीजों को भूल जाते हैं जो घर को अंदर से फौलाद बनाती हैं। आज मैं (गगन साहू) आपको बताऊंगा वो 5 'Master' प्रोडक्ट्स जो आपके घर की लाइफ बढ़ा देंगे। 🛠️ घर की मजबूती के लिए 5 जरूरी प्रोडक्ट्स: Anti-Termite Chemical: नींव के समय ही दीमक का इलाज करें, ताकि आपकी लकड़ी की चौखट और अलमारियाँ सुरक्षित रहें। Bitumen Layer / DPC: प्लिंथ बीम पर इसे जरूर लगाएं। यह जमीन की नमी (Seepage) को दीवारों में ऊपर चढ़ने से रोकता है। Fibre Mesh (जाली): कॉलम और दीवार के जॉइंट पर प्लास्टर से पहले इसे लगाएं। भविष्य में आने वाले क्रैक्स हमेशा के लिए बंद! Dr. Fixit Plaster Master: प्लास्टर के मसाले में इसे मिलाएं। यह प्लास्टर की मजबूती बढ़ाता है और सीलन को रोकता है। Pidifin 2K Coating: बाथरूम में टाइल्स लगाने से पहले इसके 2 कोट जरूर लगाएं। नीचे वाले कमरों में कभी पानी नहीं टपकेगा। 💡 गगन भाई की प्रो-टिप: मजबूत घर पेंट से नहीं, सही तकनीक और सही मटेरियल से बनता है। इन 5 चीजों पर आज किया गया छोटा सा खर्च, कल के लाखों रुपये बचाएगा! 💪✨ 👇 Comment में बताएं: क्या आपने घर बनाते समय इनमें से किसी प्रोडक्ट का इस्तेमाल किया है? जानकारी काम की लगी हो तो अपने पेज Gagan Sahu 513 को फॉलो करें और इसे अपने दोस्तों के साथ Share जरूर करें! ↗️👷‍♂️ #GaganGharNirman #ConstructionTips #HomeConstruction #Waterproofing #AntiTermite #CivilEngineering #Build #facebookpost #India #civilengineering | Gagan Sahu513
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*प्रकाशनार्थ आलेख* *नर्मदा जी में हुई विज्ञान की हत्या* ********** मध्य प्रदेश में अवैध बालू के कारण उजड़ रही नर्मदा नदी उस समय दुखी हो गई जब कुछ अंध विश्वासियों ने नदीं में 11 हज़ार लीटर दूध का टैंकर उड़ेल दिया। वास्तव में यह श्रद्धा नहीं, बल्कि नदी के पर्यावरण और उसमें जीने वाले जीवों सहित विज्ञान की हत्या समान है। किसी भी नदी में दूध प्रवाहित करना एक ऐसी गतिविधि है जो श्रद्धा या परंपरा के नाम पर की जाती है, लेकिन वैज्ञानिक और पर्यावरणीय दृष्टि से यह जल और जल-जीवों के लिए अत्यंत हानिकारक है। नदी के पारिस्थितिकी तंत्र पर इसके मुख्य प्रतिकूल प्रभाव निम्नलिखित हैं: *1. ऑक्सीजन का कम होना* दूध एक कार्बनिक पदार्थ है। जब दूध पानी में मिलता है, तो पानी में मौजूद बैक्टीरिया इसे तोड़ने या विघटित करने की प्रक्रिया शुरू कर देते हैं। इस प्रक्रिया में बहुत अधिक मात्रा में घुलनशील ऑक्सीजन की खपत होती है। इसे वैज्ञानिक भाषा में BOD (Biological Oxygen Demand) का बढ़ना कहते हैं। जब ऑक्सीजन का स्तर गिरता है, तो मछलियां और अन्य जलीय जीव दम घुटने के कारण मरने लगते हैं। *2. पानी का सड़ना और दुर्गंध* दूध में फैट (वसा), शुगर (लैक्टोज) और प्रोटीन (कैसीन) होता है। बहते पानी की तुलना में अगर पानी स्थिर है या प्रवाह कम है, तो दूध वहां सड़ने लगता है। इससे पानी में अमोनिया और अन्य हानिकारक गैसें पैदा होती हैं, जिससे पानी पीने योग्य नहीं रहता और वहां से दुर्गंध आने लगती है। *3. शैवाल का अत्यधिक बढ़ना* दूध में फॉस्फोरस और नाइट्रोजन जैसे पोषक तत्व होते हैं। ये तत्व नदी में शैवाल की वृद्धि को असामान्य रूप से बढ़ा देते हैं। इसे 'एल्गल ब्लूम' कहते हैं। यह शैवाल नदी की सतह को ढक लेता है, जिससे सूरज की रोशनी पानी के नीचे नहीं जा पाती। रोशनी के बिना जलमग्न पौधे प्रकाश संश्लेषण नहीं कर पाते, जिससे जलीय चक्र पूरी तरह बिगड़ जाता है। *4. बैक्टीरिया और सूक्ष्मजीवों का असंतुलन* दूध के कारण पानी में रोगाणुओं (पैथोजेंन) की संख्या बढ़ सकती है। यह न केवल मछलियों के लिए, बल्कि उस नदी का पानी इस्तेमाल करने वाले मनुष्यों और पशुओं के लिए भी बीमारियों का कारण बन सकता है। *5. चिकनाई की परत* दूध में मौजूद वसा पानी की सतह पर एक सूक्ष्म परत बना सकती है, जो हवा से ऑक्सीजन के पानी में घुलने की प्रक्रिया को बाधित करती है। समझना होगा कि नदियाँ स्वयं को साफ करने की क्षमता रखती हैं, लेकिन जब उनमें भारी मात्रा में ऐसी चीजें डाली जाती हैं जिन्हें वे पचा नहीं सकतीं, तो वे 'मृत' होने लगती हैं। जल जीवन की रक्षा के लिए प्रतीकात्मक रूप से केवल कुछ बूंदें या जल का अर्पण करना पर्यावरण के अनुकूल विकल्प है। इस साल लखनऊ के कई शिवालयों में शिवलिंग पर चढ़ने वाले दूध को नाली में बहाने की जगह एकत्र कर कुपोषित बच्चों को पिलाने की अभिनव कार्य योजना सफल रही है। लेकिन उससे भी इन अंध विश्वासी लोगों ने कोई सीख नहीं ली। लखनऊ के कलेक्टर अविरल आनंद द्वारा उस क्षेत्र के कुछ शिव मंदिरों में शिवरात्रि के अवसर पर चढ़ाया गया दूध बच्चों और जरूरतमंदों में वितरण की योजना बनाई गई थी, ताकि यह *अपवित्र बहने* की बजाय सामाजिक दान और बच्चों की पोषण‑सहायता के रूप में काम आए। इस नर्मदा में दूध प्रवाहित करने का यह नाटक विज्ञान, पर्यावरण, जैव विविधता और धर्म, सभी दृष्टि से हानिकारक और अनुचित है। पढ़े लिखे समाज को इस तरह के ढोंग धतूरों से बाज आना चाहिए। डॉ परशुराम तिवारी भोपाल 9425065132 #📹 ट्रेंडिंग वीडियो #🌞 Good Morning🌞
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