**क्या आप भी बाहर ही ढूँढ रहे हैं?** 🦌✨
अक्सर हम खुशी, शांति और उस परम 'खजाने' की तलाश में पूरी दुनिया छान मारते हैं। हम सोचते हैं कि शायद किसी नई जगह, किसी इंसान या किसी उपलब्धि में हमें वो सुकून मिलेगा जिसकी हमें तलाश है।
लेकिन सच तो यह है कि हमारी स्थिति बिल्कुल उस **कस्तूरी मृग** जैसी है...
कस्तूरी मृग की अपनी नाभि में ही वह दिव्य सुगंध होती है, लेकिन वह उससे अनजान होकर उसे बाहर की झाड़ियों और जंगलों में पागलों की तरह ढूँढता रहता है। वह थक जाता है, परेशान होता है, पर सुगंध तो उसके अपने भीतर ही बसी होती है।
यही हाल हमारा है। **नाम (शब्द) का अनमोल खजाना** हमारे अपने 'घट' यानी इस शरीर के भीतर ही है। जब तक हम बाहर की 'झाड़ियों' (सांसारिक मोह-माया) में इसे ढूँढेंगे, हमें केवल थकान मिलेगी।
जिस दिन हम गुरु की शिक्षा पर चलकर अपने अंतर्मन में झांकना शुरू करेंगे, उसी दिन हमें उस असली आनंद और शांति का अनुभव होगा जो हमेशा से हमारे पास था।
**आज ही रुकिए और खुद से पूछिए—आपकी खोज कहाँ चल रही है? बाहर या भीतर?** 🧘♂️ #🙏 प्रेरणादायक विचार #👉 लोगों के लिए सीख👈