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Cultural - 17:12 ٥ ٥ ٥ 01.36 Zt 4G ll ' DrShiv Prasad Mishra कंगन पायल करधनी , बिछुवा बेसर हार। झुमका नथ विन्दी नहीं, कहाँ गया श्रृंगार। ।६२।। काजल लाली होठ की॰ पाँव महावर क्षीण।  सधवा हो विधवा लगे , माँग सिंदूर विहीन। ।६३।।  " पैन्ट" और" टी-शर्ट"मे,वैसा कहाँ निखार। साड़ी के सौन्दर्य मे, नारी मनो बहार।।६४।। कवि बेचारा मौन है, खोज रहा श्रृंगार। क्या वह युग भय से छिपा, सात समुन्दर पार।१६५।। आंग्ल सभ्यता का कहर, भारत में क्यों व्याप्त। काम और रति प्रणय का,क्या संयोग समाप्त। ।६६।। हो युग " धर्म की,मानव-हित अनुकूल।  रचना शाश्वत हो निरपेक्ष हो, कालजयी सुखमूल। I६७१।  काव्य रस सूर में , मे साहित्य। कलित तुलसी  बीजक बानी मे भरा, है खारा पाण्डित्य। १६८।| जब अंतस के कक्ष में, हो वीणा झन्कार। सुनो रागिनी ध्यान से, तब सुर-लय विस्तार।१६९।। घन बरसे पीयूष रस, गगन पुष्प की वृष्टि। सर से बरसे काव्य-घन, भुक्ति-मुक्ति सुख सृष्टि।I७०।। दोहा है साँकल सबल, बँधे भाव गज मत्त। गागर मे सागर भरे, अन्य छन्द की धत्त।१७१ ।। *डा.शिव प्रसाद मिश्र* BrarRarsinghion THU AT 11:40 Write a Shurabh Hahayvanshi Comment Like 17:12 ٥ ٥ ٥ 01.36 Zt 4G ll ' DrShiv Prasad Mishra कंगन पायल करधनी , बिछुवा बेसर हार। झुमका नथ विन्दी नहीं, कहाँ गया श्रृंगार। ।६२।। काजल लाली होठ की॰ पाँव महावर क्षीण।  सधवा हो विधवा लगे , माँग सिंदूर विहीन। ।६३।।  " पैन्ट" और" टी-शर्ट"मे,वैसा कहाँ निखार। साड़ी के सौन्दर्य मे, नारी मनो बहार।।६४।। कवि बेचारा मौन है, खोज रहा श्रृंगार। क्या वह युग भय से छिपा, सात समुन्दर पार।१६५।। आंग्ल सभ्यता का कहर, भारत में क्यों व्याप्त। काम और रति प्रणय का,क्या संयोग समाप्त। ।६६।। हो युग " धर्म की,मानव-हित अनुकूल।  रचना शाश्वत हो निरपेक्ष हो, कालजयी सुखमूल। I६७१।  काव्य रस सूर में , मे साहित्य। कलित तुलसी  बीजक बानी मे भरा, है खारा पाण्डित्य। १६८।| जब अंतस के कक्ष में, हो वीणा झन्कार। सुनो रागिनी ध्यान से, तब सुर-लय विस्तार।१६९।। घन बरसे पीयूष रस, गगन पुष्प की वृष्टि। सर से बरसे काव्य-घन, भुक्ति-मुक्ति सुख सृष्टि।I७०।। दोहा है साँकल सबल, बँधे भाव गज मत्त। गागर मे सागर भरे, अन्य छन्द की धत्त।१७१ ।। *डा.शिव प्रसाद मिश्र* BrarRarsinghion THU AT 11:40 Write a Shurabh Hahayvanshi Comment Like - ShareChat
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