👉 बुद्ध ने कहा – "भस्मान्तम् शरीरम्" – यानी शरीर का अन्त भस्म होना है। यही अंतिम क्रिया है। इसके बाद मृत शरीर से हमारा कोई सम्बन्ध नहीं रह जाता।
⚠️ समाज ने मृत्यु के बाद कई परम्पराएँ बना ली हैं –
तीसरा 🔹 पाँचवाँ 🔹 सातवाँ 🔹 नवाँ 🔹 ग्यारहवाँ 🔹 तेरहवीं 🔹 बरसी।
वास्तव में जो चला गया उससे हमारा कोई सम्बन्ध नहीं रहता।
सम्बन्ध शरीर से होते हैं, आत्मा से नहीं।
भोजन शरीर के लिए है, आत्मा के लिए नहीं।
💡 सोचिए:
🐎 क्या घोड़े को घास खिलाने से सवार का पेट भर जाता है?
🚗 क्या गाड़ी में तेल डालने से गाड़ी चलाने वाले का पेट भरता है?
नहीं! उसी प्रकार मृत व्यक्ति की आत्मा को भोजन देना असम्भव है।
🕊️ सत्य:
आत्मा स्वतंत्र है, बुद्ध की व्यवस्था में कहीं भी रह सकती है।
मृत्यु पर उसका हमारे साथ कोई सम्बन्ध नहीं बचता।
श्राद्ध, तर्पण, मृत्यु भोज – यह सब पाखंड और शोषण की व्यवस्था हैं।
🌱 सही श्रद्धांजलि:
जीवित लोगों की सेवा करें।
जरूरतमंदों को भोजन कराएँ।
समाज में अच्छे कार्य करें।
✨ कथन:
जीते जी तो दंगमदंगा,
मरने के बाद पहुँचाएँ गंगा।
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