Ajit Kumar Sinha
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#📚एजुकेशनल ज्ञान📝 #😇 जीवन की प्रेरणादायी सीख #📚एजुकेशन टिप्स & ट्रिक्स✍ #👉 लोगों के लिए सीख👈
📚एजुकेशनल ज्ञान📝 - बनाना हो, तो उनके जन्म से पूर्व ऐसी तैयारी करनी चाहिए कि उन्हें सुसंस्कृत वातावरण मिले, जिसमें पलकर वे सभ्य एवं सद्गुणी बन सकें । यह एक तथ्य है कि बच्चा गर्भ में आने के दिन से ही सीखना शुरू करता है और पाँच वर्ष का होने तक अपनी मनोभूमि का निर्माण तीन-चौथाई पूरा कर लेता है प्रसिद्ध बाल मनोवैज्ञानिक डॉ॰ एरिक्सन के अनुसार भी बालक के मूल ढाँचे का अधिकांश भाग शुरू के पाँच वर्षों में तैयार हो जाता है। शेष जीवन में प्रधानतया उसका विकास होता है । इस अवधि में बच्चा बहुत संवेदनशील होता है। बड़े होने पढ़ाई, कला- कौशल आदि की शिक्षा स्कूली पर इन कार्यों के उपयुक्त मस्तिष्कीय पाई जाती है विकास बड़ी उम्र मेंँ होता है, किंतु स्वभाव संस्कार एवं चरित्र जिस आयु में सीखा जाता है, वह अवधि गर्भ मेँ प्रवेश करने से लेकर पाँच इस अवधि में अचेतन मस्तिष्क वर्ष तक की है बहुत संवेदनशील रहता है । निकटवर्ती वातावरण  में जो कुछ सोचा या किया जाता है, उसका बहुत ही स्पष्ट चित्र अपनी अंतःभूमिका में उतारता जाता है। यों यह प्रक्रिया जीवनभर fg इसका बहुत बडा अंश शैशवकाल चलती है, अतएव अभिभावकों में ही पूरा हो जाता है को अपने बच्चों को सुसंस्कारी, बनाने सद्गुणी के लिए वातावरण बनाने का पूरा ध्यान देना चाहिए, जिससे उन्हें सुसंस्कृत बनने का उपयुक्त आधार मिल सके। बनाना हो, तो उनके जन्म से पूर्व ऐसी तैयारी करनी चाहिए कि उन्हें सुसंस्कृत वातावरण मिले, जिसमें पलकर वे सभ्य एवं सद्गुणी बन सकें । यह एक तथ्य है कि बच्चा गर्भ में आने के दिन से ही सीखना शुरू करता है और पाँच वर्ष का होने तक अपनी मनोभूमि का निर्माण तीन-चौथाई पूरा कर लेता है प्रसिद्ध बाल मनोवैज्ञानिक डॉ॰ एरिक्सन के अनुसार भी बालक के मूल ढाँचे का अधिकांश भाग शुरू के पाँच वर्षों में तैयार हो जाता है। शेष जीवन में प्रधानतया उसका विकास होता है । इस अवधि में बच्चा बहुत संवेदनशील होता है। बड़े होने पढ़ाई, कला- कौशल आदि की शिक्षा स्कूली पर इन कार्यों के उपयुक्त मस्तिष्कीय पाई जाती है विकास बड़ी उम्र मेंँ होता है, किंतु स्वभाव संस्कार एवं चरित्र जिस आयु में सीखा जाता है, वह अवधि गर्भ मेँ प्रवेश करने से लेकर पाँच इस अवधि में अचेतन मस्तिष्क वर्ष तक की है बहुत संवेदनशील रहता है । निकटवर्ती वातावरण  में जो कुछ सोचा या किया जाता है, उसका बहुत ही स्पष्ट चित्र अपनी अंतःभूमिका में उतारता जाता है। यों यह प्रक्रिया जीवनभर fg इसका बहुत बडा अंश शैशवकाल चलती है, अतएव अभिभावकों में ही पूरा हो जाता है को अपने बच्चों को सुसंस्कारी, बनाने सद्गुणी के लिए वातावरण बनाने का पूरा ध्यान देना चाहिए, जिससे उन्हें सुसंस्कृत बनने का उपयुक्त आधार मिल सके। - ShareChat
#📚एजुकेशन टिप्स & ट्रिक्स✍ #📚एजुकेशनल ज्ञान📝 #😇 जीवन की प्रेरणादायी सीख #👉 लोगों के लिए सीख👈
📚एजुकेशन टिप्स & ट्रिक्स✍ - बच्चे अपने साथ अभिभावकों के লিব अनेक कर्त्तव्य एवं उत्तरदायित्व भी लेकर आते लिए हैं, जिन्हें पालन करना अभिभावकों के आवश्यक होता है। बच्चे की शरीर-रक्षा के लिए भोजन, वस्त्र, चिकित्सा आदि की समुचित 77 */ व्यवस्था पूरी करने के साधन जुटाने इतना ध्यान आमतौर से अभिभावकों को रखना होता है और वे अपने ढंग से उसकी पूर्ति भी करते हैं। किंतु बात यहीं समाप्त नहीं होती, भी आगे की जिम्मेदारी अभिभावकों की इससे है। जिसके न समझने एवं न निभाने से बच्चे अनेक दोष- दुर्गुणों से घिर जाते हैं और परिवार एवं समाज के लिए दुःखदायी सिद्ध होते हैं,  सुसंस्कारी बनाना से बचाना और दुर्गुणों ওনবন अभिभावकों का कर्त्तव्य है पूर्वसंचित संस्कार लेकर बच्चा अपने साथ उसका विकसित होना या आता   है , पर होना बहुत कुछ परिस्थितियों पर कुसंस्कारी समुचित शिक्षण  मार्गदर्शन = #% க 8 एवं वातावरण का प्रभाव निश्चित ही बच्चों को सुसंस्कारी बनाने में सहायक है | कुछ बिरले ही बच्चे ऐसे अपवादस्वरूप होते हैं, जो पारिवारिक परिस्थितियों से भिन्न प्रकार का व्यक्तित्व निर्माण कर सके हों | व्यवसाय, गरीबी और बीमारी में उतार - चढ़ाव तो आते रहते हैं, पर स्वभाव और संस्कार प्रायः आजीवन वैसे ही बने रहते हैं जैसे बचपन में उपलब्ध हुए थे। इसलिए यदि सुसंस्कारी बनाना हो, सद्गुणसंपन्न बच्चों को बच्चे अपने साथ अभिभावकों के লিব अनेक कर्त्तव्य एवं उत्तरदायित्व भी लेकर आते लिए हैं, जिन्हें पालन करना अभिभावकों के आवश्यक होता है। बच्चे की शरीर-रक्षा के लिए भोजन, वस्त्र, चिकित्सा आदि की समुचित 77 */ व्यवस्था पूरी करने के साधन जुटाने इतना ध्यान आमतौर से अभिभावकों को रखना होता है और वे अपने ढंग से उसकी पूर्ति भी करते हैं। किंतु बात यहीं समाप्त नहीं होती, भी आगे की जिम्मेदारी अभिभावकों की इससे है। जिसके न समझने एवं न निभाने से बच्चे अनेक दोष- दुर्गुणों से घिर जाते हैं और परिवार एवं समाज के लिए दुःखदायी सिद्ध होते हैं,  सुसंस्कारी बनाना से बचाना और दुर्गुणों ওনবন अभिभावकों का कर्त्तव्य है पूर्वसंचित संस्कार लेकर बच्चा अपने साथ उसका विकसित होना या आता   है , पर होना बहुत कुछ परिस्थितियों पर कुसंस्कारी समुचित शिक्षण  मार्गदर्शन = #% க 8 एवं वातावरण का प्रभाव निश्चित ही बच्चों को सुसंस्कारी बनाने में सहायक है | कुछ बिरले ही बच्चे ऐसे अपवादस्वरूप होते हैं, जो पारिवारिक परिस्थितियों से भिन्न प्रकार का व्यक्तित्व निर्माण कर सके हों | व्यवसाय, गरीबी और बीमारी में उतार - चढ़ाव तो आते रहते हैं, पर स्वभाव और संस्कार प्रायः आजीवन वैसे ही बने रहते हैं जैसे बचपन में उपलब्ध हुए थे। इसलिए यदि सुसंस्कारी बनाना हो, सद्गुणसंपन्न बच्चों को - ShareChat
#😇 जीवन की प्रेरणादायी सीख #👉 लोगों के लिए सीख👈 #📚एजुकेशन टिप्स & ट्रिक्स✍ #📚एजुकेशनल ज्ञान📝
😇 जीवन की प्रेरणादायी सीख - HOOK . ব্ PARENT ক্রী্য্ী पढ़ना चाहिए. 66 आप कभी ्कभी अपने एक तच्चे की शरारतों से परेशान रो जाते ढ॰ जरा सोचिए, एक शिक्षक रोज दर्जनों बच्चों को केसे संभालता ठे। 99 ये बातें ६र अभिभावक को समझनी चाहिए शिक्षक सिर्फ पढ़ाता नही  हरयच्चा अलग ६ 0 हर दिन एक नई जीवन गटता हे। '61 ঘুনালী  எசகப்ய கபி I [icvl 93 Tlla, Jllcd Jl7' भलय '44+ಚIwl 47 48l m1 5-0 ೪೬' आीथ रस्कार, भनुपासन ओीर आीवन  எர87  एफ साय सगालना आसान नहा दीञिए शक नही  577461,4161 71 होता ह। सुणर सम्मान Iae भीरसान। उसकी भावनाए फरवार  பபIவ பாச 111 'I 51 4#51 ओर सीमाए होती ६। हर यात पर शक #T 11 -1 : ll * lat m T1 मारना न४ . मामद्शन करना ठ O{IIIIIIA m07 9া২-417 মসখানা ] समाज परिणाम ्चाहता ह (6 पर मेहनत नही देखता। एक कला हे। 341 সা4143 41 -61{ #৮সান e] ঐণ   141r' Jlual MIಖv Ym1ಬMul . ऐ२ सवाल का गवाद देने की आढत  गानासिऊ तनाय ओर अतिगित गेहनत Tul Mlat IrITEl b Shl ವls AH ಚan शिकायत से पहले सहयोग कीजिए हर सीख फे पीछे एक शिक्षळ होता ह।  0 दष्टे की समस्या को षिएकते साय मराकर आापने गीदन मे जोभी सीया ७२ स्कल कोतिज  पोछे िसी ना J4uq Hr himlun mYal उसक MilmAmA  MLII எிஈகாப ಣ7l nuaoulrla2i रखिए याद होक्टर भरीर उजीनियर तेकिन शिदक सम्गान दीजिए ಗಣ ठीक करता ऐ Hruh Hfir VXI4rinl 0 পমান এনানা [1 जिस दिन समाज शिक्षक की रफ़त करना सीखजाएगा उस दिन ओर देश दोनों बदल जाएगे। यच्चे HOOK . ব্ PARENT ক্রী্য্ী पढ़ना चाहिए. 66 आप कभी ्कभी अपने एक तच्चे की शरारतों से परेशान रो जाते ढ॰ जरा सोचिए, एक शिक्षक रोज दर्जनों बच्चों को केसे संभालता ठे। 99 ये बातें ६र अभिभावक को समझनी चाहिए शिक्षक सिर्फ पढ़ाता नही  हरयच्चा अलग ६ 0 हर दिन एक नई जीवन गटता हे। '61 ঘুনালী  எசகப்ய கபி I [icvl 93 Tlla, Jllcd Jl7' भलय '44+ಚIwl 47 48l m1 5-0 ೪೬' आीथ रस्कार, भनुपासन ओीर आीवन  எர87  एफ साय सगालना आसान नहा दीञिए शक नही  577461,4161 71 होता ह। सुणर सम्मान Iae भीरसान। उसकी भावनाए फरवार  பபIவ பாச 111 'I 51 4#51 ओर सीमाए होती ६। हर यात पर शक #T 11 -1 : ll * lat m T1 मारना न४ . मामद्शन करना ठ O{IIIIIIA m07 9া২-417 মসখানা ] समाज परिणाम ्चाहता ह (6 पर मेहनत नही देखता। एक कला हे। 341 সা4143 41 -61{ #৮সান e] ঐণ   141r' Jlual MIಖv Ym1ಬMul . ऐ२ सवाल का गवाद देने की आढत  गानासिऊ तनाय ओर अतिगित गेहनत Tul Mlat IrITEl b Shl ವls AH ಚan शिकायत से पहले सहयोग कीजिए हर सीख फे पीछे एक शिक्षळ होता ह।  0 दष्टे की समस्या को षिएकते साय मराकर आापने गीदन मे जोभी सीया ७२ स्कल कोतिज  पोछे िसी ना J4uq Hr himlun mYal उसक MilmAmA  MLII எிஈகாப ಣ7l nuaoulrla2i रखिए याद होक्टर भरीर उजीनियर तेकिन शिदक सम्गान दीजिए ಗಣ ठीक करता ऐ Hruh Hfir VXI4rinl 0 পমান এনানা [1 जिस दिन समाज शिक्षक की रफ़त करना सीखजाएगा उस दिन ओर देश दोनों बदल जाएगे। यच्चे - ShareChat
#🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #🕉️सनातन धर्म🚩 #😇 जीवन की प्रेरणादायी सीख #👉 लोगों के लिए सीख👈
🙏🏻आध्यात्मिकता😇 - कर योग, तप, ध्यान और ब्रह्मविद्या के मार्ग पर साधना कोई चमत्कार नहीं है, आगे बढ सकता है रोजमर्रा यह तो जीवन की एक सतत प्रक्रिया हे के काम-काज में भी जब साधक ईमानदारी, श्रद्धा और कर्त्तव्यनिष्ठा से जीवन जीता है, तभी सेसा आगे बढ़ने का अधिकार मिलता है। पूजा - पाठ, व्रत- उपवास, मंत्र-जप और ध्यान उनका प्रभाव तभी होता है बाहरी रूप हैं ౌర जो व्यक्ति अपने स्वभाव जीवन भोतर से बदले को नियंत्रित करता है, अपनी इच्छाओं को सीमित करता है और अपने कर्त्तव्यों को प्राथमिकता देता है, वही साधना के पथ पर आगे बढ़ता है जो व्यक्ति केवल बाहरी अनुष्ठानों में उलझा रहता है और अपने जीवन को नहीं सुधारता, वह साधना के लक्ष्य से भटक जाता है। इसलिए सबसे पहले जीवन को संयमित, पवित्र और उद्देश्यपूर्ण  बनाएँ दिनचर्या नियमित रखें, आहार सादा रखें और अपने कर्त्तव्यों का ईमानदारी से पालन करें यही सच्ची साधना की शुरुआत है कर योग, तप, ध्यान और ब्रह्मविद्या के मार्ग पर साधना कोई चमत्कार नहीं है, आगे बढ सकता है रोजमर्रा यह तो जीवन की एक सतत प्रक्रिया हे के काम-काज में भी जब साधक ईमानदारी, श्रद्धा और कर्त्तव्यनिष्ठा से जीवन जीता है, तभी सेसा आगे बढ़ने का अधिकार मिलता है। पूजा - पाठ, व्रत- उपवास, मंत्र-जप और ध्यान उनका प्रभाव तभी होता है बाहरी रूप हैं ౌర जो व्यक्ति अपने स्वभाव जीवन भोतर से बदले को नियंत्रित करता है, अपनी इच्छाओं को सीमित करता है और अपने कर्त्तव्यों को प्राथमिकता देता है, वही साधना के पथ पर आगे बढ़ता है जो व्यक्ति केवल बाहरी अनुष्ठानों में उलझा रहता है और अपने जीवन को नहीं सुधारता, वह साधना के लक्ष्य से भटक जाता है। इसलिए सबसे पहले जीवन को संयमित, पवित्र और उद्देश्यपूर्ण  बनाएँ दिनचर्या नियमित रखें, आहार सादा रखें और अपने कर्त्तव्यों का ईमानदारी से पालन करें यही सच्ची साधना की शुरुआत है - ShareChat
#🙏 प्रेरणादायक विचार #😇 जीवन की प्रेरणादायी सीख #👉 लोगों के लिए सीख👈 #❤️जीवन की सीख
🙏 प्रेरणादायक विचार - कहना यह होगा कि॰ये शरीर, मन और धन सभी भौतिक और आंतरिक विकास के लिए उपयोगी साधन हैं साधन वही होता है, जिससे लक्ष्य की प्राप्ति हो सके जब तक इनका उपयोग केवल व्यक्तिगत सुख सुविधा तक सीमित रहता लिए है, तब तक ये किसी बड़े उद्देश्य के उपयोगी नहीं हा सकते आत्मिक विकास के लिए संयम, नियंत्रण सेवा, अनुशासन परिश्रम जैसे सद्गुणों की आवश्यकता होती है कोई भी साधक जब तक जीवन को दिशा सही नहीं करता, साधना आरंभ नहीं कर सकता सबसे पहले जीवन को सरलः पवित्र और संयमित साधना का कोई बनाना जरूरी है নিনা इसके आध्यात्मिक जीवन का परिणाम नहीं निकलता है- सद्विचारों को आचरण भेँ लाना স্থস নতো सदुपयोग मन को नियंत्रित करना और समय का करना ही साधना का पहला कदम है जो व्यक्ति जीवन में विवेक, संयम त्याग और सेवा के सिद्धांतों पर चलता है, वही आगे चल कहना यह होगा कि॰ये शरीर, मन और धन सभी भौतिक और आंतरिक विकास के लिए उपयोगी साधन हैं साधन वही होता है, जिससे लक्ष्य की प्राप्ति हो सके जब तक इनका उपयोग केवल व्यक्तिगत सुख सुविधा तक सीमित रहता लिए है, तब तक ये किसी बड़े उद्देश्य के उपयोगी नहीं हा सकते आत्मिक विकास के लिए संयम, नियंत्रण सेवा, अनुशासन परिश्रम जैसे सद्गुणों की आवश्यकता होती है कोई भी साधक जब तक जीवन को दिशा सही नहीं करता, साधना आरंभ नहीं कर सकता सबसे पहले जीवन को सरलः पवित्र और संयमित साधना का कोई बनाना जरूरी है নিনা इसके आध्यात्मिक जीवन का परिणाम नहीं निकलता है- सद्विचारों को आचरण भेँ लाना স্থস নতো सदुपयोग मन को नियंत्रित करना और समय का करना ही साधना का पहला कदम है जो व्यक्ति जीवन में विवेक, संयम त्याग और सेवा के सिद्धांतों पर चलता है, वही आगे चल - ShareChat
#🙏 प्रेरणादायक विचार #😇 जीवन की प्रेरणादायी सीख #👉 लोगों के लिए सीख👈 #❤️जीवन की सीख
🙏 प्रेरणादायक विचार - ऋषि गर्ग शास्त्रों पर टीका लिख रहे थे भक्ति का उल्लेख आने पर उन्होंने उस् पर टिप्पणी की  मनुष्य को कृतकृत्य करने वाली एक दिव्य अनुभूति अनुदान ईश्वरप्रदत्त है है- ईश्वरभक्ति " उसका नाम लेते हैं, अपनी आत्मीयता को विस्तृत करते हैं- जो भक्ति का आश्रय aHHF` विश्व के कल्याण का कारण बन जाते हैं भक्ति ही मुक्ति का आधार है और ईश्वर से साक्षात्कार का माध्यम भी। नारी सशक्तीकरण' वर्ष সগনে  2026 ~TTTITE గాIIగా ऋषि गर्ग शास्त्रों पर टीका लिख रहे थे भक्ति का उल्लेख आने पर उन्होंने उस् पर टिप्पणी की  मनुष्य को कृतकृत्य करने वाली एक दिव्य अनुभूति अनुदान ईश्वरप्रदत्त है है- ईश्वरभक्ति " उसका नाम लेते हैं, अपनी आत्मीयता को विस्तृत करते हैं- जो भक्ति का आश्रय aHHF` विश्व के कल्याण का कारण बन जाते हैं भक्ति ही मुक्ति का आधार है और ईश्वर से साक्षात्कार का माध्यम भी। नारी सशक्तीकरण' वर्ष সগনে  2026 ~TTTITE గాIIగా - ShareChat
#🙏 प्रेरणादायक विचार #😇 जीवन की प्रेरणादायी सीख #❤️जीवन की सीख #👉 लोगों के लिए सीख👈
🙏 प्रेरणादायक विचार - अतः हर दिन व हर पल का श्रेष्ठतम उपयोग  ೯ भी तैयारी करते रहें, जो इस इसकी करते हुए नश्वर जीवन में सार्थकता एवं नवीनता का एक नया अनुभव संचार करने वाला प्रयोग सिद्ध होगा। जीवन के अनावश्यक भार को हलका करने के लिए अस्तित्व के यथार्थ को उद्घाटित करने वाले साहित्य का स्वाध्याय करें। युगऋषि परमपूज्य गुरुदेव जीवन के हर पक्ष को प्रकाशित करने वाला क इस संदर्भ में संजीवनी से कम नहीं है। युगसाहित्य সাথ ওনক इसका नित्य स्वाध्याय करें और इसक वीडियो सत्संग का लाभ लिया जा सकता है ऑडियो त इसके साथ सकारात्मक लोगों का संग-साथ F करें, जो आपको प्रेरित करते होँ व आगे बढ़ने के लोगों व चीजों से दूर लिए प्रोत्साहित करते हों । उन  रहें, जो आपको नीचा दिखाने की चेष्टा करते हों आपकी चेतना को दूषित करते हों। इस तरह যা अपने जीवन के महत्त्व को समझें यदन्तरं तद्वाह्यं यद्वाह्यं तदन्तरम् | अर्थात जो अंदर हो, वही बाहर प्रकट करो जो बाहर कहते हो , वही भीतर रखो यह अनावश्यक चिंता व तनाव मेंँ बरबाद छोटे- छोटे क्षणों का लिए 7 करने के नहीं है इसके आनंद लेते हुए, अपने प्रियजनों के साथ बेहतर पलों को जीते हुए, छोटी- छोटी सफलताओं का निहित संभावनाओं को उत्सव मनाते हुए, इसमें साकार करते हुए आगे बढ़ें [   इसी तरह छोटी- बड़ी विफलताओं एवं फिसलनों से आवश्यक सबक लेते हुए इन्हें छोड़ दें और साथ ही ईश्वर का धन्यवाद ज्ञापित करें कि उन्होंने बीज रूप में वे सारी संभावनाएँ भरकर हमें धरती पर भेजा है और उसकी ईश्वरीय योजना का हिस्सा बनने का सौभाग्य प्रदान किया है अतः हर दिन व हर पल का श्रेष्ठतम उपयोग  ೯ भी तैयारी करते रहें, जो इस इसकी करते हुए नश्वर जीवन में सार्थकता एवं नवीनता का एक नया अनुभव संचार करने वाला प्रयोग सिद्ध होगा। जीवन के अनावश्यक भार को हलका करने के लिए अस्तित्व के यथार्थ को उद्घाटित करने वाले साहित्य का स्वाध्याय करें। युगऋषि परमपूज्य गुरुदेव जीवन के हर पक्ष को प्रकाशित करने वाला क इस संदर्भ में संजीवनी से कम नहीं है। युगसाहित्य সাথ ওনক इसका नित्य स्वाध्याय करें और इसक वीडियो सत्संग का लाभ लिया जा सकता है ऑडियो त इसके साथ सकारात्मक लोगों का संग-साथ F करें, जो आपको प्रेरित करते होँ व आगे बढ़ने के लोगों व चीजों से दूर लिए प्रोत्साहित करते हों । उन  रहें, जो आपको नीचा दिखाने की चेष्टा करते हों आपकी चेतना को दूषित करते हों। इस तरह যা अपने जीवन के महत्त्व को समझें यदन्तरं तद्वाह्यं यद्वाह्यं तदन्तरम् | अर्थात जो अंदर हो, वही बाहर प्रकट करो जो बाहर कहते हो , वही भीतर रखो यह अनावश्यक चिंता व तनाव मेंँ बरबाद छोटे- छोटे क्षणों का लिए 7 करने के नहीं है इसके आनंद लेते हुए, अपने प्रियजनों के साथ बेहतर पलों को जीते हुए, छोटी- छोटी सफलताओं का निहित संभावनाओं को उत्सव मनाते हुए, इसमें साकार करते हुए आगे बढ़ें [   इसी तरह छोटी- बड़ी विफलताओं एवं फिसलनों से आवश्यक सबक लेते हुए इन्हें छोड़ दें और साथ ही ईश्वर का धन्यवाद ज्ञापित करें कि उन्होंने बीज रूप में वे सारी संभावनाएँ भरकर हमें धरती पर भेजा है और उसकी ईश्वरीय योजना का हिस्सा बनने का सौभाग्य प्रदान किया है - ShareChat
#😇 जीवन की प्रेरणादायी सीख #👉 लोगों के लिए सीख👈 #❤️जीवन की सीख #🙏 प्रेरणादायक विचार
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#🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #🕉️सनातन धर्म🚩 #💫ध्यान के मंत्र🧘‍♂️ #😇 जीवन की प्रेरणादायी सीख #✍️ जीवन में बदलाव
🙏🏻आध्यात्मिकता😇 - गायत्री माहात्म्य T7IT ధ10 ামান সাuাান সলামন মা যামন্না | ঐন-্না- चिवेक ) को रक्षा करे 1 সাণা  गायन्नी  तह शतपथ न्राह्मण ८५ ३७ ब्रह्म गायत्रीति- ब्रह्म वै गायत्री | ब्रह्म गायत्री है॰ गायत्री हो ब्रह्म है। छांदोग्योपनिषद् ३/१२/१ गायत्री वा इदं सर्वभूतं यदिदं किं च। गायत्रीमय ही है। इस विश्व में जो कुछ भी है, वह Hq करें या न करें मात्र गायत्री से बढ़कर पवित्र करने वाला और कोई मंत्र नहों है। अन्य कोई साधना  भगवान मनु- गायत्रो मंत्र-्जप से सिद्धि पा सकते हैं तराजू में एक पलड़े पर षडंगों सहित वेद और दूसरो ओर गायत्री, तो गायत्री का पलड़ा  योगिराज याज्ञवल्क्य भारी रहा। पराशर जी = समस्त जप सूक्तों तथा वेद मंत्रों में गायत्री मंत्र परम श्रेष्ठ है। इसका भक्तिपूर्वक जप करने वाला मुक्त होकर पवित्र बन जाता है परिमार्जन कठिन दोष और दुर्गुणों अत्रि मुनि  गा़यत्री आत्मा का परिशोधन करती है। उसके সনাস जाता है चेदों का सार गायत्रो है। पुष्प का सार मधु. दूध का सार घृत है उसी प्रकार समस्त " महर्षिं व्यास -जिस प्रकार ऋषि = गा़यत्री ब्रह्म साक्षात्कार कराने वाली है " भरद्वाज विश्वामित्र - गायत्री के समान चारों वेदेों में कोई मंत्र नहीं है। गरेठमंत्न हुका मै्न #ैर इस्हलेए उसे मंत्रों का मुकुटमणि कहा गया है याज्ञवल्क्य ~ गा़यत्री से सद्बुद्धि का मंत्र है। इसलिए " स्वामी विवेकानंद गायत्रो गायत्री माहात्म्य T7IT ధ10 ামান সাuাান সলামন মা যামন্না | ঐন-্না- चिवेक ) को रक्षा करे 1 সাণা  गायन्नी  तह शतपथ न्राह्मण ८५ ३७ ब्रह्म गायत्रीति- ब्रह्म वै गायत्री | ब्रह्म गायत्री है॰ गायत्री हो ब्रह्म है। छांदोग्योपनिषद् ३/१२/१ गायत्री वा इदं सर्वभूतं यदिदं किं च। गायत्रीमय ही है। इस विश्व में जो कुछ भी है, वह Hq करें या न करें मात्र गायत्री से बढ़कर पवित्र करने वाला और कोई मंत्र नहों है। अन्य कोई साधना  भगवान मनु- गायत्रो मंत्र-्जप से सिद्धि पा सकते हैं तराजू में एक पलड़े पर षडंगों सहित वेद और दूसरो ओर गायत्री, तो गायत्री का पलड़ा  योगिराज याज्ञवल्क्य भारी रहा। पराशर जी = समस्त जप सूक्तों तथा वेद मंत्रों में गायत्री मंत्र परम श्रेष्ठ है। इसका भक्तिपूर्वक जप करने वाला मुक्त होकर पवित्र बन जाता है परिमार्जन कठिन दोष और दुर्गुणों अत्रि मुनि  गा़यत्री आत्मा का परिशोधन करती है। उसके সনাস जाता है चेदों का सार गायत्रो है। पुष्प का सार मधु. दूध का सार घृत है उसी प्रकार समस्त " महर्षिं व्यास -जिस प्रकार ऋषि = गा़यत्री ब्रह्म साक्षात्कार कराने वाली है " भरद्वाज विश्वामित्र - गायत्री के समान चारों वेदेों में कोई मंत्र नहीं है। गरेठमंत्न हुका मै्न #ैर इस्हलेए उसे मंत्रों का मुकुटमणि कहा गया है याज्ञवल्क्य ~ गा़यत्री से सद्बुद्धि का मंत्र है। इसलिए " स्वामी विवेकानंद गायत्रो - ShareChat
#🕉️सनातन धर्म🚩 #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #💫ध्यान के मंत्र🧘‍♂️ #🙏गीता ज्ञान🛕
🕉️सनातन धर्म🚩 - নিমস যামন্সী সপ্প লম্রল मंत्र लेखन करते समय गायत्री मंत्र के अर्थ का चिंतन करना चाहिए।  যামন্নী २. मंत्र लेखन में शीघ्रता नहीं करनी चाहिए। ३० स्पष्ट व शुद्ध मंत्र लेखन करना चाहिए। ही उपयुक्त स्थान पर ही रखना चाहिए। स्वच्छ रखना चाहिए साथ मंत्र लेखन पुस्तिका को व्यक्ति भी कर सकते हैं किसी भी समय, किसी भी स्थिति में व्यस्त एवं अस्वस्थ সপ্প লম্ন कम नहीं माना जाता | मंत्र-जप से इसका महत्त्व अधिक ही है। मंत्र॰ी होता है। मन को इधर उधर भागने की गायत्री मंत्र लेखन का महत्त्व काफी ಸಷT' से उच्चारण जप करते समय उँगलियों से जप और एकाग्र हो चित्तवृत्तियाँ  गुंजा यश रहती है। परतु गायत्री मंत्र लेखन के सामया ह्रैथ मञाँकों कशस्में करक एकाग्र भ्ावृ की साधना मंत्र  एवं सभी मस्तिष्क जुाती हैं, क्योँकि लिखँने का कार्य एकाग्रता चाहता है। मन॰ को माना गया है। लेखनह में भली भाँति बन पडती है। इसी से इसका महत्त्व भी बहुत  নিমস যামন্সী সপ্প লম্রল मंत्र लेखन करते समय गायत्री मंत्र के अर्थ का चिंतन करना चाहिए।  যামন্নী २. मंत्र लेखन में शीघ्रता नहीं करनी चाहिए। ३० स्पष्ट व शुद्ध मंत्र लेखन करना चाहिए। ही उपयुक्त स्थान पर ही रखना चाहिए। स्वच्छ रखना चाहिए साथ मंत्र लेखन पुस्तिका को व्यक्ति भी कर सकते हैं किसी भी समय, किसी भी स्थिति में व्यस्त एवं अस्वस्थ সপ্প লম্ন कम नहीं माना जाता | मंत्र-जप से इसका महत्त्व अधिक ही है। मंत्र॰ी होता है। मन को इधर उधर भागने की गायत्री मंत्र लेखन का महत्त्व काफी ಸಷT' से उच्चारण जप करते समय उँगलियों से जप और एकाग्र हो चित्तवृत्तियाँ  गुंजा यश रहती है। परतु गायत्री मंत्र लेखन के सामया ह्रैथ मञाँकों कशस्में करक एकाग्र भ्ावृ की साधना मंत्र  एवं सभी मस्तिष्क जुाती हैं, क्योँकि लिखँने का कार्य एकाग्रता चाहता है। मन॰ को माना गया है। लेखनह में भली भाँति बन पडती है। इसी से इसका महत्त्व भी बहुत - ShareChat