राजा द्वारा कर लेने के बदले प्रजा के जीवन और संपत्ति की रक्षा की जानी चाहिए और कर भी इसी दृष्टि से ही लिए जाने चाहिए । इसमें यह भाव निहित है कि यदि राजा प्रजाजन की रक्षा करने में असमर्थ हो , उसे प्रजा से कर लेने का कोई अधिकार नहीं है ।
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महर्षि मनु
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