बात माँ बच्चों के फर्क की नहीं
बात समय की है।
बच्चे अब माँ से उम्मीद रखते हैं
वे स्कूल प्रोग्राम में कुछ करके दिखाएँ
टिफिन दें
पानी की बोतल भरें
कपड़े दें
नहाने से लेकर खाने तक
सब कामों में पीछे-पीछे दौड़ें।
फिर इनके मुंह बनाने
कुछ अच्छा नहीं बना सकती थी
क्या खाएं भूख लगी है
ऐसे कपड़े पहन क्यों आयी
दोस्त के सामने ऐसा क्यों बोला
अंग्रेजी नहीं आती तो मत बोला करो
तुम्हें तो कुछ करना नहीं
हमारे तो सपने हैं
और जाने तला भुना, गर्मा गर्म क्या क्या।
इनके बात बिन बात मुंह उतरते हैं
ये माँ से लड़ते, नाराज होते हैं
हमारा ऐसा कुछ नहीं रहा
माँ चूल्हे के पास बैठी मिलती
हम रोटी के लिए बस हाथ बढ़ा लेते
ना हमारे टिफिन बने
ना पानी की बोतल
ना जूते पॉलिश
ना कभी हमने कहा
माँ! कपड़े देना
रोटी देना, पानी देना
स्कूल का काम करवाना
ऐसा लाना, वैसा लाना।
माँ की खाट के पास खाट होना सुख रहा
माँ ने कुछ कहा हमने बुरा नहीं माना
असल में मुँह उतरना क्या होता है
बरसों बाद पता चला।
वे सादा सूट बंधेज की चुंदड़ी ओढ
चप्पलों में भी दुनिया घूम लें
तब भी दुनिया की सबसे सुंदर माँ हैं
वे जिस भाषा में बोलें
उनके मुँह पर जचती है।
वे गाल पर पप्पी नहीं करती थी
गले नहीं लगाती थी
सहेली भी नहीं रही
बस माँ रही
खेत से पल्लू के कोने में
शहतूत, काचर, पिलपोटण, बेर बाँध लौटती थी
कुँए पर अपनी ओक से पानी पिलाती थी
माँ की खुरदरी हथेली
घूंघट, गठरी, गीत सब याद हैं।
एक फोन करती हूं
कहती हूँ- माँ
लगता है जैसे अभी सबकुछ है
कंधी, काजल, रोटी, बटुआ, सुख।
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