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Purnima Spl Satyanarayan Puja | 1 May 2026 | Live From VDS Bangalore Ashram
Courtesy: vaidicpujas on YouTube
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सर्वोच्च पुण्य कर्म
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● गौधन
गायों की सेवा – एक आनंददायक उत्तरदायित्व
“गोशाला” शब्द संस्कृत के दो शब्दों से बना है— ‘गो’ अर्थात गाय और ‘शाला’ अर्थात आश्रय। परंपरागत रूप से भारत के प्रत्येक गाँव में एक गोशाला हुआ करती थी। आज भी भारतीय संस्कृति और कृषि में गाय का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है और उससे जुड़ी अनेक परंपराएँ प्रचलित हैं।
आर्ट ऑफ लिविंग की गोशाला में गायों की देखभाल करना न केवल पुण्यकारी है, बल्कि अत्यंत आनंददायक अनुभव भी है। देशी गायें अपने स्नेही, सतर्क और मित्रवत स्वभाव के लिए जानी जाती हैं। वे पालतू पशुओं की तरह प्रेम और ध्यान चाहती हैं। विशेष रूप से गिर गायों के साथ आत्मीय संबंध बनाना आवश्यक होता है, क्योंकि यह संबंध बने बिना वे दूध नहीं देतीं।
बेंगलुरु स्थित आर्ट ऑफ लिविंग इंटरनेशनल हेडक्वार्टर की गोशाला में अनेक गतिविधियाँ निरंतर चलती रहती हैं:
अग्निहोत्र
यह एक दैनिक अग्नि-यज्ञ है, जो वातावरण को शुद्ध करता है और ओज़ोन परत की मरम्मत में सहायक माना जाता है। यह प्राकृतिक रूप से मच्छर भगाने में भी उपयोगी है।
अग्निहोत्र की भस्म को देशी गाय के गोबर के साथ मिलाने से उत्तम खाद बनती है। यदि इस भस्म को देशी गाय के घी में मिलाया जाए, तो उसमें जीवाणुरोधी गुण होते हैं।
महामृत्युंजय होम
यह दैनिक रूप से किया जाने वाला अनुष्ठान है, जिसका उद्देश्य रोगों से रक्षा और उत्तम स्वास्थ्य की प्राप्ति है। इसमें प्रयुक्त घी और गोबर की लकड़ियाँ गोशाला में ही शुद्ध विधि से तैयार की जाती हैं।
संरक्षण एवं संवर्धन
प्रजनन की प्रक्रिया अत्यंत सावधानी से की जाती है, ताकि शुद्ध नस्ल बनी रहे। गर्भवती गायों की विशेष देखभाल प्रसव से पहले की जाती है।
आहार व्यवस्था
गायों को दिन में तीन बार ताज़ा और सूखा चारा, चने की भूसी तथा खनिज पूरक दिए जाते हैं। साथ ही उन्हें चरने का अवसर भी मिलता है।
दुग्ध दोहन
गायों का दुग्ध-दोहन दिन में दो बार किया जाता है। यह दूध आश्रम तथा आस-पास के घरों में वितरित किया जाता है।
हरित ऊर्जा
गाय के गोबर से बायोगैस बनाकर ऊर्जा की आवश्यकताओं की पूर्ति की जाती है।
मार्गदर्शित भ्रमण
आगंतुक विभिन्न भारतीय गायों की नस्लों और उनके महत्व के बारे में जानने हेतु भ्रमण कर सकते हैं तथा चाहें तो गायों की सफाई और साज-संभाल में भाग भी ले सकते हैं।
सेवा
हिंदू परंपरा में गौ-सेवा को अत्यंत पुण्यकारी माना गया है। गायों को नहलाना, संवारना और उनकी देखभाल करना सेवा के प्रमुख रूप हैं।
गौ-दान
गौ-दान को हिंदू धर्म में सर्वोच्च दान माना गया है।
अन्य गतिविधियाँ
इनमें गायों को नहलाना, शेड और खुले बाड़ों की सफाई, चोटों व रोगों की जाँच तथा आवश्यक चिकित्सकीय देखभाल शामिल है।
आर्ट ऑफ लिविंग की योजना है कि भारत भर में अपने सभी केंद्रों पर गोशालाएँ स्थापित की जाएँ। वर्तमान में तीन गोशालाएँ कार्यरत हैं—
बेंगलुरु, कर्नाटक
वासद, गुजरात
इन गोशालाओं का उद्देश्य शुद्ध देशी नस्लों का संरक्षण करना है। साथ ही ये जैविक एवं शून्य-बजट प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देती हैं, जिससे भारतीय किसानों की कठिनाइयों और ऋण की समस्या को कम किया जा सके।
गुरुदेव श्री श्री रविशंकर के अनुसार, भारत की समृद्धि के लिए मनुष्य और गाय का संतुलित अनुपात बनाए रखना अत्यंत आवश्यक है।
● रणनीति
भारत में देशी गायों की संख्या में आई भारी गिरावट के कारण उनका संरक्षण अब समय की अनिवार्य आवश्यकता बन गया है।
एक समय भारत में गायों की सौ से अधिक नस्लें थीं, किंतु आज केवल लगभग 40 ही शेष रह गई हैं और उनमें से अधिकांश विलुप्ति के कगार पर हैं। अत्यधिक क्रॉस-ब्रीडिंग के कारण शुद्ध नस्ल की गायें मिलना कठिन हो गया है।
इसी उद्देश्य से बेंगलुरु स्थित आर्ट ऑफ लिविंग इंटरनेशनल सेंटर में श्री श्री गौशाला की स्थापना की गई। गोशाला भारतीय समाज का अभिन्न अंग रही है, विशेषकर कृषि और दुग्ध-उत्पादक समुदाय के लिए।
● प्रभाव
19 देशी नस्लें
भारत भर की गोशालाओं में 2,000+ गायें
बेंगलुरु आश्रम में 1,600+ गायें
गोशाला प्रणाली को पुनर्जीवित करने और देशी नस्लों के संरक्षण के उद्देश्य से प्रारंभ हुई श्री श्री गौशाला में आज भारत के विभिन्न भागों की 15 से अधिक देशी नस्लों की सैकड़ों गायें हैं।
यह गोशाला पर्यावरण की दृष्टि से टिकाऊ है और किसानों के लिए लाभकारी मॉडल प्रस्तुत करती है। गोशाला से प्राप्त प्रत्येक उत्पाद—दूध, गोबर, गोमूत्र, खाद, बायोगैस—सभी मूल्यवान हैं और आय का स्रोत बन सकते हैं।
देशी गायों को कम चारे की आवश्यकता होती है, जो खेत से उप-उत्पाद के रूप में आसानी से उपलब्ध हो जाता है।
श्री श्री गौशाला प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने का एक आदर्श मॉडल भी प्रस्तुत करती है।
● गोशाला : एक अमूल्य आश्रय
हाल तक भारत के हर गाँव में गोशाला होती थी। आज भी जो किसान सक्षम हैं, वे कम से कम एक गाय अवश्य रखते हैं। कुछ लोग किसानों में बढ़ती आत्महत्या की प्रवृत्ति को गायों के लुप्त होने से भी जोड़कर देखते हैं।
भारतीय गाय: एक अनमोल धरोहर
भारत में बैलों का उपयोग खेत जोतने और परिवहन के लिए किया जाता है। कृषि, धार्मिक और आर्थिक—असंख्य गतिविधियाँ गाय के इर्द-गिर्द घूमती हैं।
आयुर्वेद के अनुसार, गाय का दूध सात्त्विक और अत्यंत पौष्टिक होता है। गोशाला का दूध सबसे स्वास्थ्यवर्धक माना जाता है। बाज़ार का डेयरी दूध प्रायः विभिन्न नस्लों और भैंस के दूध का मिश्रण होता है, जो अधिक वसायुक्त और तामसिक माना जाता है।
हिंदू पूजा-पद्धति में पंचगव्य—दूध, दही, घी, गोमूत्र और गोबर—का विशेष महत्व है। यज्ञ और हवन में देशी गाय का घी और गोबर ही अनिवार्य माना गया है।
गोबर जैविक खेती के लिए सर्वोत्तम खाद है, जिसमें प्राकृतिक कीटनाशक गुण होते हैं। सूखे उपले ईंधन के रूप में प्रयुक्त होते हैं। गोबर से लिपे घर ठंड में ऊष्मा बनाए रखते हैं, विकिरण से रक्षा करते हैं और कीटों को दूर रखते हैं। बायोगैस से गाँवों में ऊर्जा की स्थायी व्यवस्था संभव है।
आसुत गोमूत्र को आयुर्वेद में अनेक रोगों के उपचार में उपयोगी बताया गया है।
● देशी बनाम संकर नस्ल
1970 के दशक में विदेशी नस्लों का व्यापक प्रचलन हुआ, केवल अधिक दूध उत्पादन के कारण। परंतु उनके स्वास्थ्य, अनुकूलन और दूध की गुणवत्ता पर ध्यान नहीं दिया गया। ये गायें रोगों के प्रति अधिक संवेदनशील होती हैं, अधिक चारा खाती हैं और कम समय तक दूध देती हैं।
इसके विपरीत, उचित चयन और संवर्धन से देशी गायें भी उच्च दुग्ध उत्पादन कर सकती हैं—जिसका उदाहरण ब्राज़ील और अर्जेंटीना जैसे देशों में देखा गया है।
● समय की आवश्यकता
गुरुदेव श्री श्री रविशंकर के अनुसार, आदर्श अनुपात 100 लोगों पर 20 गायें होना चाहिए। यदि गायें संरक्षित नहीं की गईं, तो यह अनुपात और घटेगा, जिससे जैविक संतुलन और कृषि दोनों प्रभावित होंगे।
प्राचीन भारतीय ग्रंथों में कहा गया है:
“यदि गाय प्रसन्न रहती है, तो धरती समृद्ध होती है और लोग सुखी रहते हैं।”
आर्ट ऑफ लिविंग इस प्राचीन सत्य को व्यवहार में उतारने का कार्य कर रहा है।
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