परमहंस परिव्राजकाचार्य श्रीमद वासुदेवानंद सरस्वती (टेम्बे स्वामी) महाराज चरित्रसार.
परमहंस परिव्राजकाचार्य श्रीमद वासुदेवानंद सरस्वती महाराज (जिन्हें हम परम पूज्य टेम्बे स्वामी के नाम से भी जानते है ) का जन्म इसवी सन १८५४ के श्रावण माह के कृष्णपक्ष की पंचमी तिथि को सावंतवाड़ी के पास स्थित माणगाँव नामक गाँव में रहने वाले एक धार्मिक ब्राह्मण-परिवार में हुवा था. उनके पिता का नाम श्री गणेश टेम्बे और माता का नाम सौ. रमाबाई था.
बचपन में श्री टेम्बे स्वामी का नामकरण वासुदेव ऐसा हुवा था. जब उनके पिता श्री गणेश टेम्बेजी गाणगापुर में थे तब उन्हें भगवान दत्तात्रेयजी का साक्षात्कार होता है जिसमे उन्हें माणगाँव जाकर गृहस्थाश्रम का पालन करने का आदेश होता है, साथ ही भगवान दत्तात्रय उन्हें उनके पुत्र के रूप में अवतार लेने का वचन भी देते है.
जब बालक वासुदेव ८ वर्ष के थे तब उनके दादाजी श्री हरी भटजी उनका यज्ञोपवित संस्कार करवा देते है. बालक वासुदेव अपनी प्रतिबद्धता, कुशाग्रता व दिव्य स्मरणशक्ति से शीघ्र ही अपनी वैदिक शिक्षा पूर्ण कर लेते है और पोरोहित्य आदि कार्य के उत्तम ज्ञाता बनकर अपने परिवार की आजीविका में अपना योगदान देते है.
अपनी प्रतिबद्धता व योग साधना से अर्जित अतीन्द्रिय शक्तियों का उपयोग युवा वासुदेव दीन-दुखियो के दुःख व कष्ट दूर करने में प्रयुक्त करते है. अपने शिक्षको के आग्रह पर उन्हें २१ वर्ष की उम्र में विवाहबद्ध होना पड़ा था. अपनी २३ वर्ष की आयु में उन्हें अपने पवित्र व सुह्रदय पिता (जिनकी उम्र उस वक्त ५६-५७ वर्ष थी) का वियोग सहना पड़ा था.
स्वामीजी की माताजी व उनकी धर्मपत्नी सौ.अन्नपूर्णाजी में अक्सर पारिवारिक बातो को लेकर कलह होता रहता था. युवा वासुदेवजी के जीवन में शांति न होने के कारण उनका सांसारिक मोहभंग अत्यंत तीव्र गति से हो गया था. आगे चलकर युवक वासुदेब नर्सोबावाड़ी की यात्रा करते है जहा उन्हें श्री गोविन्दस्वामी और मौनीस्वामी मार्गदर्शित करते है.
भगवन दत्तात्रेय के दृष्टांत होने पर वासुदेव शास्त्री माणगाँव में इसवी सन १८८३ में दत्त मंदिर अनुस्थापित करते है. शीघ्र ही यह मंदिर प्रसिद्धि को प्राप्त हो जाता है और वहा भाविकजन अत्याधिक संख्या में दर्शन करने आने लगते है. अब श्रीवासुदेव शास्त्री को सम्मानपूर्वक वासुदेवबुवा कहकर संबोधित किया जाने लगा था.
भगवान दत्तात्रेयजी के निर्देशानुसार माणगाँव में ७ वर्ष व्यतीत करने के बाद स्वामीजी अपनी गर्भवती पत्नी को साथ लेकर माणगाँव छोड़कर नर्सोबावाड़ी में आ जाते है. कुछ ही समय बाद सौ. अन्नपूर्णा देवी एक मृत शिशु को जन्म देती है.
इसवी सन १८९१ में भगवान दत्तात्रेय बुवा को उत्तर की तरफ जाने के लिए निर्देशित करते है. गंगाखेड नामक स्थान पर उनकी समर्पित पत्नी का हैजे की बीमारी से देहावसन हो जाता है. १४ दिवसों के शोक के बाद वासुदेवबुवा की इच्छानुसार भगवान दत्तात्रेय उन्हें सन्यास ग्रहण करवा देते है और उज्जयिनी जाकर नारायणानंद सरस्वती स्वामी महाराज से दंड ग्रहण करने का निर्देश भी देते है. नारायणानंद सरस्वती स्वामी महाराज वासुदेवबुवा को दंड प्रदान करते है और सन्यास धर्म के अनुसार उनका नामकरण श्रीवासुदेवानंद सरस्वती ऐसा करते है. आगे चलकर भगवान दत्तात्रेय उन्हें उनके जीवन का उद्देश्य बताते हुवे उन्हें संपूर्ण भारतभ्रमण करते हुवे वैदिक धर्म का प्रचार करने और वर्णाश्रम धर्म से विमुख लोगो का मार्गदर्शन करने का निर्देश देते है.
अगले २३ वर्षो तक टेम्बे स्वामी अपने कठोर सन्यास धर्म का पालन करते हुवे सम्पूर्ण देश में भ्रमण करते है. स्वामीजी मध्यम कद-काठी के थे. उनका वर्ण श्याम था. उनकी निगाहे गहरी व तेजपूर्ण थी जो किसी के भी मानस की गहराई में जाकर उसके चित्त को भाप लेती थी. उनकी वाणी मृदु पर अत्यंत स्पष्टवादिता से परिपूर्ण थी. उनका संग्रह सिर्फ ४ लंगोटिया, २ पोशाखे, १ दंड , १ कमण्डलु , १ उपनिषद् की पुस्तक, १ पूजा के बर्तनों से भरा संदूक, भगवान दत्तात्रेय की २ मुर्तिया, १ कुवे से पानी निकालने की रस्सी व लेखन सामग्री तक ही सीमित था. कभी-कभी वे एक उनी शाल का प्रयोग भी कर लेते थे.
वे अपने कपडे स्वयं धोते थे और पैरो में कोई पदत्राण धारण किये बिना ही पदयात्रा किया करते थे.
एक बार उनके एक भक्त ने उनके पैरो से २० धसे हुवे काटे निकाले थे जबकि स्वामीजी ने कभी ऐसा न तो चाहा था न हि ऐसा कोई संकेत दिया था. स्वामीजी अत्यंत विपरीत जलवायु में घने वनों, उष्ण मरुस्थलो व उचे पर्वतीय रास्तो से सिर्फ एक वस्त्र पहने ही भ्रमण किया करते थे. उनके अधिकांश चातुर्मास छोटे गांवो व दूरवर्ती स्थानों पर हुवे थे.
स्वामीजी के जीवन का एकमात्र उद्देश भगवान दत्तात्रेय की आज्ञापालन करने का था और उनकी सारी क्रियाये भगवान दत्तात्रेय को समर्पित थी. स्वामीजी वैसे तो मूलरूप से संकोची व एकाकी जीवन व्यतीत करने वाले व्यक्ति थे पर उन्हें अपने जीवन का एक लम्बा समय जनसमुदायों की भीड़ में गुजारना पड़ा था.
सभी लोगो को वे समान रूप से उपलब्द्ध होते थे. अत्यंत शुचिता का पालन करने के बावजूद भी उनके यहाँ किसी से भी भेदभाव नहीं होता था. हर जात-पात के लोग उनकी कृपा का प्रसाद प्राप्त करते थे. स्वामीजी सभी लोगो के प्रति अत्यंत संवेदनशील थे और अत्यंत सहानभूतिपुर्वक सभी लोगो के दुःख व समस्याओं को सुनकर उस पर उचित मार्गदर्शन किया करते थे. उनके मार्गदर्शन का यथासांग पालन करने पर लोगो के सारे दुःख-दर्द दूर हो जाते थे.
इसवी सन १९१० में नरसोबावाड़ी के वास्तव्य के दौरान वे पुजारी लोगो को हैजे की महामारी की रोकथाम के लिए भगवान दत्तात्रेय की पादुको का अभिषेक करने के लिए निर्देशित करते है. लोगो के पूछने पर कि अभिषेक से कैसे महामारी की रोकथाम होगी, तब स्वामीजी समझाते है :-“मृत्यु भी ईश्वर का ही एक रूप है और यह महामारी उसकी शक्ति है और भगवान को शास्त्रोक्त विधि से प्रसन्न करने से ये शक्तिया भी शांत हो जाती है.” जब स्वामीजी के कहेनुसार अभिषेक होता है तब महामारी टल जाती है.
शारदा पीठ के शंकराचार्य श्री राजराजेश्वरस्वामी हरिद्वार में टेम्बे स्वामी के साथ चातुर्मास (यह टेम्बे स्वामी का का ३ रा चातुर्मास था ) संपन्न करने के बाद टेम्बे स्वामी के असीम प्रशंसक बन गए थे. अपने १७ वे चातुर्मास के समय तंजावर में कावेरी नदी के किनारे से प्रवास करते हुवे टेम्बे स्वामीजी को जब पता चलता है है कि श्रुंगेरीपीठ के शंकराचार्य श्री नरसिंहभारती श्रीरंगम में रुके हुवे है तो टेम्बे स्वामी भी वहा उनका अभिवादन करने चले जाते है.
शंकराचार्यजी श्रीस्वामी को देखकर अत्यंत प्रसन्न हो जाते है. टेम्बे स्वामी शरदाम्बा व शंकराचार्यजी की स्तुति में स्तोत्रो की रचना करते है. शंकराचार्यजी भी एक स्तोत्र के रूप में टेम्बे स्वामी की स्तुति लिखते है औरउनकी भिक्षा का प्रबंध भी करवा देते है.
बाद में शंकराचार्यजी अपने शिष्यों को संबोधित करते हुवे टेम्बे स्वामीजी के बारे में सम्मानजनक शब्द कहते है :-“आप नहीं जानते है कि हमारे बीच आज पधारे टेम्बे स्वामी कौन है ? वे साक्षात दत्त प्रभु के अवतार है जो उनके माता-पिता की गहरी भक्ति और सद्गुणों के कारण टेम्बे स्वामी के रूप में अवतरित हुवे है. इनका वैदिक धर्म को पुनर्जीवित करने का सतत यत्न आदिशंकराचार्यजी के समान ही है. टेम्बे स्वामी ने अपने जीवन में अत्यंत कठोर रूप से अपने वैदिक वर्णाश्रम-धर्म का पालन करते हुवे अनेक स्त्री-पुरुषो का धार्मिक और आध्यात्मिक उद्धार किया है. कन्याकुमारी से हिमालय तक का प्रवास पदयात्रा द्वारा करते हुवे इन्होने राह में मिले अनेक साधको को उनकी पात्रता के अनुरूप कर्ममार्ग, ज्ञानमार्ग व भक्तिमार्ग का उपदेश करा है. हम ईश्वर से प्रार्थना करते है कि वह उन्हें दीर्घायु प्रदान करे जिससे वे अपने वैदिक धर्म के उत्थापन का कार्य और आगे बढ़ा सके.”
इसवी सन १९०५ में वाड़ी से पंढरपुर जाते समय कमलापुर नाम के स्थान पर उन्हें स्वप्न में एक लम्बे कद का आजानुबाहु (जिसके हाथ उसके घुटनों तक पहुचते हो) व्यक्ति आकर कहता है :- “ अरे तुम्ह भारतभर पदयात्रा करते हो, काव्य-रचना भी करते हो, फिर भी अब तक तुम्हारा ध्यान मेरी और कैसे नहीं गया ?”
सुबह उठकर स्वामीजी भगवान दत्तप्रभु से स्वप्न में आये व्यक्ति के बारे में जानकारी चाहते है और जिस पर दत्तप्रभु उन्हें बताते है कि वह दिव्य व्यक्ति अक्कलकोट के स्वामी समर्थ है और वे चाहते है कि आप अक्कलकोट जावे और उनके जीवन पर एक काव्य की रचना करे. दत्त महाराज के कहे अनुसार टेम्बेस्वामी अक्कलकोट जाते है.
पुंडलिकराव नाम के एक सज्जन शिर्डी के साईंबाबा के प्रमुख शिष्य थे. वे स्वामीजी से (जब टेम्बे स्वामी का मुक्काम राजमहेंद्री में था ) मिलते है. पुंडलिकराव अपनी कीर्तनसेवा भी पेश करते है. आगे चलकर पुंडलिकराव शिर्डी जाकर साईबाबा के दर्शन करने वाले थे. यह बात जानकर टेम्बे स्वामी उन्हें एक नारियल अपने ह्रदय से लगाकर देते है और कहते है कि इसे मेरे भाई साईबाबा को दे देना.
शिर्डी जाते समय पुंडलिकराव और उनके सह-प्रवासी कोपरगाँव में विश्राम करते है. पुंडलिकराव अपना आन्हिक करने उन लोगो से कुछ दूर जाते है तब उनके सह -प्रवासी नाश्ता करना प्रारंभ कर लेते है. नाश्ते में चिवडा अत्यंत मसालेदार और तीखा होने से सबको पानी की प्यास लगती है पर वह गर्मी के दिन होने से कही भी पानी आसानी से उपलब्द्ध नहीं था.
उनमे से कुछ सुज्ञजन पानी के न होने की स्थिति में अपने साथ रखे हुवे नारियलो को खाने का प्रस्ताव रखते है जिससे सबके जलते हुवे मुखों को कुछ राहत मिले. पर इस दौरान टेम्बे स्वामी का दिया हुवा नारियल भी खा लिया जाता है.
जब वे लोग शिर्डी पहुचाते है तब पुंडलिकराव साईं बाबा द्वारा किये उपेक्षित व्यव्हार से व्याकुल हो उठते है. फिर उन्ह सब लोगो की और पीठ करके साईबाबा कहते है:-“अरे चोरो और दुष्टों !, मेरे भाई द्वारा दिया हुवा नारियल कहा है ? मुझे पहले मेरा नारियल ला कर दो.”
पुंडलिकराव जो इस सब घटनाक्रम से अबतक अनभिद्य थे, वह अपने सह प्रवासियों से नारियल के बारे में पूछते है तब कही जाकर नारियल के खा लिए जाने के धर्म-अपराध के बारे में उन्हें पता चलता है.
असल में, पुंडलिक राव व उनके सह-प्रवासियों द्वारा टेम्बेस्वामी द्वारा दिए हुवे नारियल का यथायोग्य सम्मान न करने व उसकी सही ढंग से सुरक्षा न करने के कारण घटित हुवे धर्म-अपराध के लिए साईबाबा दिखावटी क्रोध दिखाते हुवे हलकी फटकार लगाकर उन लोगों को समझाइश दे देते है.
सन १९०५ में अपनी विदर्भ यात्रा के दौरान स्वामी महाराज शेगांव में पधारते है. उनके वहा आने के एक दिन पहिले हि गजानन महाराज ने अपने भक्तो को निर्देशित कर रखा था:-“ मेरा एक सुज्ञ भाई जो कि कर्हाड़े ब्राह्मण है, यहाँ पर आ रहा है. वे अत्यंत धर्मनिष्ठ है. उनके रास्ते में कोई भी कपडे की चिंदी या कोई ऐसा-वैसा पदार्थ जिससे उनके सोवले की शुचिता भंग हो, नहीं आना चाहिए.”
जब टेम्बेस्वामी आते है तब गजानन महाराज अपनी ही धुन में अपनी उंगलिया चटका रहे थे.
जैसे ही टेम्बे स्वामी वहा पहुचते है, गजानन महाराज का उंगलिया चटकाना बंद होता है और दोनों संत एक दुसरे को स्मित व प्रसन्न मुख से प्रेमपूर्वक निहारते है. वहा मुश्किल से ही कोई शब्द उच्चारित होता है वे सिर्फ एक दुसरे के साथ का रसस्वादन करते है.
कुछ देर बाद जब टेम्बे स्वामी गजानन महराज की आज्ञा लेते है तब गजानन महाराज सिर्फ इतना कहते है- “बहुत अच्छा”.
नरसी में एक दोपहर को स्वामी महाराज स्नान करने के लिए जहा नदी पर गए थे, तभी वहा गाव की एक महिला पानी भरने के लिए आती है. वह वहा टेम्बे स्वामी को अपनी गोद में ६ माह के एक शिशु को लेकर बैठे हुवे देखती है जो अपना बाया अंगूठा चूसते हुवे टेम्बे स्वामी को निहार रहा था और स्वामीजी भी उसे प्रेमपूर्वक दृष्टी से मानो प्रति-उत्तर दे रहे थे.
यह देखकर वह महिला अपनी सुध-बुध खोकर अपना कार्य भूलकर अचरज भरी निगाहों से दर्शनलाभ लेती रहती है. कुछ देर बाद जब स्वामी महाराज को उस महिला की उपस्थिति का भान होता है तब वह शिशु अंतर्धान हो जाता है और वह महिला बेसुध हो जाती है. स्वामीजी कुछ पानी के छीटो से उस महिला को सावध करते है और उसे भाग्यवान बताते है क्योकि उसने यह पवित्र व शुभ दृश्य देखा था. यह शिशु और कोई न होकर साक्षात श्री दत्तप्रभु थे.
अपने चौथे चातुर्मास के लिए स्वामीजी बद्रीनारायण की और प्रस्थान कर रहे थे तभी वे एक पर्वतचोटी के पास आते है जिसके आगे एक गहरी खाई उनका रास्ता रोके खड़ी थी. तभी वहा पहाड़ की चोटी से २ व्यक्ति आते है जो स्वामीजी को खाई की भयावहता से अवगत कराते हुवे वापस जाने को कहते है.
स्वामीजी उत्तर देते है कि वे नर व नारायण के दर्शन हेतु यहाँ आये है और इस प्रयत्न में अगर उनके प्राण भी अगर निकल जाते है तो भी उन्हें उसकी परवाह नहीं है; और वे दर्शन किये बिना वापस नहीं लौटेंगे. तभी वे दो व्यक्ति अदृश्य हो जाते है और उनकी जगह स्वामीजी को नर और नारायण के दर्शन हो जाते है.
भगवान दत्तात्रेय ने अपने अनेक भक्तो को यह दृष्टांत दिया था कि वे वासुदेवानंद स्वामीजी के रूप में धरती पर विचरण कर रहे है. श्री आळंदीकर नाम के एक सज्जन की पत्नी कुछ गहनों को धारण करती है जिससे उन पर एक बुरी आत्मा का साया पड जाता है. दरअसल वो गहने कुछ लुटेरो ने उनके पति द्वारा किये गए धार्मिक अनुष्ठानो के प्रतिफल में दिए गए थे.
आळंदीकर लगभग 10 वर्षो तक अपनी पत्नी को विभिन्न उपायों से उस आत्मा के चंगुल से छुड़ाने का प्रयत्न करते है पर उन्हें लेष-मात्र भी सफलता हात नहीं लगती है. आखिर वह गाणगापुर चले आते है. वहा पर 10 दिवसों तक दत्तगुरु की सेवा करने के बाद स्वयं दत्तप्रभु आळंदीकर को दृष्टांत देकर कहते है :-“तुरंत ही गाणगापुर छोड़कर नर्मदा किनारे बसे गरुडेश्वर चले जाओ वहा मै स्वयं वासुदेव सरस्वती नाम से वास्तव्य कर रहा हु.
इस दिव्य दृष्टांत का पालन करते हुवे आळंदीकर तुरंत ही गरुडेश्वर के लिए प्रस्थान करते है और वहा टेम्बे स्वामीजी की कृपा से उनकी पत्नी उस बुरी आत्मा के चंगुल से मुक्त हो जाती है.
इसवी सन १९०७ में तंजावर के वास्तव्य के दौरान एक महिला अपने मृत-पुत्र की देह को एक वस्त्र में लपेटकर चुपचाप उस स्थान पर छोड़ देती है जहा स्वामीजी रुके हुवे थे. जब सब भक्त व दर्शनार्थी चले जाते है तब एक व्यक्ति की उस मृत शिशु पर नज़र पड़ती है और वह उसे स्वामी महाराज के पास ले आता है.
उस माँ की अपने पुत्र के मृत होने की व्यथा को जानकर स्वामीजी दया दिखलाते हुवे कहते है:-“ नहीं,नहीं ! यह मरा नहीं है. इसकी गैर-जिम्मेदार माँ इसे छोड़कर कही चली गई है. यह भभूत उसके शरीर में लगा दो.” भभूत लगाने पर वह शिशु रोने लगता है. और उस शिशु का क्रंदन सुनकर उसकी माँ अपने शिशु को लेने आ जाती है. बाद में वह माता स्वीकार कराती है कि उसने यह तरीका इसलिए अपनाया था क्योंकि वह अपने पहले दो शिशुओ को खो चुकी थी.
स्वामीजी ने कुछ धार्मिक स्थलों जैसे कुरुगुड्डी और पीठापुरम के पुनर्थापन में भी महती भूमिका निभाई थी. पीठापुरम के रहवासी तो श्रीपाद श्रीवल्लभ महाराज (पहले दत्तावतार) के ठीक-ठीक जन्मस्थान के बारे में भी जानते नहीं थे, उन्हें स्वामीजी उस स्थान के बारे में अवगत कराते है.उसी प्रकार से दुसरे दत्त अवतार श्री नृसिंहसरस्वती महाराज के जन्मस्थान के बारे में भी स्वामीजी स्थानीय लोगो को अवगत कराते है. स्वामीजी ने भारत के विभिन्न स्थानों पर दत्त मूर्तियों की भी स्थापना करी थी. “दिगंबरा दिगंबरा श्रीपाद वल्लभ दिगंबरा” ये महामंत्र टेम्बे स्वामी को दत्तकृपा से अवगत हो जाता है और आगे उनके द्वारा इस महामंत्र का बड़े स्तर पर प्रचार-प्रसार होता है.
उनके सभी शिष्य जैसे कि प. पु. नृसिंह सरस्वती दीक्षित स्वामी महाराज,परम पूज्य योगानंद सरस्वती (गांडा महाराज), नारेश्वर के पूज्य श्री रंगावधूत महाराज, पुणे के पूज्य योगिराज व्ही. डी. गुलवणी महाराज, पुणे के ही श्रीदत्त महाराज कविश्वर, इंदौर के प. पु. नाना महाराज तराणेकर, प. पु. केशवानंद सरस्वती महाराज और अन्य दुसरे शिष्यों ने भी अपने-अपने स्तर पर इस महामंत्र का प्रचार किया था. स्वामी महाराज अपने पीछे एक बहुत ही बड़े साहित्य का भंडार छोड़ कर गए है . इनमे से कुछ प्रमुख साहित्य है : श्रीद्विसाहस्त्री गुरुचरित्र (१८८९), श्रीदत्तपुराण (१८९२) , श्रीदत्तलीलामृताब्धीसार (१८९७), श्रीद्विसाहस्त्री योगरहस्यम, बोधरहस्यम चूर्णिका (१८९८), श्रीदत्तपुराण(समीक्षा) १८९९ , माघ माहात्म्य (१९००), श्री दत्त माहात्म्य (१९०१), श्री दत्त त्रिशतीकाव्यम (१९०१) , समश्लोकी श्रीगुरुसंहिता (१९०२), लघु वासुदेव मननसार (१९०३), सप्तशती गुरुचरित्र सार (१९०४), श्रीकृष्णलहरी (१९०४), श्रीदत्तचम्पू (१९०५), कुमारशिक्षा (१९०७),समश्लोकी चूर्णिका (१९०७), श्री कृष्णलहरी (समीक्षा) १९०७, युवाशिक्षा व वृद्ध शिक्षा (१९०८), स्त्री शिक्षा (१९०८) ,पञ्च पाक्षिक, पञ्च पदी, करुणा त्रिपदी, मंत्र विधानं इत्यादि.
अपने २२ वे चातुर्मास के दौरान चिखलदा मे ६-७ महिनो के वास्तव्य के बाद जब टेम्बे स्वामी ने शूलपाणेश्वर का घना वन अश्वत्थामा (महाभारत का एक अमर पात्र) की सहायता से पार किया और वे फिर अपने अगले चातुर्मास के लिए गरुडेश्वर में आ गए. सन १९१३ का यह चातुर्मास उनका आखिरी चातुर्मास साबित होता है. दूरस्थ स्थित एक मंदिर जहा भगवान विष्णु के वाहन गरुड़ ने तपस्या की थी, वह स्वामीजी के आगमन के बाद भक्तो की रेल-पेल से दमकने लगा था. एक बार स्वामी महाराज और उनके तकरीबन १०० भक्त गोकुलाष्टमी का उत्सव मनाते हुवे नर्मदा मैया के तट पर भजन गा रहे थे. तभी आकाश काले बादलो से भर जाता है और नर्मदाजी के दुसरे तट पर तूफानी बारिश होती है. स्वामी महाराज भक्तो को आश्वासित करते है और तूफान की चिंता न करते हुवे भजन करते रहने का निर्देश देते है. उत्सव की समाप्ति के बाद जब सब लोग तट से भवन के अन्दर आते है तब तूफान अपना विकराल रूप धारण कर लेता है. स्वामीजी अपने भक्तो को बतलाते है कि ईश्वर की कृपा से हम सब इस तूफान से अपना बचाव कर पाए है.
स्वामीजी के कहे अनुसार उन्हें १ बार प्लेग, ३ बार हैजा, २ बार कुष्ट रोग, १ बार सफ़ेद दागो की बीमारी, २ बार सर्पदंश और ताउम्र की संग्रहणी की बीमारी से पीड़ित होना पड़ा था. पर उन्होंने कभी कोई उपचार नहीं लिया और अपने आप को ईश्वरीय परमसत्ता की इच्छा पर छोड़ दिया था. सन १९१४ के ग्रीष्मकाल के बाद उनकी संग्रहणी की बीमारी ने जोर पकड़ लिया और उनकी तबियत तेजी से बिघड़ने लगी थी. जैसा की उन्होंने जीवन भर किया वैसे ही उन्होंने अपने-आप को यहाँ भी ईश्वरीय इच्छा पर छोड़ दिया था. वे सिर्फ एक ही चिकित्सक में विश्वास रखते थे-और वे थे श्रीदत्तप्रभु.
जैसे ही जेठ महीने की अमावस्या गुजर कर आषाढ़ का पहला दिन लगता है,उस दिन मंगलवार था, उत्तरायण भी लगा हुवा था, और चन्द्रमा आर्द्रा नक्षत्र में था; तब स्वामीजी सिद्धासन लगाते है और दत्तभगवान के चित्र के सामने ॐ का दीर्घ उच्चारण करके अपनी पञ्चभौतिक देह को त्याग देते है. आज से ११० वर्षो पहले अपनी पञ्चभौतिक देह के त्याग देने के बावजूद, दुनिया भर में फैले टेम्बे स्वामी के लाखो भक्त आज भी उनकी उपस्थिति को महसूस करते है और अपने दैनिक जीवन में उनके अनुभवों का साक्षात्कार अनुभवित करते रहते है. उनका घोष वाक्य ‘स्मर्तृगामी समावतु’ अर्थात ‘जब भी आप मुझे याद करोगे मै तत्काल ही आपके पास पहुच जाऊंगा” आज भी प्रासंगिक है.
#વાસુદેવાનંદ સરસ્વતી ટેંબે સ્વામી મહારાજ #ટેંબે સ્વામી મહારાજ #🙏ભક્તિ સ્ટેટ્સ #🙏ગુરૂનો મહિમા😇 #💐 ગુરૂવાર સ્પેશિયલ
परमहंस परिव्राजकाचार्य श्रीमद वासुदेवानंद सरस्वती (टेम्बे स्वामी) महाराज चरित्रसार.
परमहंस परिव्राजकाचार्य श्रीमद वासुदेवानंद सरस्वती महाराज (जिन्हें हम परम पूज्य टेम्बे स्वामी के नाम से भी जानते है ) का जन्म इसवी सन १८५४ के श्रावण माह के कृष्णपक्ष की पंचमी तिथि को सावंतवाड़ी के पास स्थित माणगाँव नामक गाँव में रहने वाले एक धार्मिक ब्राह्मण-परिवार में हुवा था. उनके पिता का नाम श्री गणेश टेम्बे और माता का नाम सौ. रमाबाई था.
बचपन में श्री टेम्बे स्वामी का नामकरण वासुदेव ऐसा हुवा था. जब उनके पिता श्री गणेश टेम्बेजी गाणगापुर में थे तब उन्हें भगवान दत्तात्रेयजी का साक्षात्कार होता है जिसमे उन्हें माणगाँव जाकर गृहस्थाश्रम का पालन करने का आदेश होता है, साथ ही भगवान दत्तात्रय उन्हें उनके पुत्र के रूप में अवतार लेने का वचन भी देते है.
जब बालक वासुदेव ८ वर्ष के थे तब उनके दादाजी श्री हरी भटजी उनका यज्ञोपवित संस्कार करवा देते है. बालक वासुदेव अपनी प्रतिबद्धता, कुशाग्रता व दिव्य स्मरणशक्ति से शीघ्र ही अपनी वैदिक शिक्षा पूर्ण कर लेते है और पोरोहित्य आदि कार्य के उत्तम ज्ञाता बनकर अपने परिवार की आजीविका में अपना योगदान देते है.
अपनी प्रतिबद्धता व योग साधना से अर्जित अतीन्द्रिय शक्तियों का उपयोग युवा वासुदेव दीन-दुखियो के दुःख व कष्ट दूर करने में प्रयुक्त करते है. अपने शिक्षको के आग्रह पर उन्हें २१ वर्ष की उम्र में विवाहबद्ध होना पड़ा था. अपनी २३ वर्ष की आयु में उन्हें अपने पवित्र व सुह्रदय पिता (जिनकी उम्र उस वक्त ५६-५७ वर्ष थी) का वियोग सहना पड़ा था.
स्वामीजी की माताजी व उनकी धर्मपत्नी सौ.अन्नपूर्णाजी में अक्सर पारिवारिक बातो को लेकर कलह होता रहता था. युवा वासुदेवजी के जीवन में शांति न होने के कारण उनका सांसारिक मोहभंग अत्यंत तीव्र गति से हो गया था. आगे चलकर युवक वासुदेब नर्सोबावाड़ी की यात्रा करते है जहा उन्हें श्री गोविन्दस्वामी और मौनीस्वामी मार्गदर्शित करते है.
भगवन दत्तात्रेय के दृष्टांत होने पर वासुदेव शास्त्री माणगाँव में इसवी सन १८८३ में दत्त मंदिर अनुस्थापित करते है. शीघ्र ही यह मंदिर प्रसिद्धि को प्राप्त हो जाता है और वहा भाविकजन अत्याधिक संख्या में दर्शन करने आने लगते है. अब श्रीवासुदेव शास्त्री को सम्मानपूर्वक वासुदेवबुवा कहकर संबोधित किया जाने लगा था.
भगवान दत्तात्रेयजी के निर्देशानुसार माणगाँव में ७ वर्ष व्यतीत करने के बाद स्वामीजी अपनी गर्भवती पत्नी को साथ लेकर माणगाँव छोड़कर नर्सोबावाड़ी में आ जाते है. कुछ ही समय बाद सौ. अन्नपूर्णा देवी एक मृत शिशु को जन्म देती है.
इसवी सन १८९१ में भगवान दत्तात्रेय बुवा को उत्तर की तरफ जाने के लिए निर्देशित करते है. गंगाखेड नामक स्थान पर उनकी समर्पित पत्नी का हैजे की बीमारी से देहावसन हो जाता है. १४ दिवसों के शोक के बाद वासुदेवबुवा की इच्छानुसार भगवान दत्तात्रेय उन्हें सन्यास ग्रहण करवा देते है और उज्जयिनी जाकर नारायणानंद सरस्वती स्वामी महाराज से दंड ग्रहण करने का निर्देश भी देते है. नारायणानंद सरस्वती स्वामी महाराज वासुदेवबुवा को दंड प्रदान करते है और सन्यास धर्म के अनुसार उनका नामकरण श्रीवासुदेवानंद सरस्वती ऐसा करते है. आगे चलकर भगवान दत्तात्रेय उन्हें उनके जीवन का उद्देश्य बताते हुवे उन्हें संपूर्ण भारतभ्रमण करते हुवे वैदिक धर्म का प्रचार करने और वर्णाश्रम धर्म से विमुख लोगो का मार्गदर्शन करने का निर्देश देते है.
अगले २३ वर्षो तक टेम्बे स्वामी अपने कठोर सन्यास धर्म का पालन करते हुवे सम्पूर्ण देश में भ्रमण करते है. स्वामीजी मध्यम कद-काठी के थे. उनका वर्ण श्याम था. उनकी निगाहे गहरी व तेजपूर्ण थी जो किसी के भी मानस की गहराई में जाकर उसके चित्त को भाप लेती थी. उनकी वाणी मृदु पर अत्यंत स्पष्टवादिता से परिपूर्ण थी. उनका संग्रह सिर्फ ४ लंगोटिया, २ पोशाखे, १ दंड , १ कमण्डलु , १ उपनिषद् की पुस्तक, १ पूजा के बर्तनों से भरा संदूक, भगवान दत्तात्रेय की २ मुर्तिया, १ कुवे से पानी निकालने की रस्सी व लेखन सामग्री तक ही सीमित था. कभी-कभी वे एक उनी शाल का प्रयोग भी कर लेते थे.
वे अपने कपडे स्वयं धोते थे और पैरो में कोई पदत्राण धारण किये बिना ही पदयात्रा किया करते थे.
एक बार उनके एक भक्त ने उनके पैरो से २० धसे हुवे काटे निकाले थे जबकि स्वामीजी ने कभी ऐसा न तो चाहा था न हि ऐसा कोई संकेत दिया था. स्वामीजी अत्यंत विपरीत जलवायु में घने वनों, उष्ण मरुस्थलो व उचे पर्वतीय रास्तो से सिर्फ एक वस्त्र पहने ही भ्रमण किया करते थे. उनके अधिकांश चातुर्मास छोटे गांवो व दूरवर्ती स्थानों पर हुवे थे.
स्वामीजी के जीवन का एकमात्र उद्देश भगवान दत्तात्रेय की आज्ञापालन करने का था और उनकी सारी क्रियाये भगवान दत्तात्रेय को समर्पित थी. स्वामीजी वैसे तो मूलरूप से संकोची व एकाकी जीवन व्यतीत करने वाले व्यक्ति थे पर उन्हें अपने जीवन का एक लम्बा समय जनसमुदायों की भीड़ में गुजारना पड़ा था.
सभी लोगो को वे समान रूप से उपलब्द्ध होते थे. अत्यंत शुचिता का पालन करने के बावजूद भी उनके यहाँ किसी से भी भेदभाव नहीं होता था. हर जात-पात के लोग उनकी कृपा का प्रसाद प्राप्त करते थे. स्वामीजी सभी लोगो के प्रति अत्यंत संवेदनशील थे और अत्यंत सहानभूतिपुर्वक सभी लोगो के दुःख व समस्याओं को सुनकर उस पर उचित मार्गदर्शन किया करते थे. उनके मार्गदर्शन का यथासांग पालन करने पर लोगो के सारे दुःख-दर्द दूर हो जाते थे.
इसवी सन १९१० में नरसोबावाड़ी के वास्तव्य के दौरान वे पुजारी लोगो को हैजे की महामारी की रोकथाम के लिए भगवान दत्तात्रेय की पादुको का अभिषेक करने के लिए निर्देशित करते है. लोगो के पूछने पर कि अभिषेक से कैसे महामारी की रोकथाम होगी, तब स्वामीजी समझाते है :-“मृत्यु भी ईश्वर का ही एक रूप है और यह महामारी उसकी शक्ति है और भगवान को शास्त्रोक्त विधि से प्रसन्न करने से ये शक्तिया भी शांत हो जाती है.” जब स्वामीजी के कहेनुसार अभिषेक होता है तब महामारी टल जाती है.
शारदा पीठ के शंकराचार्य श्री राजराजेश्वरस्वामी हरिद्वार में टेम्बे स्वामी के साथ चातुर्मास (यह टेम्बे स्वामी का का ३ रा चातुर्मास था ) संपन्न करने के बाद टेम्बे स्वामी के असीम प्रशंसक बन गए थे. अपने १७ वे चातुर्मास के समय तंजावर में कावेरी नदी के किनारे से प्रवास करते हुवे टेम्बे स्वामीजी को जब पता चलता है है कि श्रुंगेरीपीठ के शंकराचार्य श्री नरसिंहभारती श्रीरंगम में रुके हुवे है तो टेम्बे स्वामी भी वहा उनका अभिवादन करने चले जाते है.
शंकराचार्यजी श्रीस्वामी को देखकर अत्यंत प्रसन्न हो जाते है. टेम्बे स्वामी शरदाम्बा व शंकराचार्यजी की स्तुति में स्तोत्रो की रचना करते है. शंकराचार्यजी भी एक स्तोत्र के रूप में टेम्बे स्वामी की स्तुति लिखते है औरउनकी भिक्षा का प्रबंध भी करवा देते है.
बाद में शंकराचार्यजी अपने शिष्यों को संबोधित करते हुवे टेम्बे स्वामीजी के बारे में सम्मानजनक शब्द कहते है :-“आप नहीं जानते है कि हमारे बीच आज पधारे टेम्बे स्वामी कौन है ? वे साक्षात दत्त प्रभु के अवतार है जो उनके माता-पिता की गहरी भक्ति और सद्गुणों के कारण टेम्बे स्वामी के रूप में अवतरित हुवे है. इनका वैदिक धर्म को पुनर्जीवित करने का सतत यत्न आदिशंकराचार्यजी के समान ही है. टेम्बे स्वामी ने अपने जीवन में अत्यंत कठोर रूप से अपने वैदिक वर्णाश्रम-धर्म का पालन करते हुवे अनेक स्त्री-पुरुषो का धार्मिक और आध्यात्मिक उद्धार किया है. कन्याकुमारी से हिमालय तक का प्रवास पदयात्रा द्वारा करते हुवे इन्होने राह में मिले अनेक साधको को उनकी पात्रता के अनुरूप कर्ममार्ग, ज्ञानमार्ग व भक्तिमार्ग का उपदेश करा है. हम ईश्वर से प्रार्थना करते है कि वह उन्हें दीर्घायु प्रदान करे जिससे वे अपने वैदिक धर्म के उत्थापन का कार्य और आगे बढ़ा सके.”
इसवी सन १९०५ में वाड़ी से पंढरपुर जाते समय कमलापुर नाम के स्थान पर उन्हें स्वप्न में एक लम्बे कद का आजानुबाहु (जिसके हाथ उसके घुटनों तक पहुचते हो) व्यक्ति आकर कहता है :- “ अरे तुम्ह भारतभर पदयात्रा करते हो, काव्य-रचना भी करते हो, फिर भी अब तक तुम्हारा ध्यान मेरी और कैसे नहीं गया ?”
सुबह उठकर स्वामीजी भगवान दत्तप्रभु से स्वप्न में आये व्यक्ति के बारे में जानकारी चाहते है और जिस पर दत्तप्रभु उन्हें बताते है कि वह दिव्य व्यक्ति अक्कलकोट के स्वामी समर्थ है और वे चाहते है कि आप अक्कलकोट जावे और उनके जीवन पर एक काव्य की रचना करे. दत्त महाराज के कहे अनुसार टेम्बेस्वामी अक्कलकोट जाते है.
पुंडलिकराव नाम के एक सज्जन शिर्डी के साईंबाबा के प्रमुख शिष्य थे. वे स्वामीजी से (जब टेम्बे स्वामी का मुक्काम राजमहेंद्री में था ) मिलते है. पुंडलिकराव अपनी कीर्तनसेवा भी पेश करते है. आगे चलकर पुंडलिकराव शिर्डी जाकर साईबाबा के दर्शन करने वाले थे. यह बात जानकर टेम्बे स्वामी उन्हें एक नारियल अपने ह्रदय से लगाकर देते है और कहते है कि इसे मेरे भाई साईबाबा को दे देना.
शिर्डी जाते समय पुंडलिकराव और उनके सह-प्रवासी कोपरगाँव में विश्राम करते है. पुंडलिकराव अपना आन्हिक करने उन लोगो से कुछ दूर जाते है तब उनके सह -प्रवासी नाश्ता करना प्रारंभ कर लेते है. नाश्ते में चिवडा अत्यंत मसालेदार और तीखा होने से सबको पानी की प्यास लगती है पर वह गर्मी के दिन होने से कही भी पानी आसानी से उपलब्द्ध नहीं था.
उनमे से कुछ सुज्ञजन पानी के न होने की स्थिति में अपने साथ रखे हुवे नारियलो को खाने का प्रस्ताव रखते है जिससे सबके जलते हुवे मुखों को कुछ राहत मिले. पर इस दौरान टेम्बे स्वामी का दिया हुवा नारियल भी खा लिया जाता है.
जब वे लोग शिर्डी पहुचाते है तब पुंडलिकराव साईं बाबा द्वारा किये उपेक्षित व्यव्हार से व्याकुल हो उठते है. फिर उन्ह सब लोगो की और पीठ करके साईबाबा कहते है:-“अरे चोरो और दुष्टों !, मेरे भाई द्वारा दिया हुवा नारियल कहा है ? मुझे पहले मेरा नारियल ला कर दो.”
पुंडलिकराव जो इस सब घटनाक्रम से अबतक अनभिद्य थे, वह अपने सह प्रवासियों से नारियल के बारे में पूछते है तब कही जाकर नारियल के खा लिए जाने के धर्म-अपराध के बारे में उन्हें पता चलता है.
असल में, पुंडलिक राव व उनके सह-प्रवासियों द्वारा टेम्बेस्वामी द्वारा दिए हुवे नारियल का यथायोग्य सम्मान न करने व उसकी सही ढंग से सुरक्षा न करने के कारण घटित हुवे धर्म-अपराध के लिए साईबाबा दिखावटी क्रोध दिखाते हुवे हलकी फटकार लगाकर उन लोगों को समझाइश दे देते है.
सन १९०५ में अपनी विदर्भ यात्रा के दौरान स्वामी महाराज शेगांव में पधारते है. उनके वहा आने के एक दिन पहिले हि गजानन महाराज ने अपने भक्तो को निर्देशित कर रखा था:-“ मेरा एक सुज्ञ भाई जो कि कर्हाड़े ब्राह्मण है, यहाँ पर आ रहा है. वे अत्यंत धर्मनिष्ठ है. उनके रास्ते में कोई भी कपडे की चिंदी या कोई ऐसा-वैसा पदार्थ जिससे उनके सोवले की शुचिता भंग हो, नहीं आना चाहिए.”
जब टेम्बेस्वामी आते है तब गजानन महाराज अपनी ही धुन में अपनी उंगलिया चटका रहे थे.
जैसे ही टेम्बे स्वामी वहा पहुचते है, गजानन महाराज का उंगलिया चटकाना बंद होता है और दोनों संत एक दुसरे को स्मित व प्रसन्न मुख से प्रेमपूर्वक निहारते है. वहा मुश्किल से ही कोई शब्द उच्चारित होता है वे सिर्फ एक दुसरे के साथ का रसस्वादन करते है.
कुछ देर बाद जब टेम्बे स्वामी गजानन महराज की आज्ञा लेते है तब गजानन महाराज सिर्फ इतना कहते है- “बहुत अच्छा”.
नरसी में एक दोपहर को स्वामी महाराज स्नान करने के लिए जहा नदी पर गए थे, तभी वहा गाव की एक महिला पानी भरने के लिए आती है. वह वहा टेम्बे स्वामी को अपनी गोद में ६ माह के एक शिशु को लेकर बैठे हुवे देखती है जो अपना बाया अंगूठा चूसते हुवे टेम्बे स्वामी को निहार रहा था और स्वामीजी भी उसे प्रेमपूर्वक दृष्टी से मानो प्रति-उत्तर दे रहे थे.
यह देखकर वह महिला अपनी सुध-बुध खोकर अपना कार्य भूलकर अचरज भरी निगाहों से दर्शनलाभ लेती रहती है. कुछ देर बाद जब स्वामी महाराज को उस महिला की उपस्थिति का भान होता है तब वह शिशु अंतर्धान हो जाता है और वह महिला बेसुध हो जाती है. स्वामीजी कुछ पानी के छीटो से उस महिला को सावध करते है और उसे भाग्यवान बताते है क्योकि उसने यह पवित्र व शुभ दृश्य देखा था. यह शिशु और कोई न होकर साक्षात श्री दत्तप्रभु थे.
अपने चौथे चातुर्मास के लिए स्वामीजी बद्रीनारायण की और प्रस्थान कर रहे थे तभी वे एक पर्वतचोटी के पास आते है जिसके आगे एक गहरी खाई उनका रास्ता रोके खड़ी थी. तभी वहा पहाड़ की चोटी से २ व्यक्ति आते है जो स्वामीजी को खाई की भयावहता से अवगत कराते हुवे वापस जाने को कहते है.
स्वामीजी उत्तर देते है कि वे नर व नारायण के दर्शन हेतु यहाँ आये है और इस प्रयत्न में अगर उनके प्राण भी अगर निकल जाते है तो भी उन्हें उसकी परवाह नहीं है; और वे दर्शन किये बिना वापस नहीं लौटेंगे. तभी वे दो व्यक्ति अदृश्य हो जाते है और उनकी जगह स्वामीजी को नर और नारायण के दर्शन हो जाते है.
भगवान दत्तात्रेय ने अपने अनेक भक्तो को यह दृष्टांत दिया था कि वे वासुदेवानंद स्वामीजी के रूप में धरती पर विचरण कर रहे है. श्री आळंदीकर नाम के एक सज्जन की पत्नी कुछ गहनों को धारण करती है जिससे उन पर एक बुरी आत्मा का साया पड जाता है. दरअसल वो गहने कुछ लुटेरो ने उनके पति द्वारा किये गए धार्मिक अनुष्ठानो के प्रतिफल में दिए गए थे.
आळंदीकर लगभग 10 वर्षो तक अपनी पत्नी को विभिन्न उपायों से उस आत्मा के चंगुल से छुड़ाने का प्रयत्न करते है पर उन्हें लेष-मात्र भी सफलता हात नहीं लगती है. आखिर वह गाणगापुर चले आते है. वहा पर 10 दिवसों तक दत्तगुरु की सेवा करने के बाद स्वयं दत्तप्रभु आळंदीकर को दृष्टांत देकर कहते है :-“तुरंत ही गाणगापुर छोड़कर नर्मदा किनारे बसे गरुडेश्वर चले जाओ वहा मै स्वयं वासुदेव सरस्वती नाम से वास्तव्य कर रहा हु.
इस दिव्य दृष्टांत का पालन करते हुवे आळंदीकर तुरंत ही गरुडेश्वर के लिए प्रस्थान करते है और वहा टेम्बे स्वामीजी की कृपा से उनकी पत्नी उस बुरी आत्मा के चंगुल से मुक्त हो जाती है.
इसवी सन १९०७ में तंजावर के वास्तव्य के दौरान एक महिला अपने मृत-पुत्र की देह को एक वस्त्र में लपेटकर चुपचाप उस स्थान पर छोड़ देती है जहा स्वामीजी रुके हुवे थे. जब सब भक्त व दर्शनार्थी चले जाते है तब एक व्यक्ति की उस मृत शिशु पर नज़र पड़ती है और वह उसे स्वामी महाराज के पास ले आता है.
उस माँ की अपने पुत्र के मृत होने की व्यथा को जानकर स्वामीजी दया दिखलाते हुवे कहते है:-“ नहीं,नहीं ! यह मरा नहीं है. इसकी गैर-जिम्मेदार माँ इसे छोड़कर कही चली गई है. यह भभूत उसके शरीर में लगा दो.” भभूत लगाने पर वह शिशु रोने लगता है. और उस शिशु का क्रंदन सुनकर उसकी माँ अपने शिशु को लेने आ जाती है. बाद में वह माता स्वीकार कराती है कि उसने यह तरीका इसलिए अपनाया था क्योंकि वह अपने पहले दो शिशुओ को खो चुकी थी.
स्वामीजी ने कुछ धार्मिक स्थलों जैसे कुरुगुड्डी और पीठापुरम के पुनर्थापन में भी महती भूमिका निभाई थी. पीठापुरम के रहवासी तो श्रीपाद श्रीवल्लभ महाराज (पहले दत्तावतार) के ठीक-ठीक जन्मस्थान के बारे में भी जानते नहीं थे, उन्हें स्वामीजी उस स्थान के बारे में अवगत कराते है.उसी प्रकार से दुसरे दत्त अवतार श्री नृसिंहसरस्वती महाराज के जन्मस्थान के बारे में भी स्वामीजी स्थानीय लोगो को अवगत कराते है. स्वामीजी ने भारत के विभिन्न स्थानों पर दत्त मूर्तियों की भी स्थापना करी थी. “दिगंबरा दिगंबरा श्रीपाद वल्लभ दिगंबरा” ये महामंत्र टेम्बे स्वामी को दत्तकृपा से अवगत हो जाता है और आगे उनके द्वारा इस महामंत्र का बड़े स्तर पर प्रचार-प्रसार होता है.
उनके सभी शिष्य जैसे कि प. पु. नृसिंह सरस्वती दीक्षित स्वामी महाराज,परम पूज्य योगानंद सरस्वती (गांडा महाराज), नारेश्वर के पूज्य श्री रंगावधूत महाराज, पुणे के पूज्य योगिराज व्ही. डी. गुलवणी महाराज, पुणे के ही श्रीदत्त महाराज कविश्वर, इंदौर के प. पु. नाना महाराज तराणेकर, प. पु. केशवानंद सरस्वती महाराज और अन्य दुसरे शिष्यों ने भी अपने-अपने स्तर पर इस महामंत्र का प्रचार किया था. स्वामी महाराज अपने पीछे एक बहुत ही बड़े साहित्य का भंडार छोड़ कर गए है . इनमे से कुछ प्रमुख साहित्य है : श्रीद्विसाहस्त्री गुरुचरित्र (१८८९), श्रीदत्तपुराण (१८९२) , श्रीदत्तलीलामृताब्धीसार (१८९७), श्रीद्विसाहस्त्री योगरहस्यम, बोधरहस्यम चूर्णिका (१८९८), श्रीदत्तपुराण(समीक्षा) १८९९ , माघ माहात्म्य (१९००), श्री दत्त माहात्म्य (१९०१), श्री दत्त त्रिशतीकाव्यम (१९०१) , समश्लोकी श्रीगुरुसंहिता (१९०२), लघु वासुदेव मननसार (१९०३), सप्तशती गुरुचरित्र सार (१९०४), श्रीकृष्णलहरी (१९०४), श्रीदत्तचम्पू (१९०५), कुमारशिक्षा (१९०७),समश्लोकी चूर्णिका (१९०७), श्री कृष्णलहरी (समीक्षा) १९०७, युवाशिक्षा व वृद्ध शिक्षा (१९०८), स्त्री शिक्षा (१९०८) ,पञ्च पाक्षिक, पञ्च पदी, करुणा त्रिपदी, मंत्र विधानं इत्यादि.
अपने २२ वे चातुर्मास के दौरान चिखलदा मे ६-७ महिनो के वास्तव्य के बाद जब टेम्बे स्वामी ने शूलपाणेश्वर का घना वन अश्वत्थामा (महाभारत का एक अमर पात्र) की सहायता से पार किया और वे फिर अपने अगले चातुर्मास के लिए गरुडेश्वर में आ गए. सन १९१३ का यह चातुर्मास उनका आखिरी चातुर्मास साबित होता है. दूरस्थ स्थित एक मंदिर जहा भगवान विष्णु के वाहन गरुड़ ने तपस्या की थी, वह स्वामीजी के आगमन के बाद भक्तो की रेल-पेल से दमकने लगा था. एक बार स्वामी महाराज और उनके तकरीबन १०० भक्त गोकुलाष्टमी का उत्सव मनाते हुवे नर्मदा मैया के तट पर भजन गा रहे थे. तभी आकाश काले बादलो से भर जाता है और नर्मदाजी के दुसरे तट पर तूफानी बारिश होती है. स्वामी महाराज भक्तो को आश्वासित करते है और तूफान की चिंता न करते हुवे भजन करते रहने का निर्देश देते है. उत्सव की समाप्ति के बाद जब सब लोग तट से भवन के अन्दर आते है तब तूफान अपना विकराल रूप धारण कर लेता है. स्वामीजी अपने भक्तो को बतलाते है कि ईश्वर की कृपा से हम सब इस तूफान से अपना बचाव कर पाए है.
स्वामीजी के कहे अनुसार उन्हें १ बार प्लेग, ३ बार हैजा, २ बार कुष्ट रोग, १ बार सफ़ेद दागो की बीमारी, २ बार सर्पदंश और ताउम्र की संग्रहणी की बीमारी से पीड़ित होना पड़ा था. पर उन्होंने कभी कोई उपचार नहीं लिया और अपने आप को ईश्वरीय परमसत्ता की इच्छा पर छोड़ दिया था. सन १९१४ के ग्रीष्मकाल के बाद उनकी संग्रहणी की बीमारी ने जोर पकड़ लिया और उनकी तबियत तेजी से बिघड़ने लगी थी. जैसा की उन्होंने जीवन भर किया वैसे ही उन्होंने अपने-आप को यहाँ भी ईश्वरीय इच्छा पर छोड़ दिया था. वे सिर्फ एक ही चिकित्सक में विश्वास रखते थे-और वे थे श्रीदत्तप्रभु.
जैसे ही जेठ महीने की अमावस्या गुजर कर आषाढ़ का पहला दिन लगता है,उस दिन मंगलवार था, उत्तरायण भी लगा हुवा था, और चन्द्रमा आर्द्रा नक्षत्र में था; तब स्वामीजी सिद्धासन लगाते है और दत्तभगवान के चित्र के सामने ॐ का दीर्घ उच्चारण करके अपनी पञ्चभौतिक देह को त्याग देते है. आज से ११० वर्षो पहले अपनी पञ्चभौतिक देह के त्याग देने के बावजूद, दुनिया भर में फैले टेम्बे स्वामी के लाखो भक्त आज भी उनकी उपस्थिति को महसूस करते है और अपने दैनिक जीवन में उनके अनुभवों का साक्षात्कार अनुभवित करते रहते है. उनका घोष वाक्य ‘स्मर्तृगामी समावतु’ अर्थात ‘जब भी आप मुझे याद करोगे मै तत्काल ही आपके पास पहुच जाऊंगा” आज भी प्रासंगिक है.
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परमहंस परिव्राजकाचार्य श्रीमद वासुदेवानंद सरस्वती (टेम्बे स्वामी) महाराज चरित्रसार.
परमहंस परिव्राजकाचार्य श्रीमद वासुदेवानंद सरस्वती महाराज (जिन्हें हम परम पूज्य टेम्बे स्वामी के नाम से भी जानते है ) का जन्म इसवी सन १८५४ के श्रावण माह के कृष्णपक्ष की पंचमी तिथि को सावंतवाड़ी के पास स्थित माणगाँव नामक गाँव में रहने वाले एक धार्मिक ब्राह्मण-परिवार में हुवा था. उनके पिता का नाम श्री गणेश टेम्बे और माता का नाम सौ. रमाबाई था.
बचपन में श्री टेम्बे स्वामी का नामकरण वासुदेव ऐसा हुवा था. जब उनके पिता श्री गणेश टेम्बेजी गाणगापुर में थे तब उन्हें भगवान दत्तात्रेयजी का साक्षात्कार होता है जिसमे उन्हें माणगाँव जाकर गृहस्थाश्रम का पालन करने का आदेश होता है, साथ ही भगवान दत्तात्रय उन्हें उनके पुत्र के रूप में अवतार लेने का वचन भी देते है.
जब बालक वासुदेव ८ वर्ष के थे तब उनके दादाजी श्री हरी भटजी उनका यज्ञोपवित संस्कार करवा देते है. बालक वासुदेव अपनी प्रतिबद्धता, कुशाग्रता व दिव्य स्मरणशक्ति से शीघ्र ही अपनी वैदिक शिक्षा पूर्ण कर लेते है और पोरोहित्य आदि कार्य के उत्तम ज्ञाता बनकर अपने परिवार की आजीविका में अपना योगदान देते है.
अपनी प्रतिबद्धता व योग साधना से अर्जित अतीन्द्रिय शक्तियों का उपयोग युवा वासुदेव दीन-दुखियो के दुःख व कष्ट दूर करने में प्रयुक्त करते है. अपने शिक्षको के आग्रह पर उन्हें २१ वर्ष की उम्र में विवाहबद्ध होना पड़ा था. अपनी २३ वर्ष की आयु में उन्हें अपने पवित्र व सुह्रदय पिता (जिनकी उम्र उस वक्त ५६-५७ वर्ष थी) का वियोग सहना पड़ा था.
स्वामीजी की माताजी व उनकी धर्मपत्नी सौ.अन्नपूर्णाजी में अक्सर पारिवारिक बातो को लेकर कलह होता रहता था. युवा वासुदेवजी के जीवन में शांति न होने के कारण उनका सांसारिक मोहभंग अत्यंत तीव्र गति से हो गया था. आगे चलकर युवक वासुदेब नर्सोबावाड़ी की यात्रा करते है जहा उन्हें श्री गोविन्दस्वामी और मौनीस्वामी मार्गदर्शित करते है.
भगवन दत्तात्रेय के दृष्टांत होने पर वासुदेव शास्त्री माणगाँव में इसवी सन १८८३ में दत्त मंदिर अनुस्थापित करते है. शीघ्र ही यह मंदिर प्रसिद्धि को प्राप्त हो जाता है और वहा भाविकजन अत्याधिक संख्या में दर्शन करने आने लगते है. अब श्रीवासुदेव शास्त्री को सम्मानपूर्वक वासुदेवबुवा कहकर संबोधित किया जाने लगा था.
भगवान दत्तात्रेयजी के निर्देशानुसार माणगाँव में ७ वर्ष व्यतीत करने के बाद स्वामीजी अपनी गर्भवती पत्नी को साथ लेकर माणगाँव छोड़कर नर्सोबावाड़ी में आ जाते है. कुछ ही समय बाद सौ. अन्नपूर्णा देवी एक मृत शिशु को जन्म देती है.
इसवी सन १८९१ में भगवान दत्तात्रेय बुवा को उत्तर की तरफ जाने के लिए निर्देशित करते है. गंगाखेड नामक स्थान पर उनकी समर्पित पत्नी का हैजे की बीमारी से देहावसन हो जाता है. १४ दिवसों के शोक के बाद वासुदेवबुवा की इच्छानुसार भगवान दत्तात्रेय उन्हें सन्यास ग्रहण करवा देते है और उज्जयिनी जाकर नारायणानंद सरस्वती स्वामी महाराज से दंड ग्रहण करने का निर्देश भी देते है. नारायणानंद सरस्वती स्वामी महाराज वासुदेवबुवा को दंड प्रदान करते है और सन्यास धर्म के अनुसार उनका नामकरण श्रीवासुदेवानंद सरस्वती ऐसा करते है. आगे चलकर भगवान दत्तात्रेय उन्हें उनके जीवन का उद्देश्य बताते हुवे उन्हें संपूर्ण भारतभ्रमण करते हुवे वैदिक धर्म का प्रचार करने और वर्णाश्रम धर्म से विमुख लोगो का मार्गदर्शन करने का निर्देश देते है.
अगले २३ वर्षो तक टेम्बे स्वामी अपने कठोर सन्यास धर्म का पालन करते हुवे सम्पूर्ण देश में भ्रमण करते है. स्वामीजी मध्यम कद-काठी के थे. उनका वर्ण श्याम था. उनकी निगाहे गहरी व तेजपूर्ण थी जो किसी के भी मानस की गहराई में जाकर उसके चित्त को भाप लेती थी. उनकी वाणी मृदु पर अत्यंत स्पष्टवादिता से परिपूर्ण थी. उनका संग्रह सिर्फ ४ लंगोटिया, २ पोशाखे, १ दंड , १ कमण्डलु , १ उपनिषद् की पुस्तक, १ पूजा के बर्तनों से भरा संदूक, भगवान दत्तात्रेय की २ मुर्तिया, १ कुवे से पानी निकालने की रस्सी व लेखन सामग्री तक ही सीमित था. कभी-कभी वे एक उनी शाल का प्रयोग भी कर लेते थे.
वे अपने कपडे स्वयं धोते थे और पैरो में कोई पदत्राण धारण किये बिना ही पदयात्रा किया करते थे.
एक बार उनके एक भक्त ने उनके पैरो से २० धसे हुवे काटे निकाले थे जबकि स्वामीजी ने कभी ऐसा न तो चाहा था न हि ऐसा कोई संकेत दिया था. स्वामीजी अत्यंत विपरीत जलवायु में घने वनों, उष्ण मरुस्थलो व उचे पर्वतीय रास्तो से सिर्फ एक वस्त्र पहने ही भ्रमण किया करते थे. उनके अधिकांश चातुर्मास छोटे गांवो व दूरवर्ती स्थानों पर हुवे थे.
स्वामीजी के जीवन का एकमात्र उद्देश भगवान दत्तात्रेय की आज्ञापालन करने का था और उनकी सारी क्रियाये भगवान दत्तात्रेय को समर्पित थी. स्वामीजी वैसे तो मूलरूप से संकोची व एकाकी जीवन व्यतीत करने वाले व्यक्ति थे पर उन्हें अपने जीवन का एक लम्बा समय जनसमुदायों की भीड़ में गुजारना पड़ा था.
सभी लोगो को वे समान रूप से उपलब्द्ध होते थे. अत्यंत शुचिता का पालन करने के बावजूद भी उनके यहाँ किसी से भी भेदभाव नहीं होता था. हर जात-पात के लोग उनकी कृपा का प्रसाद प्राप्त करते थे. स्वामीजी सभी लोगो के प्रति अत्यंत संवेदनशील थे और अत्यंत सहानभूतिपुर्वक सभी लोगो के दुःख व समस्याओं को सुनकर उस पर उचित मार्गदर्शन किया करते थे. उनके मार्गदर्शन का यथासांग पालन करने पर लोगो के सारे दुःख-दर्द दूर हो जाते थे.
इसवी सन १९१० में नरसोबावाड़ी के वास्तव्य के दौरान वे पुजारी लोगो को हैजे की महामारी की रोकथाम के लिए भगवान दत्तात्रेय की पादुको का अभिषेक करने के लिए निर्देशित करते है. लोगो के पूछने पर कि अभिषेक से कैसे महामारी की रोकथाम होगी, तब स्वामीजी समझाते है :-“मृत्यु भी ईश्वर का ही एक रूप है और यह महामारी उसकी शक्ति है और भगवान को शास्त्रोक्त विधि से प्रसन्न करने से ये शक्तिया भी शांत हो जाती है.” जब स्वामीजी के कहेनुसार अभिषेक होता है तब महामारी टल जाती है.
शारदा पीठ के शंकराचार्य श्री राजराजेश्वरस्वामी हरिद्वार में टेम्बे स्वामी के साथ चातुर्मास (यह टेम्बे स्वामी का का ३ रा चातुर्मास था ) संपन्न करने के बाद टेम्बे स्वामी के असीम प्रशंसक बन गए थे. अपने १७ वे चातुर्मास के समय तंजावर में कावेरी नदी के किनारे से प्रवास करते हुवे टेम्बे स्वामीजी को जब पता चलता है है कि श्रुंगेरीपीठ के शंकराचार्य श्री नरसिंहभारती श्रीरंगम में रुके हुवे है तो टेम्बे स्वामी भी वहा उनका अभिवादन करने चले जाते है.
शंकराचार्यजी श्रीस्वामी को देखकर अत्यंत प्रसन्न हो जाते है. टेम्बे स्वामी शरदाम्बा व शंकराचार्यजी की स्तुति में स्तोत्रो की रचना करते है. शंकराचार्यजी भी एक स्तोत्र के रूप में टेम्बे स्वामी की स्तुति लिखते है औरउनकी भिक्षा का प्रबंध भी करवा देते है.
बाद में शंकराचार्यजी अपने शिष्यों को संबोधित करते हुवे टेम्बे स्वामीजी के बारे में सम्मानजनक शब्द कहते है :-“आप नहीं जानते है कि हमारे बीच आज पधारे टेम्बे स्वामी कौन है ? वे साक्षात दत्त प्रभु के अवतार है जो उनके माता-पिता की गहरी भक्ति और सद्गुणों के कारण टेम्बे स्वामी के रूप में अवतरित हुवे है. इनका वैदिक धर्म को पुनर्जीवित करने का सतत यत्न आदिशंकराचार्यजी के समान ही है. टेम्बे स्वामी ने अपने जीवन में अत्यंत कठोर रूप से अपने वैदिक वर्णाश्रम-धर्म का पालन करते हुवे अनेक स्त्री-पुरुषो का धार्मिक और आध्यात्मिक उद्धार किया है. कन्याकुमारी से हिमालय तक का प्रवास पदयात्रा द्वारा करते हुवे इन्होने राह में मिले अनेक साधको को उनकी पात्रता के अनुरूप कर्ममार्ग, ज्ञानमार्ग व भक्तिमार्ग का उपदेश करा है. हम ईश्वर से प्रार्थना करते है कि वह उन्हें दीर्घायु प्रदान करे जिससे वे अपने वैदिक धर्म के उत्थापन का कार्य और आगे बढ़ा सके.”
इसवी सन १९०५ में वाड़ी से पंढरपुर जाते समय कमलापुर नाम के स्थान पर उन्हें स्वप्न में एक लम्बे कद का आजानुबाहु (जिसके हाथ उसके घुटनों तक पहुचते हो) व्यक्ति आकर कहता है :- “ अरे तुम्ह भारतभर पदयात्रा करते हो, काव्य-रचना भी करते हो, फिर भी अब तक तुम्हारा ध्यान मेरी और कैसे नहीं गया ?”
सुबह उठकर स्वामीजी भगवान दत्तप्रभु से स्वप्न में आये व्यक्ति के बारे में जानकारी चाहते है और जिस पर दत्तप्रभु उन्हें बताते है कि वह दिव्य व्यक्ति अक्कलकोट के स्वामी समर्थ है और वे चाहते है कि आप अक्कलकोट जावे और उनके जीवन पर एक काव्य की रचना करे. दत्त महाराज के कहे अनुसार टेम्बेस्वामी अक्कलकोट जाते है.
पुंडलिकराव नाम के एक सज्जन शिर्डी के साईंबाबा के प्रमुख शिष्य थे. वे स्वामीजी से (जब टेम्बे स्वामी का मुक्काम राजमहेंद्री में था ) मिलते है. पुंडलिकराव अपनी कीर्तनसेवा भी पेश करते है. आगे चलकर पुंडलिकराव शिर्डी जाकर साईबाबा के दर्शन करने वाले थे. यह बात जानकर टेम्बे स्वामी उन्हें एक नारियल अपने ह्रदय से लगाकर देते है और कहते है कि इसे मेरे भाई साईबाबा को दे देना.
शिर्डी जाते समय पुंडलिकराव और उनके सह-प्रवासी कोपरगाँव में विश्राम करते है. पुंडलिकराव अपना आन्हिक करने उन लोगो से कुछ दूर जाते है तब उनके सह -प्रवासी नाश्ता करना प्रारंभ कर लेते है. नाश्ते में चिवडा अत्यंत मसालेदार और तीखा होने से सबको पानी की प्यास लगती है पर वह गर्मी के दिन होने से कही भी पानी आसानी से उपलब्द्ध नहीं था.
उनमे से कुछ सुज्ञजन पानी के न होने की स्थिति में अपने साथ रखे हुवे नारियलो को खाने का प्रस्ताव रखते है जिससे सबके जलते हुवे मुखों को कुछ राहत मिले. पर इस दौरान टेम्बे स्वामी का दिया हुवा नारियल भी खा लिया जाता है.
जब वे लोग शिर्डी पहुचाते है तब पुंडलिकराव साईं बाबा द्वारा किये उपेक्षित व्यव्हार से व्याकुल हो उठते है. फिर उन्ह सब लोगो की और पीठ करके साईबाबा कहते है:-“अरे चोरो और दुष्टों !, मेरे भाई द्वारा दिया हुवा नारियल कहा है ? मुझे पहले मेरा नारियल ला कर दो.”
पुंडलिकराव जो इस सब घटनाक्रम से अबतक अनभिद्य थे, वह अपने सह प्रवासियों से नारियल के बारे में पूछते है तब कही जाकर नारियल के खा लिए जाने के धर्म-अपराध के बारे में उन्हें पता चलता है.
असल में, पुंडलिक राव व उनके सह-प्रवासियों द्वारा टेम्बेस्वामी द्वारा दिए हुवे नारियल का यथायोग्य सम्मान न करने व उसकी सही ढंग से सुरक्षा न करने के कारण घटित हुवे धर्म-अपराध के लिए साईबाबा दिखावटी क्रोध दिखाते हुवे हलकी फटकार लगाकर उन लोगों को समझाइश दे देते है.
सन १९०५ में अपनी विदर्भ यात्रा के दौरान स्वामी महाराज शेगांव में पधारते है. उनके वहा आने के एक दिन पहिले हि गजानन महाराज ने अपने भक्तो को निर्देशित कर रखा था:-“ मेरा एक सुज्ञ भाई जो कि कर्हाड़े ब्राह्मण है, यहाँ पर आ रहा है. वे अत्यंत धर्मनिष्ठ है. उनके रास्ते में कोई भी कपडे की चिंदी या कोई ऐसा-वैसा पदार्थ जिससे उनके सोवले की शुचिता भंग हो, नहीं आना चाहिए.”
जब टेम्बेस्वामी आते है तब गजानन महाराज अपनी ही धुन में अपनी उंगलिया चटका रहे थे.
जैसे ही टेम्बे स्वामी वहा पहुचते है, गजानन महाराज का उंगलिया चटकाना बंद होता है और दोनों संत एक दुसरे को स्मित व प्रसन्न मुख से प्रेमपूर्वक निहारते है. वहा मुश्किल से ही कोई शब्द उच्चारित होता है वे सिर्फ एक दुसरे के साथ का रसस्वादन करते है.
कुछ देर बाद जब टेम्बे स्वामी गजानन महराज की आज्ञा लेते है तब गजानन महाराज सिर्फ इतना कहते है- “बहुत अच्छा”.
नरसी में एक दोपहर को स्वामी महाराज स्नान करने के लिए जहा नदी पर गए थे, तभी वहा गाव की एक महिला पानी भरने के लिए आती है. वह वहा टेम्बे स्वामी को अपनी गोद में ६ माह के एक शिशु को लेकर बैठे हुवे देखती है जो अपना बाया अंगूठा चूसते हुवे टेम्बे स्वामी को निहार रहा था और स्वामीजी भी उसे प्रेमपूर्वक दृष्टी से मानो प्रति-उत्तर दे रहे थे.
यह देखकर वह महिला अपनी सुध-बुध खोकर अपना कार्य भूलकर अचरज भरी निगाहों से दर्शनलाभ लेती रहती है. कुछ देर बाद जब स्वामी महाराज को उस महिला की उपस्थिति का भान होता है तब वह शिशु अंतर्धान हो जाता है और वह महिला बेसुध हो जाती है. स्वामीजी कुछ पानी के छीटो से उस महिला को सावध करते है और उसे भाग्यवान बताते है क्योकि उसने यह पवित्र व शुभ दृश्य देखा था. यह शिशु और कोई न होकर साक्षात श्री दत्तप्रभु थे.
अपने चौथे चातुर्मास के लिए स्वामीजी बद्रीनारायण की और प्रस्थान कर रहे थे तभी वे एक पर्वतचोटी के पास आते है जिसके आगे एक गहरी खाई उनका रास्ता रोके खड़ी थी. तभी वहा पहाड़ की चोटी से २ व्यक्ति आते है जो स्वामीजी को खाई की भयावहता से अवगत कराते हुवे वापस जाने को कहते है.
स्वामीजी उत्तर देते है कि वे नर व नारायण के दर्शन हेतु यहाँ आये है और इस प्रयत्न में अगर उनके प्राण भी अगर निकल जाते है तो भी उन्हें उसकी परवाह नहीं है; और वे दर्शन किये बिना वापस नहीं लौटेंगे. तभी वे दो व्यक्ति अदृश्य हो जाते है और उनकी जगह स्वामीजी को नर और नारायण के दर्शन हो जाते है.
भगवान दत्तात्रेय ने अपने अनेक भक्तो को यह दृष्टांत दिया था कि वे वासुदेवानंद स्वामीजी के रूप में धरती पर विचरण कर रहे है. श्री आळंदीकर नाम के एक सज्जन की पत्नी कुछ गहनों को धारण करती है जिससे उन पर एक बुरी आत्मा का साया पड जाता है. दरअसल वो गहने कुछ लुटेरो ने उनके पति द्वारा किये गए धार्मिक अनुष्ठानो के प्रतिफल में दिए गए थे.
आळंदीकर लगभग 10 वर्षो तक अपनी पत्नी को विभिन्न उपायों से उस आत्मा के चंगुल से छुड़ाने का प्रयत्न करते है पर उन्हें लेष-मात्र भी सफलता हात नहीं लगती है. आखिर वह गाणगापुर चले आते है. वहा पर 10 दिवसों तक दत्तगुरु की सेवा करने के बाद स्वयं दत्तप्रभु आळंदीकर को दृष्टांत देकर कहते है :-“तुरंत ही गाणगापुर छोड़कर नर्मदा किनारे बसे गरुडेश्वर चले जाओ वहा मै स्वयं वासुदेव सरस्वती नाम से वास्तव्य कर रहा हु.
इस दिव्य दृष्टांत का पालन करते हुवे आळंदीकर तुरंत ही गरुडेश्वर के लिए प्रस्थान करते है और वहा टेम्बे स्वामीजी की कृपा से उनकी पत्नी उस बुरी आत्मा के चंगुल से मुक्त हो जाती है.
इसवी सन १९०७ में तंजावर के वास्तव्य के दौरान एक महिला अपने मृत-पुत्र की देह को एक वस्त्र में लपेटकर चुपचाप उस स्थान पर छोड़ देती है जहा स्वामीजी रुके हुवे थे. जब सब भक्त व दर्शनार्थी चले जाते है तब एक व्यक्ति की उस मृत शिशु पर नज़र पड़ती है और वह उसे स्वामी महाराज के पास ले आता है.
उस माँ की अपने पुत्र के मृत होने की व्यथा को जानकर स्वामीजी दया दिखलाते हुवे कहते है:-“ नहीं,नहीं ! यह मरा नहीं है. इसकी गैर-जिम्मेदार माँ इसे छोड़कर कही चली गई है. यह भभूत उसके शरीर में लगा दो.” भभूत लगाने पर वह शिशु रोने लगता है. और उस शिशु का क्रंदन सुनकर उसकी माँ अपने शिशु को लेने आ जाती है. बाद में वह माता स्वीकार कराती है कि उसने यह तरीका इसलिए अपनाया था क्योंकि वह अपने पहले दो शिशुओ को खो चुकी थी.
स्वामीजी ने कुछ धार्मिक स्थलों जैसे कुरुगुड्डी और पीठापुरम के पुनर्थापन में भी महती भूमिका निभाई थी. पीठापुरम के रहवासी तो श्रीपाद श्रीवल्लभ महाराज (पहले दत्तावतार) के ठीक-ठीक जन्मस्थान के बारे में भी जानते नहीं थे, उन्हें स्वामीजी उस स्थान के बारे में अवगत कराते है.उसी प्रकार से दुसरे दत्त अवतार श्री नृसिंहसरस्वती महाराज के जन्मस्थान के बारे में भी स्वामीजी स्थानीय लोगो को अवगत कराते है. स्वामीजी ने भारत के विभिन्न स्थानों पर दत्त मूर्तियों की भी स्थापना करी थी. “दिगंबरा दिगंबरा श्रीपाद वल्लभ दिगंबरा” ये महामंत्र टेम्बे स्वामी को दत्तकृपा से अवगत हो जाता है और आगे उनके द्वारा इस महामंत्र का बड़े स्तर पर प्रचार-प्रसार होता है.
उनके सभी शिष्य जैसे कि प. पु. नृसिंह सरस्वती दीक्षित स्वामी महाराज,परम पूज्य योगानंद सरस्वती (गांडा महाराज), नारेश्वर के पूज्य श्री रंगावधूत महाराज, पुणे के पूज्य योगिराज व्ही. डी. गुलवणी महाराज, पुणे के ही श्रीदत्त महाराज कविश्वर, इंदौर के प. पु. नाना महाराज तराणेकर, प. पु. केशवानंद सरस्वती महाराज और अन्य दुसरे शिष्यों ने भी अपने-अपने स्तर पर इस महामंत्र का प्रचार किया था. स्वामी महाराज अपने पीछे एक बहुत ही बड़े साहित्य का भंडार छोड़ कर गए है . इनमे से कुछ प्रमुख साहित्य है : श्रीद्विसाहस्त्री गुरुचरित्र (१८८९), श्रीदत्तपुराण (१८९२) , श्रीदत्तलीलामृताब्धीसार (१८९७), श्रीद्विसाहस्त्री योगरहस्यम, बोधरहस्यम चूर्णिका (१८९८), श्रीदत्तपुराण(समीक्षा) १८९९ , माघ माहात्म्य (१९००), श्री दत्त माहात्म्य (१९०१), श्री दत्त त्रिशतीकाव्यम (१९०१) , समश्लोकी श्रीगुरुसंहिता (१९०२), लघु वासुदेव मननसार (१९०३), सप्तशती गुरुचरित्र सार (१९०४), श्रीकृष्णलहरी (१९०४), श्रीदत्तचम्पू (१९०५), कुमारशिक्षा (१९०७),समश्लोकी चूर्णिका (१९०७), श्री कृष्णलहरी (समीक्षा) १९०७, युवाशिक्षा व वृद्ध शिक्षा (१९०८), स्त्री शिक्षा (१९०८) ,पञ्च पाक्षिक, पञ्च पदी, करुणा त्रिपदी, मंत्र विधानं इत्यादि.
अपने २२ वे चातुर्मास के दौरान चिखलदा मे ६-७ महिनो के वास्तव्य के बाद जब टेम्बे स्वामी ने शूलपाणेश्वर का घना वन अश्वत्थामा (महाभारत का एक अमर पात्र) की सहायता से पार किया और वे फिर अपने अगले चातुर्मास के लिए गरुडेश्वर में आ गए. सन १९१३ का यह चातुर्मास उनका आखिरी चातुर्मास साबित होता है. दूरस्थ स्थित एक मंदिर जहा भगवान विष्णु के वाहन गरुड़ ने तपस्या की थी, वह स्वामीजी के आगमन के बाद भक्तो की रेल-पेल से दमकने लगा था. एक बार स्वामी महाराज और उनके तकरीबन १०० भक्त गोकुलाष्टमी का उत्सव मनाते हुवे नर्मदा मैया के तट पर भजन गा रहे थे. तभी आकाश काले बादलो से भर जाता है और नर्मदाजी के दुसरे तट पर तूफानी बारिश होती है. स्वामी महाराज भक्तो को आश्वासित करते है और तूफान की चिंता न करते हुवे भजन करते रहने का निर्देश देते है. उत्सव की समाप्ति के बाद जब सब लोग तट से भवन के अन्दर आते है तब तूफान अपना विकराल रूप धारण कर लेता है. स्वामीजी अपने भक्तो को बतलाते है कि ईश्वर की कृपा से हम सब इस तूफान से अपना बचाव कर पाए है.
स्वामीजी के कहे अनुसार उन्हें १ बार प्लेग, ३ बार हैजा, २ बार कुष्ट रोग, १ बार सफ़ेद दागो की बीमारी, २ बार सर्पदंश और ताउम्र की संग्रहणी की बीमारी से पीड़ित होना पड़ा था. पर उन्होंने कभी कोई उपचार नहीं लिया और अपने आप को ईश्वरीय परमसत्ता की इच्छा पर छोड़ दिया था. सन १९१४ के ग्रीष्मकाल के बाद उनकी संग्रहणी की बीमारी ने जोर पकड़ लिया और उनकी तबियत तेजी से बिघड़ने लगी थी. जैसा की उन्होंने जीवन भर किया वैसे ही उन्होंने अपने-आप को यहाँ भी ईश्वरीय इच्छा पर छोड़ दिया था. वे सिर्फ एक ही चिकित्सक में विश्वास रखते थे-और वे थे श्रीदत्तप्रभु.
जैसे ही जेठ महीने की अमावस्या गुजर कर आषाढ़ का पहला दिन लगता है,उस दिन मंगलवार था, उत्तरायण भी लगा हुवा था, और चन्द्रमा आर्द्रा नक्षत्र में था; तब स्वामीजी सिद्धासन लगाते है और दत्तभगवान के चित्र के सामने ॐ का दीर्घ उच्चारण करके अपनी पञ्चभौतिक देह को त्याग देते है. आज से ११० वर्षो पहले अपनी पञ्चभौतिक देह के त्याग देने के बावजूद, दुनिया भर में फैले टेम्बे स्वामी के लाखो भक्त आज भी उनकी उपस्थिति को महसूस करते है और अपने दैनिक जीवन में उनके अनुभवों का साक्षात्कार अनुभवित करते रहते है. उनका घोष वाक्य ‘स्मर्तृगामी समावतु’ अर्थात ‘जब भी आप मुझे याद करोगे मै तत्काल ही आपके पास पहुच जाऊंगा” आज भी प्रासंगिक है.
#🙏ગુરૂનો મહિમા😇 #🙏ભક્તિ સ્ટેટ્સ #ટેંબે સ્વામી મહારાજ #વાસુદેવાનંદ સરસ્વતી ટેંબે સ્વામી મહારાજ #💐 ગુરૂવાર સ્પેશિયલ
परमहंस परिव्राजकाचार्य श्रीमद वासुदेवानंद सरस्वती (टेम्बे स्वामी) महाराज चरित्रसार.
परमहंस परिव्राजकाचार्य श्रीमद वासुदेवानंद सरस्वती महाराज (जिन्हें हम परम पूज्य टेम्बे स्वामी के नाम से भी जानते है ) का जन्म इसवी सन १८५४ के श्रावण माह के कृष्णपक्ष की पंचमी तिथि को सावंतवाड़ी के पास स्थित माणगाँव नामक गाँव में रहने वाले एक धार्मिक ब्राह्मण-परिवार में हुवा था. उनके पिता का नाम श्री गणेश टेम्बे और माता का नाम सौ. रमाबाई था.
बचपन में श्री टेम्बे स्वामी का नामकरण वासुदेव ऐसा हुवा था. जब उनके पिता श्री गणेश टेम्बेजी गाणगापुर में थे तब उन्हें भगवान दत्तात्रेयजी का साक्षात्कार होता है जिसमे उन्हें माणगाँव जाकर गृहस्थाश्रम का पालन करने का आदेश होता है, साथ ही भगवान दत्तात्रय उन्हें उनके पुत्र के रूप में अवतार लेने का वचन भी देते है.
जब बालक वासुदेव ८ वर्ष के थे तब उनके दादाजी श्री हरी भटजी उनका यज्ञोपवित संस्कार करवा देते है. बालक वासुदेव अपनी प्रतिबद्धता, कुशाग्रता व दिव्य स्मरणशक्ति से शीघ्र ही अपनी वैदिक शिक्षा पूर्ण कर लेते है और पोरोहित्य आदि कार्य के उत्तम ज्ञाता बनकर अपने परिवार की आजीविका में अपना योगदान देते है.
अपनी प्रतिबद्धता व योग साधना से अर्जित अतीन्द्रिय शक्तियों का उपयोग युवा वासुदेव दीन-दुखियो के दुःख व कष्ट दूर करने में प्रयुक्त करते है. अपने शिक्षको के आग्रह पर उन्हें २१ वर्ष की उम्र में विवाहबद्ध होना पड़ा था. अपनी २३ वर्ष की आयु में उन्हें अपने पवित्र व सुह्रदय पिता (जिनकी उम्र उस वक्त ५६-५७ वर्ष थी) का वियोग सहना पड़ा था.
स्वामीजी की माताजी व उनकी धर्मपत्नी सौ.अन्नपूर्णाजी में अक्सर पारिवारिक बातो को लेकर कलह होता रहता था. युवा वासुदेवजी के जीवन में शांति न होने के कारण उनका सांसारिक मोहभंग अत्यंत तीव्र गति से हो गया था. आगे चलकर युवक वासुदेब नर्सोबावाड़ी की यात्रा करते है जहा उन्हें श्री गोविन्दस्वामी और मौनीस्वामी मार्गदर्शित करते है.
भगवन दत्तात्रेय के दृष्टांत होने पर वासुदेव शास्त्री माणगाँव में इसवी सन १८८३ में दत्त मंदिर अनुस्थापित करते है. शीघ्र ही यह मंदिर प्रसिद्धि को प्राप्त हो जाता है और वहा भाविकजन अत्याधिक संख्या में दर्शन करने आने लगते है. अब श्रीवासुदेव शास्त्री को सम्मानपूर्वक वासुदेवबुवा कहकर संबोधित किया जाने लगा था.
भगवान दत्तात्रेयजी के निर्देशानुसार माणगाँव में ७ वर्ष व्यतीत करने के बाद स्वामीजी अपनी गर्भवती पत्नी को साथ लेकर माणगाँव छोड़कर नर्सोबावाड़ी में आ जाते है. कुछ ही समय बाद सौ. अन्नपूर्णा देवी एक मृत शिशु को जन्म देती है.
इसवी सन १८९१ में भगवान दत्तात्रेय बुवा को उत्तर की तरफ जाने के लिए निर्देशित करते है. गंगाखेड नामक स्थान पर उनकी समर्पित पत्नी का हैजे की बीमारी से देहावसन हो जाता है. १४ दिवसों के शोक के बाद वासुदेवबुवा की इच्छानुसार भगवान दत्तात्रेय उन्हें सन्यास ग्रहण करवा देते है और उज्जयिनी जाकर नारायणानंद सरस्वती स्वामी महाराज से दंड ग्रहण करने का निर्देश भी देते है. नारायणानंद सरस्वती स्वामी महाराज वासुदेवबुवा को दंड प्रदान करते है और सन्यास धर्म के अनुसार उनका नामकरण श्रीवासुदेवानंद सरस्वती ऐसा करते है. आगे चलकर भगवान दत्तात्रेय उन्हें उनके जीवन का उद्देश्य बताते हुवे उन्हें संपूर्ण भारतभ्रमण करते हुवे वैदिक धर्म का प्रचार करने और वर्णाश्रम धर्म से विमुख लोगो का मार्गदर्शन करने का निर्देश देते है.
अगले २३ वर्षो तक टेम्बे स्वामी अपने कठोर सन्यास धर्म का पालन करते हुवे सम्पूर्ण देश में भ्रमण करते है. स्वामीजी मध्यम कद-काठी के थे. उनका वर्ण श्याम था. उनकी निगाहे गहरी व तेजपूर्ण थी जो किसी के भी मानस की गहराई में जाकर उसके चित्त को भाप लेती थी. उनकी वाणी मृदु पर अत्यंत स्पष्टवादिता से परिपूर्ण थी. उनका संग्रह सिर्फ ४ लंगोटिया, २ पोशाखे, १ दंड , १ कमण्डलु , १ उपनिषद् की पुस्तक, १ पूजा के बर्तनों से भरा संदूक, भगवान दत्तात्रेय की २ मुर्तिया, १ कुवे से पानी निकालने की रस्सी व लेखन सामग्री तक ही सीमित था. कभी-कभी वे एक उनी शाल का प्रयोग भी कर लेते थे.
वे अपने कपडे स्वयं धोते थे और पैरो में कोई पदत्राण धारण किये बिना ही पदयात्रा किया करते थे.
एक बार उनके एक भक्त ने उनके पैरो से २० धसे हुवे काटे निकाले थे जबकि स्वामीजी ने कभी ऐसा न तो चाहा था न हि ऐसा कोई संकेत दिया था. स्वामीजी अत्यंत विपरीत जलवायु में घने वनों, उष्ण मरुस्थलो व उचे पर्वतीय रास्तो से सिर्फ एक वस्त्र पहने ही भ्रमण किया करते थे. उनके अधिकांश चातुर्मास छोटे गांवो व दूरवर्ती स्थानों पर हुवे थे.
स्वामीजी के जीवन का एकमात्र उद्देश भगवान दत्तात्रेय की आज्ञापालन करने का था और उनकी सारी क्रियाये भगवान दत्तात्रेय को समर्पित थी. स्वामीजी वैसे तो मूलरूप से संकोची व एकाकी जीवन व्यतीत करने वाले व्यक्ति थे पर उन्हें अपने जीवन का एक लम्बा समय जनसमुदायों की भीड़ में गुजारना पड़ा था.
सभी लोगो को वे समान रूप से उपलब्द्ध होते थे. अत्यंत शुचिता का पालन करने के बावजूद भी उनके यहाँ किसी से भी भेदभाव नहीं होता था. हर जात-पात के लोग उनकी कृपा का प्रसाद प्राप्त करते थे. स्वामीजी सभी लोगो के प्रति अत्यंत संवेदनशील थे और अत्यंत सहानभूतिपुर्वक सभी लोगो के दुःख व समस्याओं को सुनकर उस पर उचित मार्गदर्शन किया करते थे. उनके मार्गदर्शन का यथासांग पालन करने पर लोगो के सारे दुःख-दर्द दूर हो जाते थे.
इसवी सन १९१० में नरसोबावाड़ी के वास्तव्य के दौरान वे पुजारी लोगो को हैजे की महामारी की रोकथाम के लिए भगवान दत्तात्रेय की पादुको का अभिषेक करने के लिए निर्देशित करते है. लोगो के पूछने पर कि अभिषेक से कैसे महामारी की रोकथाम होगी, तब स्वामीजी समझाते है :-“मृत्यु भी ईश्वर का ही एक रूप है और यह महामारी उसकी शक्ति है और भगवान को शास्त्रोक्त विधि से प्रसन्न करने से ये शक्तिया भी शांत हो जाती है.” जब स्वामीजी के कहेनुसार अभिषेक होता है तब महामारी टल जाती है.
शारदा पीठ के शंकराचार्य श्री राजराजेश्वरस्वामी हरिद्वार में टेम्बे स्वामी के साथ चातुर्मास (यह टेम्बे स्वामी का का ३ रा चातुर्मास था ) संपन्न करने के बाद टेम्बे स्वामी के असीम प्रशंसक बन गए थे. अपने १७ वे चातुर्मास के समय तंजावर में कावेरी नदी के किनारे से प्रवास करते हुवे टेम्बे स्वामीजी को जब पता चलता है है कि श्रुंगेरीपीठ के शंकराचार्य श्री नरसिंहभारती श्रीरंगम में रुके हुवे है तो टेम्बे स्वामी भी वहा उनका अभिवादन करने चले जाते है.
शंकराचार्यजी श्रीस्वामी को देखकर अत्यंत प्रसन्न हो जाते है. टेम्बे स्वामी शरदाम्बा व शंकराचार्यजी की स्तुति में स्तोत्रो की रचना करते है. शंकराचार्यजी भी एक स्तोत्र के रूप में टेम्बे स्वामी की स्तुति लिखते है औरउनकी भिक्षा का प्रबंध भी करवा देते है.
बाद में शंकराचार्यजी अपने शिष्यों को संबोधित करते हुवे टेम्बे स्वामीजी के बारे में सम्मानजनक शब्द कहते है :-“आप नहीं जानते है कि हमारे बीच आज पधारे टेम्बे स्वामी कौन है ? वे साक्षात दत्त प्रभु के अवतार है जो उनके माता-पिता की गहरी भक्ति और सद्गुणों के कारण टेम्बे स्वामी के रूप में अवतरित हुवे है. इनका वैदिक धर्म को पुनर्जीवित करने का सतत यत्न आदिशंकराचार्यजी के समान ही है. टेम्बे स्वामी ने अपने जीवन में अत्यंत कठोर रूप से अपने वैदिक वर्णाश्रम-धर्म का पालन करते हुवे अनेक स्त्री-पुरुषो का धार्मिक और आध्यात्मिक उद्धार किया है. कन्याकुमारी से हिमालय तक का प्रवास पदयात्रा द्वारा करते हुवे इन्होने राह में मिले अनेक साधको को उनकी पात्रता के अनुरूप कर्ममार्ग, ज्ञानमार्ग व भक्तिमार्ग का उपदेश करा है. हम ईश्वर से प्रार्थना करते है कि वह उन्हें दीर्घायु प्रदान करे जिससे वे अपने वैदिक धर्म के उत्थापन का कार्य और आगे बढ़ा सके.”
इसवी सन १९०५ में वाड़ी से पंढरपुर जाते समय कमलापुर नाम के स्थान पर उन्हें स्वप्न में एक लम्बे कद का आजानुबाहु (जिसके हाथ उसके घुटनों तक पहुचते हो) व्यक्ति आकर कहता है :- “ अरे तुम्ह भारतभर पदयात्रा करते हो, काव्य-रचना भी करते हो, फिर भी अब तक तुम्हारा ध्यान मेरी और कैसे नहीं गया ?”
सुबह उठकर स्वामीजी भगवान दत्तप्रभु से स्वप्न में आये व्यक्ति के बारे में जानकारी चाहते है और जिस पर दत्तप्रभु उन्हें बताते है कि वह दिव्य व्यक्ति अक्कलकोट के स्वामी समर्थ है और वे चाहते है कि आप अक्कलकोट जावे और उनके जीवन पर एक काव्य की रचना करे. दत्त महाराज के कहे अनुसार टेम्बेस्वामी अक्कलकोट जाते है.
पुंडलिकराव नाम के एक सज्जन शिर्डी के साईंबाबा के प्रमुख शिष्य थे. वे स्वामीजी से (जब टेम्बे स्वामी का मुक्काम राजमहेंद्री में था ) मिलते है. पुंडलिकराव अपनी कीर्तनसेवा भी पेश करते है. आगे चलकर पुंडलिकराव शिर्डी जाकर साईबाबा के दर्शन करने वाले थे. यह बात जानकर टेम्बे स्वामी उन्हें एक नारियल अपने ह्रदय से लगाकर देते है और कहते है कि इसे मेरे भाई साईबाबा को दे देना.
शिर्डी जाते समय पुंडलिकराव और उनके सह-प्रवासी कोपरगाँव में विश्राम करते है. पुंडलिकराव अपना आन्हिक करने उन लोगो से कुछ दूर जाते है तब उनके सह -प्रवासी नाश्ता करना प्रारंभ कर लेते है. नाश्ते में चिवडा अत्यंत मसालेदार और तीखा होने से सबको पानी की प्यास लगती है पर वह गर्मी के दिन होने से कही भी पानी आसानी से उपलब्द्ध नहीं था.
उनमे से कुछ सुज्ञजन पानी के न होने की स्थिति में अपने साथ रखे हुवे नारियलो को खाने का प्रस्ताव रखते है जिससे सबके जलते हुवे मुखों को कुछ राहत मिले. पर इस दौरान टेम्बे स्वामी का दिया हुवा नारियल भी खा लिया जाता है.
जब वे लोग शिर्डी पहुचाते है तब पुंडलिकराव साईं बाबा द्वारा किये उपेक्षित व्यव्हार से व्याकुल हो उठते है. फिर उन्ह सब लोगो की और पीठ करके साईबाबा कहते है:-“अरे चोरो और दुष्टों !, मेरे भाई द्वारा दिया हुवा नारियल कहा है ? मुझे पहले मेरा नारियल ला कर दो.”
पुंडलिकराव जो इस सब घटनाक्रम से अबतक अनभिद्य थे, वह अपने सह प्रवासियों से नारियल के बारे में पूछते है तब कही जाकर नारियल के खा लिए जाने के धर्म-अपराध के बारे में उन्हें पता चलता है.
असल में, पुंडलिक राव व उनके सह-प्रवासियों द्वारा टेम्बेस्वामी द्वारा दिए हुवे नारियल का यथायोग्य सम्मान न करने व उसकी सही ढंग से सुरक्षा न करने के कारण घटित हुवे धर्म-अपराध के लिए साईबाबा दिखावटी क्रोध दिखाते हुवे हलकी फटकार लगाकर उन लोगों को समझाइश दे देते है.
सन १९०५ में अपनी विदर्भ यात्रा के दौरान स्वामी महाराज शेगांव में पधारते है. उनके वहा आने के एक दिन पहिले हि गजानन महाराज ने अपने भक्तो को निर्देशित कर रखा था:-“ मेरा एक सुज्ञ भाई जो कि कर्हाड़े ब्राह्मण है, यहाँ पर आ रहा है. वे अत्यंत धर्मनिष्ठ है. उनके रास्ते में कोई भी कपडे की चिंदी या कोई ऐसा-वैसा पदार्थ जिससे उनके सोवले की शुचिता भंग हो, नहीं आना चाहिए.”
जब टेम्बेस्वामी आते है तब गजानन महाराज अपनी ही धुन में अपनी उंगलिया चटका रहे थे.
जैसे ही टेम्बे स्वामी वहा पहुचते है, गजानन महाराज का उंगलिया चटकाना बंद होता है और दोनों संत एक दुसरे को स्मित व प्रसन्न मुख से प्रेमपूर्वक निहारते है. वहा मुश्किल से ही कोई शब्द उच्चारित होता है वे सिर्फ एक दुसरे के साथ का रसस्वादन करते है.
कुछ देर बाद जब टेम्बे स्वामी गजानन महराज की आज्ञा लेते है तब गजानन महाराज सिर्फ इतना कहते है- “बहुत अच्छा”.
नरसी में एक दोपहर को स्वामी महाराज स्नान करने के लिए जहा नदी पर गए थे, तभी वहा गाव की एक महिला पानी भरने के लिए आती है. वह वहा टेम्बे स्वामी को अपनी गोद में ६ माह के एक शिशु को लेकर बैठे हुवे देखती है जो अपना बाया अंगूठा चूसते हुवे टेम्बे स्वामी को निहार रहा था और स्वामीजी भी उसे प्रेमपूर्वक दृष्टी से मानो प्रति-उत्तर दे रहे थे.
यह देखकर वह महिला अपनी सुध-बुध खोकर अपना कार्य भूलकर अचरज भरी निगाहों से दर्शनलाभ लेती रहती है. कुछ देर बाद जब स्वामी महाराज को उस महिला की उपस्थिति का भान होता है तब वह शिशु अंतर्धान हो जाता है और वह महिला बेसुध हो जाती है. स्वामीजी कुछ पानी के छीटो से उस महिला को सावध करते है और उसे भाग्यवान बताते है क्योकि उसने यह पवित्र व शुभ दृश्य देखा था. यह शिशु और कोई न होकर साक्षात श्री दत्तप्रभु थे.
अपने चौथे चातुर्मास के लिए स्वामीजी बद्रीनारायण की और प्रस्थान कर रहे थे तभी वे एक पर्वतचोटी के पास आते है जिसके आगे एक गहरी खाई उनका रास्ता रोके खड़ी थी. तभी वहा पहाड़ की चोटी से २ व्यक्ति आते है जो स्वामीजी को खाई की भयावहता से अवगत कराते हुवे वापस जाने को कहते है.
स्वामीजी उत्तर देते है कि वे नर व नारायण के दर्शन हेतु यहाँ आये है और इस प्रयत्न में अगर उनके प्राण भी अगर निकल जाते है तो भी उन्हें उसकी परवाह नहीं है; और वे दर्शन किये बिना वापस नहीं लौटेंगे. तभी वे दो व्यक्ति अदृश्य हो जाते है और उनकी जगह स्वामीजी को नर और नारायण के दर्शन हो जाते है.
भगवान दत्तात्रेय ने अपने अनेक भक्तो को यह दृष्टांत दिया था कि वे वासुदेवानंद स्वामीजी के रूप में धरती पर विचरण कर रहे है. श्री आळंदीकर नाम के एक सज्जन की पत्नी कुछ गहनों को धारण करती है जिससे उन पर एक बुरी आत्मा का साया पड जाता है. दरअसल वो गहने कुछ लुटेरो ने उनके पति द्वारा किये गए धार्मिक अनुष्ठानो के प्रतिफल में दिए गए थे.
आळंदीकर लगभग 10 वर्षो तक अपनी पत्नी को विभिन्न उपायों से उस आत्मा के चंगुल से छुड़ाने का प्रयत्न करते है पर उन्हें लेष-मात्र भी सफलता हात नहीं लगती है. आखिर वह गाणगापुर चले आते है. वहा पर 10 दिवसों तक दत्तगुरु की सेवा करने के बाद स्वयं दत्तप्रभु आळंदीकर को दृष्टांत देकर कहते है :-“तुरंत ही गाणगापुर छोड़कर नर्मदा किनारे बसे गरुडेश्वर चले जाओ वहा मै स्वयं वासुदेव सरस्वती नाम से वास्तव्य कर रहा हु.
इस दिव्य दृष्टांत का पालन करते हुवे आळंदीकर तुरंत ही गरुडेश्वर के लिए प्रस्थान करते है और वहा टेम्बे स्वामीजी की कृपा से उनकी पत्नी उस बुरी आत्मा के चंगुल से मुक्त हो जाती है.
इसवी सन १९०७ में तंजावर के वास्तव्य के दौरान एक महिला अपने मृत-पुत्र की देह को एक वस्त्र में लपेटकर चुपचाप उस स्थान पर छोड़ देती है जहा स्वामीजी रुके हुवे थे. जब सब भक्त व दर्शनार्थी चले जाते है तब एक व्यक्ति की उस मृत शिशु पर नज़र पड़ती है और वह उसे स्वामी महाराज के पास ले आता है.
उस माँ की अपने पुत्र के मृत होने की व्यथा को जानकर स्वामीजी दया दिखलाते हुवे कहते है:-“ नहीं,नहीं ! यह मरा नहीं है. इसकी गैर-जिम्मेदार माँ इसे छोड़कर कही चली गई है. यह भभूत उसके शरीर में लगा दो.” भभूत लगाने पर वह शिशु रोने लगता है. और उस शिशु का क्रंदन सुनकर उसकी माँ अपने शिशु को लेने आ जाती है. बाद में वह माता स्वीकार कराती है कि उसने यह तरीका इसलिए अपनाया था क्योंकि वह अपने पहले दो शिशुओ को खो चुकी थी.
स्वामीजी ने कुछ धार्मिक स्थलों जैसे कुरुगुड्डी और पीठापुरम के पुनर्थापन में भी महती भूमिका निभाई थी. पीठापुरम के रहवासी तो श्रीपाद श्रीवल्लभ महाराज (पहले दत्तावतार) के ठीक-ठीक जन्मस्थान के बारे में भी जानते नहीं थे, उन्हें स्वामीजी उस स्थान के बारे में अवगत कराते है.उसी प्रकार से दुसरे दत्त अवतार श्री नृसिंहसरस्वती महाराज के जन्मस्थान के बारे में भी स्वामीजी स्थानीय लोगो को अवगत कराते है. स्वामीजी ने भारत के विभिन्न स्थानों पर दत्त मूर्तियों की भी स्थापना करी थी. “दिगंबरा दिगंबरा श्रीपाद वल्लभ दिगंबरा” ये महामंत्र टेम्बे स्वामी को दत्तकृपा से अवगत हो जाता है और आगे उनके द्वारा इस महामंत्र का बड़े स्तर पर प्रचार-प्रसार होता है.
उनके सभी शिष्य जैसे कि प. पु. नृसिंह सरस्वती दीक्षित स्वामी महाराज,परम पूज्य योगानंद सरस्वती (गांडा महाराज), नारेश्वर के पूज्य श्री रंगावधूत महाराज, पुणे के पूज्य योगिराज व्ही. डी. गुलवणी महाराज, पुणे के ही श्रीदत्त महाराज कविश्वर, इंदौर के प. पु. नाना महाराज तराणेकर, प. पु. केशवानंद सरस्वती महाराज और अन्य दुसरे शिष्यों ने भी अपने-अपने स्तर पर इस महामंत्र का प्रचार किया था. स्वामी महाराज अपने पीछे एक बहुत ही बड़े साहित्य का भंडार छोड़ कर गए है . इनमे से कुछ प्रमुख साहित्य है : श्रीद्विसाहस्त्री गुरुचरित्र (१८८९), श्रीदत्तपुराण (१८९२) , श्रीदत्तलीलामृताब्धीसार (१८९७), श्रीद्विसाहस्त्री योगरहस्यम, बोधरहस्यम चूर्णिका (१८९८), श्रीदत्तपुराण(समीक्षा) १८९९ , माघ माहात्म्य (१९००), श्री दत्त माहात्म्य (१९०१), श्री दत्त त्रिशतीकाव्यम (१९०१) , समश्लोकी श्रीगुरुसंहिता (१९०२), लघु वासुदेव मननसार (१९०३), सप्तशती गुरुचरित्र सार (१९०४), श्रीकृष्णलहरी (१९०४), श्रीदत्तचम्पू (१९०५), कुमारशिक्षा (१९०७),समश्लोकी चूर्णिका (१९०७), श्री कृष्णलहरी (समीक्षा) १९०७, युवाशिक्षा व वृद्ध शिक्षा (१९०८), स्त्री शिक्षा (१९०८) ,पञ्च पाक्षिक, पञ्च पदी, करुणा त्रिपदी, मंत्र विधानं इत्यादि.
अपने २२ वे चातुर्मास के दौरान चिखलदा मे ६-७ महिनो के वास्तव्य के बाद जब टेम्बे स्वामी ने शूलपाणेश्वर का घना वन अश्वत्थामा (महाभारत का एक अमर पात्र) की सहायता से पार किया और वे फिर अपने अगले चातुर्मास के लिए गरुडेश्वर में आ गए. सन १९१३ का यह चातुर्मास उनका आखिरी चातुर्मास साबित होता है. दूरस्थ स्थित एक मंदिर जहा भगवान विष्णु के वाहन गरुड़ ने तपस्या की थी, वह स्वामीजी के आगमन के बाद भक्तो की रेल-पेल से दमकने लगा था. एक बार स्वामी महाराज और उनके तकरीबन १०० भक्त गोकुलाष्टमी का उत्सव मनाते हुवे नर्मदा मैया के तट पर भजन गा रहे थे. तभी आकाश काले बादलो से भर जाता है और नर्मदाजी के दुसरे तट पर तूफानी बारिश होती है. स्वामी महाराज भक्तो को आश्वासित करते है और तूफान की चिंता न करते हुवे भजन करते रहने का निर्देश देते है. उत्सव की समाप्ति के बाद जब सब लोग तट से भवन के अन्दर आते है तब तूफान अपना विकराल रूप धारण कर लेता है. स्वामीजी अपने भक्तो को बतलाते है कि ईश्वर की कृपा से हम सब इस तूफान से अपना बचाव कर पाए है.
स्वामीजी के कहे अनुसार उन्हें १ बार प्लेग, ३ बार हैजा, २ बार कुष्ट रोग, १ बार सफ़ेद दागो की बीमारी, २ बार सर्पदंश और ताउम्र की संग्रहणी की बीमारी से पीड़ित होना पड़ा था. पर उन्होंने कभी कोई उपचार नहीं लिया और अपने आप को ईश्वरीय परमसत्ता की इच्छा पर छोड़ दिया था. सन १९१४ के ग्रीष्मकाल के बाद उनकी संग्रहणी की बीमारी ने जोर पकड़ लिया और उनकी तबियत तेजी से बिघड़ने लगी थी. जैसा की उन्होंने जीवन भर किया वैसे ही उन्होंने अपने-आप को यहाँ भी ईश्वरीय इच्छा पर छोड़ दिया था. वे सिर्फ एक ही चिकित्सक में विश्वास रखते थे-और वे थे श्रीदत्तप्रभु.
जैसे ही जेठ महीने की अमावस्या गुजर कर आषाढ़ का पहला दिन लगता है,उस दिन मंगलवार था, उत्तरायण भी लगा हुवा था, और चन्द्रमा आर्द्रा नक्षत्र में था; तब स्वामीजी सिद्धासन लगाते है और दत्तभगवान के चित्र के सामने ॐ का दीर्घ उच्चारण करके अपनी पञ्चभौतिक देह को त्याग देते है. आज से ११० वर्षो पहले अपनी पञ्चभौतिक देह के त्याग देने के बावजूद, दुनिया भर में फैले टेम्बे स्वामी के लाखो भक्त आज भी उनकी उपस्थिति को महसूस करते है और अपने दैनिक जीवन में उनके अनुभवों का साक्षात्कार अनुभवित करते रहते है. उनका घोष वाक्य ‘स्मर्तृगामी समावतु’ अर्थात ‘जब भी आप मुझे याद करोगे मै तत्काल ही आपके पास पहुच जाऊंगा” आज भी प्रासंगिक है.
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परमहंस परीव्राजकाचार्य श्रीमद् वासुदेवानंद सरस्वती स्वामी महाराज (१८५४-१९१४) , यांचा जन्म १८५४ साली महाराष्ट्रातील सावंतवाडीजवळील माणगाव गावी एका सत्प्रवृत्त ब्राह्मण कुटूंबात श्री गणेश टेंबे आणि सौ. रमाबाई यांच्या पोटी झाला. त्यांचे पाळण्यातील नाव ‘वासुदेव’ ठेवले. श्री गणेश टेंबे गाणगापुरात असताना, साक्षात श्री दत्तप्रभू त्यांच्या स्वप्नात प्रकट झाले व त्यांना माणगावी परत जाऊन प्रपंच करावयास सांगितले. श्री दत्तप्रभूंनी त्यांच्या पोटी स्वतः अवतार घेण्याचे वचन दिले.
दूसरे दत्तावतार प. प. श्री नृसिंह सरस्वती स्वामी महाराजांची प्रत्यक्ष सेवा करणाऱ्या योगिनींमध्ये यक्षिणी देवी प्रमुख योगिनी होती. प. प. श्री नृसिंह सरस्वती स्वामी महाराजांनी तीला सांगितले की, “माझा पुढील अवतार माणगांवी होणार आहे. तेव्हा तू माझा पुढील अवतार होण्यापुर्वी तिथे जा आणि ते गाव वसव.” हीच यक्षिणी देवी परमहंस परिव्राजकाचार्य श्री वासुदेवानंद सरस्वती स्वामी महाराजांच्या जन्मस्थळाची म्हणजेच माणगावची ग्रामदेवता आहे.
चि. वासुदेव ८ वर्षाचे असताना त्यांचे आजोबा श्री हरीभटजी यांनी त्यांची मुंज केली. चि. वासुदेव मुळातच तल्लख बुद्धीचे आणि अभ्यासू वृत्तीचे असल्यामुळे लवकरच वेदपारंगत झाले आणि पौरोहीत्याच्या कामातसुद्धा निष्णात झाले. ते घरच्या भिक्षुकीच्या (पौरोहीत्याच्या) व्यवसायात हातभार लावू लागले. आपल्या तपाच्या बळावर आत्मसात केलेल्या सिद्धींचा उपयोग ते नि:स्वार्थपणे लोकांचे कष्ट व दुःख निवारण्यासाठी करू लागले. आपल्या आचार्यांनी सांगितल्याप्रमाणे २१व्या वर्षी त्यांनी गृहस्थाश्रमात पदार्पण केले. ते २३ वर्षांचे असताना त्यांच्या ५६-५७ वर्षांच्या अतिशय सरळ आणि धर्मनीष्ठ स्वभावाच्या पित्याचे देहावसान झाले. त्यांच्या आई रमाबाई व पत्नी सौ. अन्नपूर्णाबाई यांच्यात सतत खटके उडत असत. रोजच्या कलहामुळे त्यांची मुळची वैराग्यपूर्ण वृत्ती अधिकच ज्वाज्वल्य झाली. ते नरसोबा वाडीला गेले असताना त्यांना श्री गोविंद स्वामी व श्री मौनी स्वामी यांचे मार्गदर्शन लाभले. श्री दत्तप्रभूंच्या आज्ञेनुसार श्री वासुदेव शास्त्र्यांनी (श्री स्वामी महाराजांनी) १८८३ साली माणगावी श्री दत्तमंदिराची स्थापना केली. हे मंदीर लवकरच खूप प्रसिद्ध पावले. अनेक भक्त ह्या मंदीरात दर्शनाला येऊ लागले आणि श्री वासुदेव शास्त्र्यांना (श्री स्वामी महाराजांना) आदराने ‘बुवा’ म्हणून संबोधू लागले.
७ वर्षे माणगावी राहील्यावर श्री देवांच्या आज्ञेप्रमाणे आपल्या गर्भवती पत्नीसह त्यांनी माणगाव सोडले आणि नरसोबा वाडीला आले. तेथेच त्यांच्या पत्नी अन्नपूर्णाबाईंनी मृत बालकाला जन्म दिला. १८९१ मध्ये श्रीदेवांनी त्यांना उत्तरेस जाण्याची आज्ञा दिली. पुढे गंगाखेडला त्यांच्या पतीव्रता पत्नी सौ. अन्नपूर्णाबाईंचा महामारीच्या आजाराने (cholera मुळे) मृत्यू झाला. सुतक संपल्यावर, बुवांनी १४ व्या दीवशी संन्यासदीक्षा घेतली. मग दत्तप्रभूंच्या आज्ञेनुसार उज्जैनीला जाऊन तेथील श्री नारायणानंद सरस्वती स्वामी महाराजांकडून शास्त्रोक्त पद्धतीने दंडधारण केला. श्री नारायणानंद सरस्वती स्वामी महाराजांनी दंड देताना बुवांना ‘श्री वासुदेवानंद सरस्वती’ असे संन्यसाश्रमातील नविन नाव अर्पण केले.
श्री दत्तप्रभूंनी श्री स्वामी महाराजांच्या आयुष्याचे मर्म उलगडून त्यांना संपूर्ण भारतभर भ्रमण करून सर्वत्र सनातन वैदिक धर्माचा प्रचार आणि प्रसार करण्याची आज्ञा दिली आणि धर्मापासुन परावृत्त झालेल्या लोकांना परत वर्णाश्रम धर्माच्या मार्गावर आणण्यास सांगितले. श्री दत्तगुरुंच्या आज्ञेनुसार श्री स्वामी महाराजांनी २३ वर्षे कठोर नियमांचे पालन करून संन्यासाश्रम आचरणात आणला. कृष्णवर्णीय आणि मध्यम बांधा असणाऱ्या श्री स्वामी महाराजांचे डोळे अतिशय भेदक होते, जणू काही त्यांची दृष्टी खोल एखाद्याच्या अंत:करणाचा ठाव घेत असे. त्यांची वाणी मृदू असली तरी त्यात एक विलक्षण स्पष्टवक्तेपणा असे. संन्यास नियमांना अनुसरून चार भगव्या लंगोट्या, दोन तशाच छाट्या, दंड, वेळवाचा किंवा लाकडाचा एक कमंडलू, एखादी धाबळी, उपनिषदांची पोथी, पंचायतनाचि संपुष्ट, दोन श्रीदत्तमूर्ती, पाणी काढण्याची एक दोरी आणि थोडे लिखाणाचे साहित्य अशा आणि एवढ्याच संन्यास धर्माला आवश्यक वस्तू ते जवळ बाळगीत असत. त्यांचे कपडे आणि भांडी ते स्वत:च धुत असत. त्यांचा सर्व संचार पायी व अनवाणीच होत असे. एकदा तर एका भक्ताने श्री स्वामी महाराजांच्या पायात शिरलेले २० काटे काढले. श्री स्वामी महाराजांनी पायात एवढे काटे बोचत असल्याची जाणीवसुद्धा आजूबाजूच्या लोकांना होऊ दिली नव्हती. घनदाट अरण्यात, ऊष्ण वाळवंटात किंवा उंच पर्वतांवर, टोकाच्या हवामानाच्या परिस्थतीतसुद्धा ते फक्त एका धाबळीवर रहात असत. (काय ही सहनशीलतेची पराकाष्ठा!)
त्यांचे बहुतांश चातुर्मास लहान खेड्यांत किंवा फार लोकवस्ती नसणाऱ्या भागांत झाले आहेत. श्री दत्तप्रभूंच्या आज्ञेप्रमाणे वागणे हेच त्यांच्या आयुष्याचे ध्येय होते. कितीही अलिप्त रहाण्याचा प्रयत्न केला तरी आयुष्यातिल बराचसा काळ त्यांना लोकांमध्येच व्यतित करावा लागला. श्री स्वामी महाराजांना भेटायला सर्वांना खुला प्रवेश असे. श्री स्वामी महाराजांचे सोवळे आणि नियम कड़क असले तरी ते सर्वांसाठी सारखेच असत, नियमांचे पालन करताना त्यात भेदभाव नसे. सर्व जातीधर्मातील लोकांना त्यांच्या कृपेचा लाभ होत असे. श्री स्वामी महाराज स्वतः खूप भावनाशील होते. ते सर्वांची दुःख आणि समस्या पूर्ण लक्ष देऊन ऐकायचे आणि त्यांच्या समस्यांचे निवारण करण्यासाठी खात्रीचे उपायसुद्धा सुचवायचे. अनेकांना त्यांनी दुःखमुक्त केले होते.
१९१० साली, त्यांच्या नरसोबा वाडीमधील वास्तव्यात त्यांनी महामारीची भयंकर साथ टाळण्याण्यासाठी तेथील पुजाऱ्यांना पादुकांवर अभिषेक करण्याचे सुचवले. तेव्हा तेथील काही लोकांनी जिज्ञासेने विचारले, 'अभिषेकाने महामारी कशी जाईल? त्याचा काय संबंध?' ते ऐकून श्री स्वामी महाराजांनी खुलासा केला, 'मृत्युरूप परमेश्वराच्या महामारी इत्यादी शक्ती आहेत. तरी मृत्यूरूप परमेश्वरास अभिषेकाने शांत केले म्हणजे त्या शक्तीही शांत होतात.' हे ऐकून नंतर सर्व मंडळीनी महारुद्राभिषेक केला. त्यामुळे महामारी शांत झाली.
शारदा पीठाचे शंकराचार्य श्री राजराजेश्वर स्वामी यांना हरिद्वारला श्री स्वामी महाराजांबरोबर एकत्र (श्री स्वामी महाराजांचा तीसरा) चातुर्मास केल्यापासून त्यांचे फार कौतुक होते. श्री स्वामी महाराजांचा १७ वा चातुर्मास तंजावरला झाल्यानंतर कावेरी नदी जवळून जात असताना त्यांना शृंगेरी पीठाचे शंकराचार्य श्री नरसिंह भारती श्रीरंगम् येथे असल्याचे समजले, म्हणून ते त्यांना भेटावयास गेले. श्री स्वामी महाराजांना भेटून त्या धर्मगुरुंनासुद्धा खूप आनंद झाला. श्री स्वामी महाराजांनी शारदांबा (सरस्वती) आणि शंकराचार्य यांच्यावर स्तुतिपर स्तोत्रे रचली. ह्यावर आचर्यांनी श्री स्वामी महाराजांवर स्तुतिपर स्तोत्र रचले. श्री स्वामी महाराजांच्या भीक्षेची सोय करुन बाकीच्या शिष्यांना उद्देशून ते श्री स्वामी महाराजांबद्दल म्हणाले की, “तुम्ही आज येथे आलेल्या ह्या महान स्वामींना ओळखले नाही. साक्षात् दत्तप्रभूच ह्यांच्या माता-पित्यांच्या निस्सीम भक्तिमुळे आणि पुण्याईमुळे त्यांच्या पोटी श्री स्वामी महाराजांच्या रुपाने अवतरले आहेत. ह्यांच्या वैदिक धर्माच्या पुनरुत्थानाच्या कार्याची तुलना आदि शंकराचार्यांच्या कार्याशीच करता येईल. वैदिक संस्कृतीमधील वर्णाश्रम धर्माचे कठोर पालन केल्यामुळे ते इतर अनेक लोकांच्या धार्मिक आणि आध्यात्मिक प्रगतीला कारणीभूत होतील. आसेतुहिमालयपर्यंत (कन्याकुमारीपासून ते हिमालयपर्यंत) पायी प्रवास करून त्यांनी अनेक जिज्ञासु भक्तांना त्यांच्या योग्यतेप्रमाणे कर्म, भक्ति आणि ज्ञान मार्गाचा उपदेश केला आहे. आपण ईश्वरला मनापासून हीच प्रार्थना करुया की ह्यांना दीर्घायुश्य लाभों जेणेकरून वैदिक धर्माच्या पुनरुज्जीवनाचे कार्य यशस्वी होवो.”
एकदा १९०५ साली पंढरपुरहुन वाडीला जात असताना कमलापुर गावी एक उंच आजानुबाहु सत्पुरुष श्री स्वामी महाराजांच्या स्वप्नात प्रकटले आणि त्यांना म्हणाले की, “आपण सर्व ठिकाणी प्रवास करता व काव्य करता… पण आमच्याकडे आपले लक्ष गेले नाही.” उठल्यावर श्री स्वामी महाराजांनी श्री दत्तप्रभूंकडे स्वप्नातल्या ह्या सत्पुरुषाबद्दल विचारणा केली. श्री दत्तप्रभु म्हणाले की, “ ते श्री अक्कलकोटचे स्वामी समर्थ होते आणि त्यांची अशी इच्छा आहे की तुम्ही अक्कलकोटला जावे आणि त्यांच्यावर काव्य करावे. श्री दत्तप्रभूंच्या इच्छेप्रमाणे श्री स्वामी महाराजांनी अक्कलकोटला जाऊन श्री स्वामी समर्थांचे दर्शन घेतले.
श्री पुंडलिकराव नावाचे श्री साईबाबांचे भक्त श्री स्वामी महाराज आंध्र प्रदेशमधील राजमहेंद्री गावात असताना त्यांच्या दर्शनासाठी आले होते व त्यांनी तेथे कीर्तनसेवासुद्धा दिली होती. श्री स्वामी महाराजांनी श्री पुंडलिकरावांची चौकशी केली असता त्यांना असे कळले की ही मंडळी शिर्डीला त्यांच्या गुरुंच्या म्हणजेच श्री साईबाबांच्या दर्शनासाठी निघाली आहेत. तेव्हा श्री स्वामी महाराजांनी त्यांना एक नारळ दिला आणि म्हणाले की, “हा नारळ माझ्या बंधुंना (श्री साईबाबांना) द्या.” परत जाताना ही सर्व मंडळी कोपरगावला थांबली आणि श्री पुंडलीकराव सकाळी संध्या करण्यासाठी बाहेर पडले. त्यांच्या बरोबरच्या लोकांना भूक लागली, म्हणून त्यांनी पोहे केले. ते ज़रा जास्तच तिखट झाले. उन्हाळ्याच्या दिवसात पाणी न मिळाल्यामुळे त्यांच्यापैकी एकाने सर्वांच्या सामनातील नारळ फोडून त्यातल्या पाण्याने आपली तहान भगवाली व तिखटपणा कमी करण्यासाठी खोबरे पोह्यांमध्ये घातले. सर्व नारळांमध्ये श्री पुंडलिरावांना श्री स्वामी महाराजांनी दिलेला नारळसुद्धा फोडून खाल्ला गेला होता. जेव्हा श्री पुंडलिकराव श्री साईबाबांना भेटायला गेले तेव्हा श्री साईबाबांनी चिडून त्यांच्याकडे पाठ फिरवली व म्हणाले, “बदमाश चोरांनो, माझ्या बंधूंनी मला दिलेला नारळ कुठे गेला… आधी मला तो आणून द्या.” श्री पुंडलीकरवांना काही माहीत नसल्याने त्यांनी त्यांच्या बरोबरच्या मंडळींकडे चौकशी केली, तेव्हा त्यांना सगळी हक़ीकत समजली. श्री साईबाबांचे आपल्या बंधुंवर (श्री स्वामी महाराजांवर) किती प्रेम आहे ह्याचा उलगडा झाल्यावर, त्या सर्वांनी चूक झाल्याचे मान्य केले व क्षमा मागितली. श्री साईबाबाांनी झालेल्या चुकीबद्दल त्यांची चांगलीच कानउघडणी केली आणि नंतर राग झटकुन टाकला.
१९०५ साली विदर्भातून प्रवास करताना श्री स्वामी महाराज शेगावला आले. ते येण्याच्या आदल्या दिवशी शेगावच्या श्री गजानन महाराजांनी आपल्या भक्तांना सांगून ठेवले होते की, “माझा कऱ्हाडा ब्राह्मण विद्वान बंधू मला भेटण्यासाठी येत आहे. तो अतिशय कर्मठ आहे. एवढी स्वच्छता ठेवा की वाटेत साधी चिंधीसुद्धा पडलेली दिसता कामा नये.” जेव्हा श्री स्वामी महाराज आले तेव्हा श्री गजानन महाराज बोटांनी टिचक्या वाजवत बसले होते. जेव्हा श्री स्वामी महाराज आले तेव्हा श्री गजानन महाराजांनी त्यांच्याकडे पाहिले व टिचक्या वाजवणे थांबवले. दृष्टादृष्ट होताच एकमेकांना पाहून दोघे गालातल्या गालात हसले. दोघांनाही खूप आनंद झाला. एकमेकांशी फारसे काही बोलणे झाले नाही. श्री स्वामी महाराज जायला निघाले तेव्हा श्री गजानन महाराज “फार बरे” एवढेच म्हणाले. ह्या दोघांमधील न बोलता झालेला आध्यात्मिक पातळीवरील संवाद इतर कोणाला कळला नाही.
श्री स्वामी महाराज एकदा नरसी गावी असताना मध्यान्ह स्नानासाठी नदीवर गेले होते. त्याच वेळी गावातील एक बाई तिथे पाणी भारायला गेली होती. तिला असे दिसले की श्री स्वामी महाराज झाडाखाली बसले आहेत आणि त्यांच्या मांडीवर एक साधारण ६ महिन्याचे बाळ डाव्या पायाचा अंगठा चोखत आहे. श्री स्वामी महाराज व ते बाळ एकमेकांकडे अतिशय प्रेमाने पहात आहेत. ती बाई ते मनोहर दृश्य पहात असताना एवढी भारावून गेली की पाणी भरायचेसुद्धा विसरली. तेवढ्यात श्री स्वामी महाराजांचे लक्ष तिच्याकडे गेले आणि त्यांच्या मांडीवरील ते मूल अदृश्य झाले. ते पाहून ती स्त्री बेशुद्ध झाली. श्री स्वामी महाराजांनी तिच्याजवळ जाऊन पाणी शिंपडून तिला शुद्धिवार आणले आणि म्हणाले, “तुम्ही खुप भाग्यवान आहात. म्हणूनच तुम्ही हे पवित्र दृश्य पाहु शकलात.”
श्री स्वामी महाराजांच्या चौथ्या चतुर्मासाचे वेळी ते बद्री नारायणाला जात असताना एका कड्यावर पोचले. पुढे खोल दरी होती. त्यामुळे त्यांना पुढे जाता येत नव्हते. तेव्हा त्यांना दोन माणसे कड्यावरुन खाली उतरत असलेली दिसली. ते दोघे श्री स्वामी महाराजांना म्हणाले की, “आपण परत मागे फिरा. हा रस्ता खूप धोक्याचा आहे.” श्री स्वामी महाराजांनी त्यांना उत्तर दिले की ते नर नारायणांचे दर्शन घेण्यासाठी आले आहेत आणि प्राण गेला तरी दर्शन झाल्याशिवाय ते मागे फिरणार नाहीत. हे उत्तर ऐकल्यावर ते दोन पुरुष अदृश्य झाले आणि श्री स्वामी महाराजांना त्यांच्या जागी नर नारायण ऋषींचे दर्शन झाले.
भगवंताने अनेक भक्तांना दृष्टांत देऊन सांगितले की ते स्वत: परमहंस परिव्राजकाचार्य श्री वासुदेवानंद सरस्वती स्वामी महाराजांच्या रुपात अवतरले आहेत. आळंदीकर नावाचे एक गृहस्थ दरोडेखोरांच्या एका टोळीकडे काही पूजाविधी करायला जात असत. त्याबदल्यात एकदा त्यांना दरोडेखोरांनी दक्षिणा म्हणून आपल्या लुटीतले काही दागिने दिले. त्यातील काही दागिने अंगावर घातल्यामुळे आळंदीकरांच्या पत्नीला एका पीशाच्चाने झपाटले. तिला ह्या पिशाच्चबाधेतुन मुक्त करण्यासाठी आळंदीकरांनी तब्बल १० वर्षे अनेक उपाय केले. पण ते सर्व अयशस्वी ठरले. शेवटचा पर्याय म्हणून ते दोघे गाणगापुरला गेले आणि तिथे देवांची सेवा करू लागले. काही दिवस गेल्यावर त्यांना श्री दत्तप्रभूंचा दृष्टांत झाला की, “ताबडतोब गाणगापुर सोडून गरुडेश्वरी जावे. तिथे मी स्वतः ‘श्री वासुदेवानंद सरस्वती’ नाम धारण करून रहात आहे.” ह्या दृष्टांताप्रमाणे ते पती पत्नी गरुडेश्वरी श्री स्वामी महाराजांजवळ आले. श्री स्वामी महाराजांच्या कृपेमुळे त्यांची पत्नी पिशाच्चबाधेतुन मुक्त झाली हे वेगळे सांगणे नकोच!
१९०७ साली तंजावरच्या मुक्कामात एका स्त्रीने तिचे मृत बाळ एका कपड्यात गुंडाळून श्री स्वामी महाराजांच्या राहत्या जागेजवळ त्यांच्या येण्याजाण्याच्या वाटेवर ठेवले. भेटायला आलेली सर्व मंडळी जायला निघाली तेव्हा कोणाचे तरी लक्ष ह्या बाळाकडे गेले. ते बाळ मृत्यू पावले आहे अशी बातमी त्यांनी श्री स्वामी महाराजांना सांगितली. त्या बाळाच्या आईची आपल्या बाळाला जगवण्याची सुप्त इच्छा श्री स्वामी महाराजांनी जाणली. दया येऊन ते त्या माणसाला म्हणाले, “छे छे! ते बाळ जिवंत आहे. त्याची आई त्याला दूध न पाजाता निष्काळजीपणे कुठेतरी गेली असेल. जरा हे भस्म त्या बाळाच्या अंगाला चोळा.” त्या बाळाच्या अंगाला भस्म चोळल्यावर ते रडु लागले. ते पाहुन त्याची आई पुढे आली. श्री स्वामी महाराजांच्या कृपादृष्टीने बाळ जिवंत होईल व पूर्वीच्या दोन अपत्यांसारखे मृत्युमुखी पडणार नाही ह्या धारणेने आपण हे बाळ श्री स्वामी महाराजांच्या जवळ ठेवल्याचे तिने कबुल केले.
दत्तसंप्रदायामधील कुरुगड्डी आणि पीठापुर यांसारखी काही महत्त्वाची स्थळे लोकांसमोर आणण्याचे आणि त्या स्थळांचे पुनरुत्थान करण्याचे फार महत्त्वाचे कार्य श्री स्वामी महाराजांच्या हातून घडले. पीठापूरमच्या स्थानिक लोकांनासुद्धा पहिले दत्तावतारी श्री श्रीपादश्रीवल्लभ महाराजांच्या जन्मस्थानाबद्दल माहिती नव्हती. पण श्री वासुदेवानंद सरस्वती स्वामी महाराजांनी लोकांना श्री श्रीपाद श्रीवल्लभ महाराजांचे जन्मस्थळ दाखविले. याचप्रमाणे श्री नृसिंह सरस्वती स्वामी महाराजांचे जन्मस्थानसुद्धा (लाडाचे कारंजे) श्री स्वामी महाराजांनीच जगासमोर आणले. त्यांनी भारतात अनेक ठिकाणी दत्त मूर्तींची स्थापना केली. ‘दिगंबरा दिगंबरा श्रीपाद वल्लभ दिगंबरा’ हा महामंत्रसुद्धा श्री वासुदेवानंद सरस्वती स्वामी महाराजांनी जगाला दिला. त्यांनी फार मोठ्या प्रमाणात ह्या मंत्राचा प्रचार आणि प्रसार केला. नरसिंह सरस्वती (दीक्षित स्वामी महाराज), परमहंस परिव्राजकाचार्य श्री योगानंद सरस्वती (गांडा) स्वामी महाराज, नारेश्वरचे परमपुज्य श्री रंगावधूत स्वामी महाराज, पुण्याचे परमपुज्य योगीराज श्री गुळवणी महाराज, पुण्याचे परमपुज्य श्री दत्त महाराज कविश्वर, इंदुरचे श्री नानामहाराज तराणेकर, परमहंस परिव्राजकाचार्य श्री केशवानंद सरस्वती (तांबे) स्वामी महाराज , प. पू. आनंदयोगेश्वर निळकंठ (भाऊ) महाराज (मुंबई) आणि अशाच अनेक महान शिष्यांनी श्री स्वामी महाराजांच्या ह्या महामंत्राचा प्रचार केला. श्री स्वामी महाराजांनी आपल्यासाठी फार मोठी ग्रंथ संपदा निर्माण करुन ठेवली आहे. त्यांतील काही महत्त्वाच्या ग्रंथांची नावे पुढीलप्रमाणे आहेत - श्री द्विसहस्त्री गुरू चरित्र (१८८९), श्री दत्त पुराण (१८९२), श्री दत्तलीलामृताब्धीसार (१८९७), योगरहस्य आणि बोधरहस्यावर द्विसहस्त्री टीका - चुर्णिका (१८९८), श्री दत्त पुराणावर टीका (१८९९), माघ माहात्म्य (१९००), श्री दत्त माहात्म्य (१९०१), श्री दत्त काव्य त्रिशती (१९०१), श्री गुरु संहिता (समश्लोकी) (१९०२), लघु वासुदेव मानससार (१९०३), सप्तशती गुरु चरित्रसार (१९०४), श्री कृष्णालहिरी (१९०४), श्री दत्तचंपू (१९०५), कुमारशिक्षा (१९०७), समश्लोकी चूर्णिका (१९०७), श्री कृष्णालहिरींवरील टीका (१९०७), युवाशिक्षा आणि वृद्धशिक्षा (१९०८), स्त्रीशिक्षा (१९०८), पंच पाक्षिक, इत्यादी
चिखलद्याला ६-७ महीने राहून (२२ वा चातुर्मास) शूलपाणिश्वराच्या घनदाट जंगलातुन जात असताना श्री स्वामी महाराजांना (महाभारतातील चिरंजीव) अश्वत्थाम्याने वाट दाखवली आणि ते त्यांच्या अंतिम चतुर्मासाच्या मुक्कामाच्या ठिकाणी, गुजरातमधील गरुडेश्वरी १९१३ साली पोचले. फार वर्दळ नसलेले आणि श्री विष्णूच्या गरुडाच्या तपश्चर्येचे स्थान म्हणून ओळखले जाणारे ते देऊळ श्री स्वामी महाराज तेथे राहु लागल्यानंतर त्यांच्या भक्तांच्या गर्दीमुळे गजबजून गेले. एकदा नर्मदेच्या काठी शेकडो भक्तांबरोबर गोकुळाष्टमी साजरी करत असताना भजन रंगात आले होते. नेमके त्याच वेळी अचानक आभाळ भरून आले आणि नर्मदेच्या पैलतीरावर मोठे वादळ होऊन पाऊस पडू लागला. आता गोकुळाष्टमीच्या उत्सवाचा विरस होणार असे वाटत असताना श्री स्वामी महाराजांनी सर्वांना आश्वासन दिले की, “पावसाची काळजी न करता भजन सुरु ठेवा”. उत्सव संपत आला आणि सर्वजण आत आले. त्यावेळी आतापर्यंत शांत असलेले ढग जोराने बरसु लागले. तेव्हा श्री स्वामी महाराज सर्व भक्तांना उद्देशून म्हणाले की, “मघाशी ह्याच वादळाच्या कचाट्यातून आपण सूटलो होतो.”
श्री स्वामी महाराजांच्या कथनानुसार त्यांनी एकदा प्लेग, तीनदा महामारी (पटकी), दोनदा कुष्ठरोग, एकदा कोड, दोनदा सर्पदंश आणि आयुष्यभर संग्रहणीचा विकार सोसला होता. असे असूनसुद्धा ते कधीही औषध घेत नसत. देह प्रारब्धावर सोडून देत असत. १९१४ सालच्या उन्हाळ्यात त्यांच्या संग्रहणीच्या विकाराने जोर धरला आणि त्यांची प्रकृती ढासळू लागली. त्यांच्या तत्वाप्रमाणे त्यांनी औषध न घेता फक्त त्यांचे आराध्य दैवत असणाऱ्या श्री दत्तप्रभुंच्या विश्वासवार आणि इच्छेवर देह सोडून दिला. ज्येष्ठ महिन्यातील अमावस्या टळून आषाढ़ातील प्रतिपदा लागल्यावर (मंगळवार, आर्द्रा नक्षत्र, उत्तरायण) श्री स्वामी महाराज श्री दत्तासमोर सिद्धासनात बसले आणि मुखाने प्रणवोच्चार करून त्यांनी त्यांच्या नश्वर देहाचा त्याग केला. श्री स्वामी महाराज समाधिस्थ होऊन १०० वर्षांहून अधिक काळ लोटला. पण त्यांच्या अस्तित्वाचा अनुभव जगातील लाखो भक्तांनी घेतला आहे. रोजच्या जीवनात त्यांचे अनुभव असणारे कितीतरी भक्त आहेत. श्री स्वामी महाराजांचे ‘स्मर्तृगामी समावतु।’ अर्थात ‘तुम्ही माझे स्मरण केलेत की मी लगेच (तुमच्या मदतीसाठी) तत्परतेने येईन’ हे वचन त्यांनी तंतोतंत पाळले आहे.
।। भक्तवत्सल भक्ताभिमानी राजाधिराज श्रीसदगुरुराज वासुदेवानंद सरस्वती स्वामी महाराज की जय ।।
🙏🏻 अवधूत चिंतन श्री गुरूदेव दत्त 🙏🏻
#🙏गुरुवार भक्ती स्पेशल✨ #✨गुरुवार स्पेशल✨ #🙏जय सद्गुरु स्टेटस #💐संत महंत🙏 #टेंबे स्वामी
परमहंस परीव्राजकाचार्य श्रीमद् वासुदेवानंद सरस्वती स्वामी महाराज (१८५४-१९१४) , यांचा जन्म १८५४ साली महाराष्ट्रातील सावंतवाडीजवळील माणगाव गावी एका सत्प्रवृत्त ब्राह्मण कुटूंबात श्री गणेश टेंबे आणि सौ. रमाबाई यांच्या पोटी झाला. त्यांचे पाळण्यातील नाव ‘वासुदेव’ ठेवले. श्री गणेश टेंबे गाणगापुरात असताना, साक्षात श्री दत्तप्रभू त्यांच्या स्वप्नात प्रकट झाले व त्यांना माणगावी परत जाऊन प्रपंच करावयास सांगितले. श्री दत्तप्रभूंनी त्यांच्या पोटी स्वतः अवतार घेण्याचे वचन दिले.
दूसरे दत्तावतार प. प. श्री नृसिंह सरस्वती स्वामी महाराजांची प्रत्यक्ष सेवा करणाऱ्या योगिनींमध्ये यक्षिणी देवी प्रमुख योगिनी होती. प. प. श्री नृसिंह सरस्वती स्वामी महाराजांनी तीला सांगितले की, “माझा पुढील अवतार माणगांवी होणार आहे. तेव्हा तू माझा पुढील अवतार होण्यापुर्वी तिथे जा आणि ते गाव वसव.” हीच यक्षिणी देवी परमहंस परिव्राजकाचार्य श्री वासुदेवानंद सरस्वती स्वामी महाराजांच्या जन्मस्थळाची म्हणजेच माणगावची ग्रामदेवता आहे.
चि. वासुदेव ८ वर्षाचे असताना त्यांचे आजोबा श्री हरीभटजी यांनी त्यांची मुंज केली. चि. वासुदेव मुळातच तल्लख बुद्धीचे आणि अभ्यासू वृत्तीचे असल्यामुळे लवकरच वेदपारंगत झाले आणि पौरोहीत्याच्या कामातसुद्धा निष्णात झाले. ते घरच्या भिक्षुकीच्या (पौरोहीत्याच्या) व्यवसायात हातभार लावू लागले. आपल्या तपाच्या बळावर आत्मसात केलेल्या सिद्धींचा उपयोग ते नि:स्वार्थपणे लोकांचे कष्ट व दुःख निवारण्यासाठी करू लागले. आपल्या आचार्यांनी सांगितल्याप्रमाणे २१व्या वर्षी त्यांनी गृहस्थाश्रमात पदार्पण केले. ते २३ वर्षांचे असताना त्यांच्या ५६-५७ वर्षांच्या अतिशय सरळ आणि धर्मनीष्ठ स्वभावाच्या पित्याचे देहावसान झाले. त्यांच्या आई रमाबाई व पत्नी सौ. अन्नपूर्णाबाई यांच्यात सतत खटके उडत असत. रोजच्या कलहामुळे त्यांची मुळची वैराग्यपूर्ण वृत्ती अधिकच ज्वाज्वल्य झाली. ते नरसोबा वाडीला गेले असताना त्यांना श्री गोविंद स्वामी व श्री मौनी स्वामी यांचे मार्गदर्शन लाभले. श्री दत्तप्रभूंच्या आज्ञेनुसार श्री वासुदेव शास्त्र्यांनी (श्री स्वामी महाराजांनी) १८८३ साली माणगावी श्री दत्तमंदिराची स्थापना केली. हे मंदीर लवकरच खूप प्रसिद्ध पावले. अनेक भक्त ह्या मंदीरात दर्शनाला येऊ लागले आणि श्री वासुदेव शास्त्र्यांना (श्री स्वामी महाराजांना) आदराने ‘बुवा’ म्हणून संबोधू लागले.
७ वर्षे माणगावी राहील्यावर श्री देवांच्या आज्ञेप्रमाणे आपल्या गर्भवती पत्नीसह त्यांनी माणगाव सोडले आणि नरसोबा वाडीला आले. तेथेच त्यांच्या पत्नी अन्नपूर्णाबाईंनी मृत बालकाला जन्म दिला. १८९१ मध्ये श्रीदेवांनी त्यांना उत्तरेस जाण्याची आज्ञा दिली. पुढे गंगाखेडला त्यांच्या पतीव्रता पत्नी सौ. अन्नपूर्णाबाईंचा महामारीच्या आजाराने (cholera मुळे) मृत्यू झाला. सुतक संपल्यावर, बुवांनी १४ व्या दीवशी संन्यासदीक्षा घेतली. मग दत्तप्रभूंच्या आज्ञेनुसार उज्जैनीला जाऊन तेथील श्री नारायणानंद सरस्वती स्वामी महाराजांकडून शास्त्रोक्त पद्धतीने दंडधारण केला. श्री नारायणानंद सरस्वती स्वामी महाराजांनी दंड देताना बुवांना ‘श्री वासुदेवानंद सरस्वती’ असे संन्यसाश्रमातील नविन नाव अर्पण केले.
श्री दत्तप्रभूंनी श्री स्वामी महाराजांच्या आयुष्याचे मर्म उलगडून त्यांना संपूर्ण भारतभर भ्रमण करून सर्वत्र सनातन वैदिक धर्माचा प्रचार आणि प्रसार करण्याची आज्ञा दिली आणि धर्मापासुन परावृत्त झालेल्या लोकांना परत वर्णाश्रम धर्माच्या मार्गावर आणण्यास सांगितले. श्री दत्तगुरुंच्या आज्ञेनुसार श्री स्वामी महाराजांनी २३ वर्षे कठोर नियमांचे पालन करून संन्यासाश्रम आचरणात आणला. कृष्णवर्णीय आणि मध्यम बांधा असणाऱ्या श्री स्वामी महाराजांचे डोळे अतिशय भेदक होते, जणू काही त्यांची दृष्टी खोल एखाद्याच्या अंत:करणाचा ठाव घेत असे. त्यांची वाणी मृदू असली तरी त्यात एक विलक्षण स्पष्टवक्तेपणा असे. संन्यास नियमांना अनुसरून चार भगव्या लंगोट्या, दोन तशाच छाट्या, दंड, वेळवाचा किंवा लाकडाचा एक कमंडलू, एखादी धाबळी, उपनिषदांची पोथी, पंचायतनाचि संपुष्ट, दोन श्रीदत्तमूर्ती, पाणी काढण्याची एक दोरी आणि थोडे लिखाणाचे साहित्य अशा आणि एवढ्याच संन्यास धर्माला आवश्यक वस्तू ते जवळ बाळगीत असत. त्यांचे कपडे आणि भांडी ते स्वत:च धुत असत. त्यांचा सर्व संचार पायी व अनवाणीच होत असे. एकदा तर एका भक्ताने श्री स्वामी महाराजांच्या पायात शिरलेले २० काटे काढले. श्री स्वामी महाराजांनी पायात एवढे काटे बोचत असल्याची जाणीवसुद्धा आजूबाजूच्या लोकांना होऊ दिली नव्हती. घनदाट अरण्यात, ऊष्ण वाळवंटात किंवा उंच पर्वतांवर, टोकाच्या हवामानाच्या परिस्थतीतसुद्धा ते फक्त एका धाबळीवर रहात असत. (काय ही सहनशीलतेची पराकाष्ठा!)
त्यांचे बहुतांश चातुर्मास लहान खेड्यांत किंवा फार लोकवस्ती नसणाऱ्या भागांत झाले आहेत. श्री दत्तप्रभूंच्या आज्ञेप्रमाणे वागणे हेच त्यांच्या आयुष्याचे ध्येय होते. कितीही अलिप्त रहाण्याचा प्रयत्न केला तरी आयुष्यातिल बराचसा काळ त्यांना लोकांमध्येच व्यतित करावा लागला. श्री स्वामी महाराजांना भेटायला सर्वांना खुला प्रवेश असे. श्री स्वामी महाराजांचे सोवळे आणि नियम कड़क असले तरी ते सर्वांसाठी सारखेच असत, नियमांचे पालन करताना त्यात भेदभाव नसे. सर्व जातीधर्मातील लोकांना त्यांच्या कृपेचा लाभ होत असे. श्री स्वामी महाराज स्वतः खूप भावनाशील होते. ते सर्वांची दुःख आणि समस्या पूर्ण लक्ष देऊन ऐकायचे आणि त्यांच्या समस्यांचे निवारण करण्यासाठी खात्रीचे उपायसुद्धा सुचवायचे. अनेकांना त्यांनी दुःखमुक्त केले होते.
१९१० साली, त्यांच्या नरसोबा वाडीमधील वास्तव्यात त्यांनी महामारीची भयंकर साथ टाळण्याण्यासाठी तेथील पुजाऱ्यांना पादुकांवर अभिषेक करण्याचे सुचवले. तेव्हा तेथील काही लोकांनी जिज्ञासेने विचारले, 'अभिषेकाने महामारी कशी जाईल? त्याचा काय संबंध?' ते ऐकून श्री स्वामी महाराजांनी खुलासा केला, 'मृत्युरूप परमेश्वराच्या महामारी इत्यादी शक्ती आहेत. तरी मृत्यूरूप परमेश्वरास अभिषेकाने शांत केले म्हणजे त्या शक्तीही शांत होतात.' हे ऐकून नंतर सर्व मंडळीनी महारुद्राभिषेक केला. त्यामुळे महामारी शांत झाली.
शारदा पीठाचे शंकराचार्य श्री राजराजेश्वर स्वामी यांना हरिद्वारला श्री स्वामी महाराजांबरोबर एकत्र (श्री स्वामी महाराजांचा तीसरा) चातुर्मास केल्यापासून त्यांचे फार कौतुक होते. श्री स्वामी महाराजांचा १७ वा चातुर्मास तंजावरला झाल्यानंतर कावेरी नदी जवळून जात असताना त्यांना शृंगेरी पीठाचे शंकराचार्य श्री नरसिंह भारती श्रीरंगम् येथे असल्याचे समजले, म्हणून ते त्यांना भेटावयास गेले. श्री स्वामी महाराजांना भेटून त्या धर्मगुरुंनासुद्धा खूप आनंद झाला. श्री स्वामी महाराजांनी शारदांबा (सरस्वती) आणि शंकराचार्य यांच्यावर स्तुतिपर स्तोत्रे रचली. ह्यावर आचर्यांनी श्री स्वामी महाराजांवर स्तुतिपर स्तोत्र रचले. श्री स्वामी महाराजांच्या भीक्षेची सोय करुन बाकीच्या शिष्यांना उद्देशून ते श्री स्वामी महाराजांबद्दल म्हणाले की, “तुम्ही आज येथे आलेल्या ह्या महान स्वामींना ओळखले नाही. साक्षात् दत्तप्रभूच ह्यांच्या माता-पित्यांच्या निस्सीम भक्तिमुळे आणि पुण्याईमुळे त्यांच्या पोटी श्री स्वामी महाराजांच्या रुपाने अवतरले आहेत. ह्यांच्या वैदिक धर्माच्या पुनरुत्थानाच्या कार्याची तुलना आदि शंकराचार्यांच्या कार्याशीच करता येईल. वैदिक संस्कृतीमधील वर्णाश्रम धर्माचे कठोर पालन केल्यामुळे ते इतर अनेक लोकांच्या धार्मिक आणि आध्यात्मिक प्रगतीला कारणीभूत होतील. आसेतुहिमालयपर्यंत (कन्याकुमारीपासून ते हिमालयपर्यंत) पायी प्रवास करून त्यांनी अनेक जिज्ञासु भक्तांना त्यांच्या योग्यतेप्रमाणे कर्म, भक्ति आणि ज्ञान मार्गाचा उपदेश केला आहे. आपण ईश्वरला मनापासून हीच प्रार्थना करुया की ह्यांना दीर्घायुश्य लाभों जेणेकरून वैदिक धर्माच्या पुनरुज्जीवनाचे कार्य यशस्वी होवो.”
एकदा १९०५ साली पंढरपुरहुन वाडीला जात असताना कमलापुर गावी एक उंच आजानुबाहु सत्पुरुष श्री स्वामी महाराजांच्या स्वप्नात प्रकटले आणि त्यांना म्हणाले की, “आपण सर्व ठिकाणी प्रवास करता व काव्य करता… पण आमच्याकडे आपले लक्ष गेले नाही.” उठल्यावर श्री स्वामी महाराजांनी श्री दत्तप्रभूंकडे स्वप्नातल्या ह्या सत्पुरुषाबद्दल विचारणा केली. श्री दत्तप्रभु म्हणाले की, “ ते श्री अक्कलकोटचे स्वामी समर्थ होते आणि त्यांची अशी इच्छा आहे की तुम्ही अक्कलकोटला जावे आणि त्यांच्यावर काव्य करावे. श्री दत्तप्रभूंच्या इच्छेप्रमाणे श्री स्वामी महाराजांनी अक्कलकोटला जाऊन श्री स्वामी समर्थांचे दर्शन घेतले.
श्री पुंडलिकराव नावाचे श्री साईबाबांचे भक्त श्री स्वामी महाराज आंध्र प्रदेशमधील राजमहेंद्री गावात असताना त्यांच्या दर्शनासाठी आले होते व त्यांनी तेथे कीर्तनसेवासुद्धा दिली होती. श्री स्वामी महाराजांनी श्री पुंडलिकरावांची चौकशी केली असता त्यांना असे कळले की ही मंडळी शिर्डीला त्यांच्या गुरुंच्या म्हणजेच श्री साईबाबांच्या दर्शनासाठी निघाली आहेत. तेव्हा श्री स्वामी महाराजांनी त्यांना एक नारळ दिला आणि म्हणाले की, “हा नारळ माझ्या बंधुंना (श्री साईबाबांना) द्या.” परत जाताना ही सर्व मंडळी कोपरगावला थांबली आणि श्री पुंडलीकराव सकाळी संध्या करण्यासाठी बाहेर पडले. त्यांच्या बरोबरच्या लोकांना भूक लागली, म्हणून त्यांनी पोहे केले. ते ज़रा जास्तच तिखट झाले. उन्हाळ्याच्या दिवसात पाणी न मिळाल्यामुळे त्यांच्यापैकी एकाने सर्वांच्या सामनातील नारळ फोडून त्यातल्या पाण्याने आपली तहान भगवाली व तिखटपणा कमी करण्यासाठी खोबरे पोह्यांमध्ये घातले. सर्व नारळांमध्ये श्री पुंडलिरावांना श्री स्वामी महाराजांनी दिलेला नारळसुद्धा फोडून खाल्ला गेला होता. जेव्हा श्री पुंडलिकराव श्री साईबाबांना भेटायला गेले तेव्हा श्री साईबाबांनी चिडून त्यांच्याकडे पाठ फिरवली व म्हणाले, “बदमाश चोरांनो, माझ्या बंधूंनी मला दिलेला नारळ कुठे गेला… आधी मला तो आणून द्या.” श्री पुंडलीकरवांना काही माहीत नसल्याने त्यांनी त्यांच्या बरोबरच्या मंडळींकडे चौकशी केली, तेव्हा त्यांना सगळी हक़ीकत समजली. श्री साईबाबांचे आपल्या बंधुंवर (श्री स्वामी महाराजांवर) किती प्रेम आहे ह्याचा उलगडा झाल्यावर, त्या सर्वांनी चूक झाल्याचे मान्य केले व क्षमा मागितली. श्री साईबाबाांनी झालेल्या चुकीबद्दल त्यांची चांगलीच कानउघडणी केली आणि नंतर राग झटकुन टाकला.
१९०५ साली विदर्भातून प्रवास करताना श्री स्वामी महाराज शेगावला आले. ते येण्याच्या आदल्या दिवशी शेगावच्या श्री गजानन महाराजांनी आपल्या भक्तांना सांगून ठेवले होते की, “माझा कऱ्हाडा ब्राह्मण विद्वान बंधू मला भेटण्यासाठी येत आहे. तो अतिशय कर्मठ आहे. एवढी स्वच्छता ठेवा की वाटेत साधी चिंधीसुद्धा पडलेली दिसता कामा नये.” जेव्हा श्री स्वामी महाराज आले तेव्हा श्री गजानन महाराज बोटांनी टिचक्या वाजवत बसले होते. जेव्हा श्री स्वामी महाराज आले तेव्हा श्री गजानन महाराजांनी त्यांच्याकडे पाहिले व टिचक्या वाजवणे थांबवले. दृष्टादृष्ट होताच एकमेकांना पाहून दोघे गालातल्या गालात हसले. दोघांनाही खूप आनंद झाला. एकमेकांशी फारसे काही बोलणे झाले नाही. श्री स्वामी महाराज जायला निघाले तेव्हा श्री गजानन महाराज “फार बरे” एवढेच म्हणाले. ह्या दोघांमधील न बोलता झालेला आध्यात्मिक पातळीवरील संवाद इतर कोणाला कळला नाही.
श्री स्वामी महाराज एकदा नरसी गावी असताना मध्यान्ह स्नानासाठी नदीवर गेले होते. त्याच वेळी गावातील एक बाई तिथे पाणी भारायला गेली होती. तिला असे दिसले की श्री स्वामी महाराज झाडाखाली बसले आहेत आणि त्यांच्या मांडीवर एक साधारण ६ महिन्याचे बाळ डाव्या पायाचा अंगठा चोखत आहे. श्री स्वामी महाराज व ते बाळ एकमेकांकडे अतिशय प्रेमाने पहात आहेत. ती बाई ते मनोहर दृश्य पहात असताना एवढी भारावून गेली की पाणी भरायचेसुद्धा विसरली. तेवढ्यात श्री स्वामी महाराजांचे लक्ष तिच्याकडे गेले आणि त्यांच्या मांडीवरील ते मूल अदृश्य झाले. ते पाहून ती स्त्री बेशुद्ध झाली. श्री स्वामी महाराजांनी तिच्याजवळ जाऊन पाणी शिंपडून तिला शुद्धिवार आणले आणि म्हणाले, “तुम्ही खुप भाग्यवान आहात. म्हणूनच तुम्ही हे पवित्र दृश्य पाहु शकलात.”
श्री स्वामी महाराजांच्या चौथ्या चतुर्मासाचे वेळी ते बद्री नारायणाला जात असताना एका कड्यावर पोचले. पुढे खोल दरी होती. त्यामुळे त्यांना पुढे जाता येत नव्हते. तेव्हा त्यांना दोन माणसे कड्यावरुन खाली उतरत असलेली दिसली. ते दोघे श्री स्वामी महाराजांना म्हणाले की, “आपण परत मागे फिरा. हा रस्ता खूप धोक्याचा आहे.” श्री स्वामी महाराजांनी त्यांना उत्तर दिले की ते नर नारायणांचे दर्शन घेण्यासाठी आले आहेत आणि प्राण गेला तरी दर्शन झाल्याशिवाय ते मागे फिरणार नाहीत. हे उत्तर ऐकल्यावर ते दोन पुरुष अदृश्य झाले आणि श्री स्वामी महाराजांना त्यांच्या जागी नर नारायण ऋषींचे दर्शन झाले.
भगवंताने अनेक भक्तांना दृष्टांत देऊन सांगितले की ते स्वत: परमहंस परिव्राजकाचार्य श्री वासुदेवानंद सरस्वती स्वामी महाराजांच्या रुपात अवतरले आहेत. आळंदीकर नावाचे एक गृहस्थ दरोडेखोरांच्या एका टोळीकडे काही पूजाविधी करायला जात असत. त्याबदल्यात एकदा त्यांना दरोडेखोरांनी दक्षिणा म्हणून आपल्या लुटीतले काही दागिने दिले. त्यातील काही दागिने अंगावर घातल्यामुळे आळंदीकरांच्या पत्नीला एका पीशाच्चाने झपाटले. तिला ह्या पिशाच्चबाधेतुन मुक्त करण्यासाठी आळंदीकरांनी तब्बल १० वर्षे अनेक उपाय केले. पण ते सर्व अयशस्वी ठरले. शेवटचा पर्याय म्हणून ते दोघे गाणगापुरला गेले आणि तिथे देवांची सेवा करू लागले. काही दिवस गेल्यावर त्यांना श्री दत्तप्रभूंचा दृष्टांत झाला की, “ताबडतोब गाणगापुर सोडून गरुडेश्वरी जावे. तिथे मी स्वतः ‘श्री वासुदेवानंद सरस्वती’ नाम धारण करून रहात आहे.” ह्या दृष्टांताप्रमाणे ते पती पत्नी गरुडेश्वरी श्री स्वामी महाराजांजवळ आले. श्री स्वामी महाराजांच्या कृपेमुळे त्यांची पत्नी पिशाच्चबाधेतुन मुक्त झाली हे वेगळे सांगणे नकोच!
१९०७ साली तंजावरच्या मुक्कामात एका स्त्रीने तिचे मृत बाळ एका कपड्यात गुंडाळून श्री स्वामी महाराजांच्या राहत्या जागेजवळ त्यांच्या येण्याजाण्याच्या वाटेवर ठेवले. भेटायला आलेली सर्व मंडळी जायला निघाली तेव्हा कोणाचे तरी लक्ष ह्या बाळाकडे गेले. ते बाळ मृत्यू पावले आहे अशी बातमी त्यांनी श्री स्वामी महाराजांना सांगितली. त्या बाळाच्या आईची आपल्या बाळाला जगवण्याची सुप्त इच्छा श्री स्वामी महाराजांनी जाणली. दया येऊन ते त्या माणसाला म्हणाले, “छे छे! ते बाळ जिवंत आहे. त्याची आई त्याला दूध न पाजाता निष्काळजीपणे कुठेतरी गेली असेल. जरा हे भस्म त्या बाळाच्या अंगाला चोळा.” त्या बाळाच्या अंगाला भस्म चोळल्यावर ते रडु लागले. ते पाहुन त्याची आई पुढे आली. श्री स्वामी महाराजांच्या कृपादृष्टीने बाळ जिवंत होईल व पूर्वीच्या दोन अपत्यांसारखे मृत्युमुखी पडणार नाही ह्या धारणेने आपण हे बाळ श्री स्वामी महाराजांच्या जवळ ठेवल्याचे तिने कबुल केले.
दत्तसंप्रदायामधील कुरुगड्डी आणि पीठापुर यांसारखी काही महत्त्वाची स्थळे लोकांसमोर आणण्याचे आणि त्या स्थळांचे पुनरुत्थान करण्याचे फार महत्त्वाचे कार्य श्री स्वामी महाराजांच्या हातून घडले. पीठापूरमच्या स्थानिक लोकांनासुद्धा पहिले दत्तावतारी श्री श्रीपादश्रीवल्लभ महाराजांच्या जन्मस्थानाबद्दल माहिती नव्हती. पण श्री वासुदेवानंद सरस्वती स्वामी महाराजांनी लोकांना श्री श्रीपाद श्रीवल्लभ महाराजांचे जन्मस्थळ दाखविले. याचप्रमाणे श्री नृसिंह सरस्वती स्वामी महाराजांचे जन्मस्थानसुद्धा (लाडाचे कारंजे) श्री स्वामी महाराजांनीच जगासमोर आणले. त्यांनी भारतात अनेक ठिकाणी दत्त मूर्तींची स्थापना केली. ‘दिगंबरा दिगंबरा श्रीपाद वल्लभ दिगंबरा’ हा महामंत्रसुद्धा श्री वासुदेवानंद सरस्वती स्वामी महाराजांनी जगाला दिला. त्यांनी फार मोठ्या प्रमाणात ह्या मंत्राचा प्रचार आणि प्रसार केला. नरसिंह सरस्वती (दीक्षित स्वामी महाराज), परमहंस परिव्राजकाचार्य श्री योगानंद सरस्वती (गांडा) स्वामी महाराज, नारेश्वरचे परमपुज्य श्री रंगावधूत स्वामी महाराज, पुण्याचे परमपुज्य योगीराज श्री गुळवणी महाराज, पुण्याचे परमपुज्य श्री दत्त महाराज कविश्वर, इंदुरचे श्री नानामहाराज तराणेकर, परमहंस परिव्राजकाचार्य श्री केशवानंद सरस्वती (तांबे) स्वामी महाराज , प. पू. आनंदयोगेश्वर निळकंठ (भाऊ) महाराज (मुंबई) आणि अशाच अनेक महान शिष्यांनी श्री स्वामी महाराजांच्या ह्या महामंत्राचा प्रचार केला. श्री स्वामी महाराजांनी आपल्यासाठी फार मोठी ग्रंथ संपदा निर्माण करुन ठेवली आहे. त्यांतील काही महत्त्वाच्या ग्रंथांची नावे पुढीलप्रमाणे आहेत - श्री द्विसहस्त्री गुरू चरित्र (१८८९), श्री दत्त पुराण (१८९२), श्री दत्तलीलामृताब्धीसार (१८९७), योगरहस्य आणि बोधरहस्यावर द्विसहस्त्री टीका - चुर्णिका (१८९८), श्री दत्त पुराणावर टीका (१८९९), माघ माहात्म्य (१९००), श्री दत्त माहात्म्य (१९०१), श्री दत्त काव्य त्रिशती (१९०१), श्री गुरु संहिता (समश्लोकी) (१९०२), लघु वासुदेव मानससार (१९०३), सप्तशती गुरु चरित्रसार (१९०४), श्री कृष्णालहिरी (१९०४), श्री दत्तचंपू (१९०५), कुमारशिक्षा (१९०७), समश्लोकी चूर्णिका (१९०७), श्री कृष्णालहिरींवरील टीका (१९०७), युवाशिक्षा आणि वृद्धशिक्षा (१९०८), स्त्रीशिक्षा (१९०८), पंच पाक्षिक, इत्यादी
चिखलद्याला ६-७ महीने राहून (२२ वा चातुर्मास) शूलपाणिश्वराच्या घनदाट जंगलातुन जात असताना श्री स्वामी महाराजांना (महाभारतातील चिरंजीव) अश्वत्थाम्याने वाट दाखवली आणि ते त्यांच्या अंतिम चतुर्मासाच्या मुक्कामाच्या ठिकाणी, गुजरातमधील गरुडेश्वरी १९१३ साली पोचले. फार वर्दळ नसलेले आणि श्री विष्णूच्या गरुडाच्या तपश्चर्येचे स्थान म्हणून ओळखले जाणारे ते देऊळ श्री स्वामी महाराज तेथे राहु लागल्यानंतर त्यांच्या भक्तांच्या गर्दीमुळे गजबजून गेले. एकदा नर्मदेच्या काठी शेकडो भक्तांबरोबर गोकुळाष्टमी साजरी करत असताना भजन रंगात आले होते. नेमके त्याच वेळी अचानक आभाळ भरून आले आणि नर्मदेच्या पैलतीरावर मोठे वादळ होऊन पाऊस पडू लागला. आता गोकुळाष्टमीच्या उत्सवाचा विरस होणार असे वाटत असताना श्री स्वामी महाराजांनी सर्वांना आश्वासन दिले की, “पावसाची काळजी न करता भजन सुरु ठेवा”. उत्सव संपत आला आणि सर्वजण आत आले. त्यावेळी आतापर्यंत शांत असलेले ढग जोराने बरसु लागले. तेव्हा श्री स्वामी महाराज सर्व भक्तांना उद्देशून म्हणाले की, “मघाशी ह्याच वादळाच्या कचाट्यातून आपण सूटलो होतो.”
श्री स्वामी महाराजांच्या कथनानुसार त्यांनी एकदा प्लेग, तीनदा महामारी (पटकी), दोनदा कुष्ठरोग, एकदा कोड, दोनदा सर्पदंश आणि आयुष्यभर संग्रहणीचा विकार सोसला होता. असे असूनसुद्धा ते कधीही औषध घेत नसत. देह प्रारब्धावर सोडून देत असत. १९१४ सालच्या उन्हाळ्यात त्यांच्या संग्रहणीच्या विकाराने जोर धरला आणि त्यांची प्रकृती ढासळू लागली. त्यांच्या तत्वाप्रमाणे त्यांनी औषध न घेता फक्त त्यांचे आराध्य दैवत असणाऱ्या श्री दत्तप्रभुंच्या विश्वासवार आणि इच्छेवर देह सोडून दिला. ज्येष्ठ महिन्यातील अमावस्या टळून आषाढ़ातील प्रतिपदा लागल्यावर (मंगळवार, आर्द्रा नक्षत्र, उत्तरायण) श्री स्वामी महाराज श्री दत्तासमोर सिद्धासनात बसले आणि मुखाने प्रणवोच्चार करून त्यांनी त्यांच्या नश्वर देहाचा त्याग केला. श्री स्वामी महाराज समाधिस्थ होऊन १०० वर्षांहून अधिक काळ लोटला. पण त्यांच्या अस्तित्वाचा अनुभव जगातील लाखो भक्तांनी घेतला आहे. रोजच्या जीवनात त्यांचे अनुभव असणारे कितीतरी भक्त आहेत. श्री स्वामी महाराजांचे ‘स्मर्तृगामी समावतु।’ अर्थात ‘तुम्ही माझे स्मरण केलेत की मी लगेच (तुमच्या मदतीसाठी) तत्परतेने येईन’ हे वचन त्यांनी तंतोतंत पाळले आहे.
।। भक्तवत्सल भक्ताभिमानी राजाधिराज श्रीसदगुरुराज वासुदेवानंद सरस्वती स्वामी महाराज की जय ।।
🙏🏻 अवधूत चिंतन श्री गुरूदेव दत्त 🙏🏻
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