जब समुद्र मंथन के बाद भगवान विष्णु ने मोहिनी रूप धारण करके असुरों को छला और देवताओं को अमृत पिलाया, तो उस समय भगवान शिव वहां उपस्थित नहीं थे। जब शिव जी ने कैलाश पर सुना कि नारायण ने एक ऐसा रूप धारण किया था जिसके सौंदर्य के सामने पूरा ब्रह्मांड फीका पड़ गया, तो उनके मन में उस रूप को देखने की तीव्र इच्छा जाग्रत हुई।
भगवान शिव माता पार्वती और अपने गणों को साथ लेकर भगवान विष्णु से मिलने वैकुंठ (या क्षीरसागर) पहुंचे। शिव जी को आया देख नारायण ने उनका ससम्मान स्वागत किया।
भगवान शिव ने मुस्कुराते हुए विष्णु जी से कहा, "हे प्रभु! आपकी माया अपरंपार है। मैं आपके उस दिव्य 'मोहिनी' स्वरूप को प्रत्यक्ष देखना चाहता हूँ, जिसकी चर्चा तीनों लोकों में हो रही है।"
भगवान विष्णु मन ही मन मुस्कुराए और बोले, "हे महादेव! मेरा वह रूप केवल असुरों को भटकाने और उन्हें वश में करने के लिए था। वह कामोत्तेजना और माया का साक्षात स्वरूप है। आप जैसे जितेंद्रिय, वैरागी और कामदेव को भस्म करने वाले महायोगी के सामने उस रूप को प्रकट करना उचित नहीं है, क्योंकि मेरी वह माया अत्यंत दुस्तर है।"
परंतु शिव जी ने कहा, "नारायण! आपकी माया निश्चित ही संसार को बांधती है, परंतु मैं तो आत्मज्ञानी हूँ, मुझे कौतुक देखने की इच्छा है।
भगवान विष्णु वहां से अंतर्ध्यान हो गए। कुछ ही क्षणों बाद, जहां शिव जी माता पार्वती के साथ खड़े थे, वहां का पूरा वातावरण बदल गया। अचानक एक अत्यंत सुंदर, रंग-बिरंगे फूलों से लदा उपवन (बगीचा) प्रकट हुआ।
वहां मंद-मंद सुगंधित हवा चल रही थी। तभी शिव जी की दृष्टि एक अत्यंत सुंदर स्त्री पर पड़ी, जो उस उपवन में एक लाल रंग की गेंद (कन्दुक) से खेल रही थी। वह स्त्री कोई और नहीं, स्वयं साक्षात भगवान विष्णु का 'मोहिनी' रूप था।
जब मोहिनी गेंद को हवा में उछालती और उसे पकड़ने के लिए दौड़ती, तो उसके पतले वस्त्र हवा में लहराते। उसके पैरों के पायलों की झंकार और उसकी तिरछी नज़रों का जादू पूरे वातावरण में बिखर रहा था।
साक्षात कामदेव को अपनी तीसरी आंख से जलाकर भस्म करने वाले महादेव, नारायण की उस अलौकिक योगमाया के वश में होने लगे। मोहिनी का सौंदर्य इतना तीव्र और जादुई था कि शिव जी अपनी सुध-बुध खो बैठे। वे भूल गए कि उनके पास माता पार्वती खड़ी हैं और वे स्वयं एक महायोगी हैं।
जब गेंद खेलते-खेलते मोहिनी के हाथ से छूटकर दूर गिरी, तो वह लजाकर मुस्कुराई। भगवान शिव अपने आसन से उठ खड़े हुए और काम के वश में होकर मोहिनी के पीछे दौड़ पड़े। मोहिनी आगे-आगे भागने लगी और शिव जी उनके पीछे-पीछे चलने लगे।
जब भगवान शिव ने मोहिनी को पीछे से पकड़कर अपने आलिंगन (गले) में लिया, तो उस दिव्य मिलाप और दोनों महाशक्तियों (हरि और हर) के तेज के मिलन से एक परम प्रतापी बालक का जन्म हुआ।
चूंकि यह बालक भगवान विष्णु (हरि) और भगवान शिव (हर) के तेज से उत्पन्न हुआ था, इसलिए इन्हें 'हरिहरपुत्र' कहा गया। दक्षिण भारत में इन्हें साक्षात 'स्वामी अयप्पा' या 'महाशास्ता' के रूप में पूजा जाता है, जिनका प्रसिद्ध मंदिर केरल के सबरीमाला में स्थित है।
जैसे ही इस दिव्य बालक का प्राकट्य हुआ, भगवान विष्णु ने अपनी माया समेट ली। मोहिनी गायब हो गईं और सामने मुस्कुराते हुए चतुर्भुज धारी नारायण खड़े थे। भगवान शिव तुरंत अपनी समाधि और चेतना में वापस आ गए।
होश में आते ही भगवान शिव ज़ोर से हंस पड़े। उन्हें ग्लानि (दुःख) नहीं हुई, बल्कि वे नारायण की इस अद्भुत माया को देखकर गदगद हो गए। शिव जी ने विष्णु जी से कहा, प्रभु! आज मैं माना कि आपकी वैष्णवी माया कितनी अगाध है। आपने मुझे यह दिखा दिया कि इस संसार में अहंकार के लिए कोई जगह नहीं है, चाहे कोई कितना भी बड़ा योगी क्यों न हो।
!! जय श्री कृष्णा!!
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