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🔥🚩वैदिक ब्राह्मण 🙏 पुराण प्रवक्ता🚩🙏धर्मगुरु🙏
#🥵हाय गर्मी🫠🚤 #🌷शुभ रविवार #💐फूलों वाली शुभकामनाएं🌹 #🌙 गुड नाईट #❤️अस्सलामु अलैकुम
🥵हाय गर्मी🫠🚤 - कहते हैं मौत सबको अलग कर देती है. 66 आज एक माँ ने ये बात गलत साबित कर दी। ೩& विभूषण पण्डित आकाश कु. पाण्डेय जी महाराज कहते हैं मौत सबको अलग कर देती है. 66 आज एक माँ ने ये बात गलत साबित कर दी। ೩& विभूषण पण्डित आकाश कु. पाण्डेय जी महाराज - ShareChat
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🥵हाय गर्मी🫠🚤 - 02-05-26 शनिवार नारदमुनि अवतरण दिवस  श्री पूज्य 00 वेद विभूषण पण्डित आकाश कु. पाण्डेय जी महाराज की कृष्ण ' विक्रम संवत तिथि के अनुसार ज्येष्ठ माह पक्ष की प्रतिपदा को श्री नारद अवतरण दिवस मनाया जाता है। इस दिन देवों के ऋषि नारद जी ने ही धरुव और प्रहनाद को जी की पूजा : आराधना की जाती है। नारद ज्ञान देकर भक्ति मार्ग की ओर उनमुख किया था। नारद भक्ति, ज्ञान्न और कीर्तन के अमर प्रतीक उनके चरणों में कोटि-्कोटि प्रणाम | 02-05-26 शनिवार नारदमुनि अवतरण दिवस  श्री पूज्य 00 वेद विभूषण पण्डित आकाश कु. पाण्डेय जी महाराज की कृष्ण ' विक्रम संवत तिथि के अनुसार ज्येष्ठ माह पक्ष की प्रतिपदा को श्री नारद अवतरण दिवस मनाया जाता है। इस दिन देवों के ऋषि नारद जी ने ही धरुव और प्रहनाद को जी की पूजा : आराधना की जाती है। नारद ज्ञान देकर भक्ति मार्ग की ओर उनमुख किया था। नारद भक्ति, ज्ञान्न और कीर्तन के अमर प्रतीक उनके चरणों में कोटि-्कोटि प्रणाम | - ShareChat
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🌷शुभ रविवार - कहते हैं मौत सबको अलग कर देती है. 66 आज एक माँ ने ये बात गलत साबित कर दी। ೩& विभूषण पण्डित आकाश कु. पाण्डेय जी महाराज कहते हैं मौत सबको अलग कर देती है. 66 आज एक माँ ने ये बात गलत साबित कर दी। ೩& विभूषण पण्डित आकाश कु. पाण्डेय जी महाराज - ShareChat
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📢 ताज़ा खबर 🗞️ - ধৌ কুস অর্যবী वेद विभूषण ' पण्डित आकाशु कु॰ पाण्डेय जी महयाण्ज } जयंती की हार्दिक शुभकामनाएं! ர ধৌ কুস অর্যবী वेद विभूषण ' पण्डित आकाशु कु॰ पाण्डेय जी महयाण्ज } जयंती की हार्दिक शुभकामनाएं! ர - ShareChat
"इंतजार करने वालों को सिर्फ उतना ही मिलता है, जितना कोशिश करने वाले छोड़ देते हैं"। #🆕 ताजा अपडेट #🌷शुभ रविवार #🚀SC बूस्ट के साथ Views को सुपरचार्ज करें #📲LPG वायरल मीम्स🤣 #🪔शुभ शनिवार🙏
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#🏌️दिग्गज गोल्फर का निधन 😢 #🚀SC बूस्ट के साथ Views को सुपरचार्ज करें #🌷शुभ रविवार #🎁चैटरूम: अर्न & लर्न🤑 #🪔शुभ शनिवार🙏
🏌️दिग्गज गोल्फर का निधन 😢 - 30-04-26 गुरुवार वेद विभूषण पण्डित आकाश कु. पाण्डेय जे महाराज माँ छिन्नमस्ता प्राकटयोत्सव का अवसर वैशाख महीने में शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि को मनाया जाता है। महाविद्याओं में छिन्नमस्तिका माता छठी महाविद्या कहलाती है। दस देवी के इस रूप के विषय में कई पौराणिक धर्म ग्रंथों में उल्लेख मिलता है। 30-04-26 गुरुवार वेद विभूषण पण्डित आकाश कु. पाण्डेय जे महाराज माँ छिन्नमस्ता प्राकटयोत्सव का अवसर वैशाख महीने में शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि को मनाया जाता है। महाविद्याओं में छिन्नमस्तिका माता छठी महाविद्या कहलाती है। दस देवी के इस रूप के विषय में कई पौराणिक धर्म ग्रंथों में उल्लेख मिलता है। - ShareChat
#📢बंगाल में किसकी बनेगी सरकार❓ श्री महाभैरवशरभेश्वर जयंती Sri MahabhairavSharabha jayanti आज पवित्र #नृसिंह_चतुर्दशी है, यह भगवान विष्णु के चौथे अवतार महाप्रभु श्री नृसिंह की जयंती है। संध्या समय (गोधूलि बेला) में हिरण्यकशिपु दैत्य का वध करने हेतु श्रीजगन्नाथ नृसिंह रूप में प्रकट हुए थे। कहीं कहीं पर मध्यान्ह काल को ही नरसिंह अवतरण का समय बताया गया है। भगवान नरसिंह जो स्वयं परमात्मा आदिपराशक्ति के वाहन हैं और परमप्रसिद्ध "चण्डीपार्षद" है। पांचरात्रिक वैष्णवों केलिए यह चतुर्दशी अत्यंत महत्वपूर्ण है। सभी वैष्णव आज के दिन भगवान नरसिंह को प्रसन्न करने के लिए नाना प्रकार से व्रत पालन करते हैं। लेकिन आज केवल नृसिंह जयंती ही नहीं है, यही वैशाख शुक्ल चतुर्दशी के मध्यरात्रि को देवी छिन्नमस्ता, देवी अथर्वणाभद्रकाली, देवी शूलिनीदुर्गा तथा भगवान शरभेश्वर महारुद्र का भी प्राकट्य हुआ था। भगवान शरभेश्वर महारुद्र, भगवान शिव के 19 प्रमुख अवतारों में से एक हैं। उनका उल्लेख ऋग्वेद, अथर्ववेद, 31 उपनिषदों में वर्णित शरभउपनिषद, शिव महापुराण, लिंगमहापुराण, स्कंद महापुराण, ब्रह्माण्डपुराण के उत्तरखण्ड के ललितोपाख्यान, गण्डभेरुण्ड कल्प, मन्त्रमहोदधि, रुद्रयामल तंत्र और आकाश भैरव कल्प आदि ग्रंथों में मिलता है। शरभेश्वर का प्राकट्य की कथा इस प्रकार है, :- हिरण्यकशिपु के वध के बाद, भगवान नृसिंह अपनी क्रोध के प्रभाव से अत्यधिक उग्र और अनियंत्रित हो गए। उनका क्रोध इतना अधिक था कि संपूर्ण सृष्टि में हाहाकार मच गया। सभी देवता भयभीत होकर भगवान शिव की शरण में गए। तब भगवान सदाशिव ने पहले वीरभद्र जी को प्रेरित किया भगवान नरसिंह को शांत करने के लिए लेकिन जब भगवान वीरभद्र के द्वारा संभव न हो सका तब सदाशिव स्वयं मानव, गरुड़ और सिंह के मिश्रित स्वरूप में शरभेश्वर महारुद्र के रूप में वैशाख शुक्ल चतुर्दशी की सायंकाल के बाद में प्रकट होकर भगवान नृसिंह को शांत करने का प्रयास किये। भगवान शरभेश्वर और भगवान नृसिंह के बीच हिमालय पर्वत पर युद्ध हुआ। परंतु नृसिंह ने एक और उग्र रूप अष्टमुखी गण्डभेरुण्डमहानृसिंह (अघोर महावीर नृसिंह) धारण कर शरभेश्वर पर प्रहार करने लगे। शरभेश्वर की शक्ति धीरे-धीरे क्षीण होने पर गण्डभेरुण्डमहानृसिंह शरभेश्वर को उठाकर मारने को उद्धत हुए तब सभी देवता और स्वयं शरभेश्वर ने अंतिम उपाय के रूप में मा महामाया आदिपराशक्ति की आराधना की। उनकी कृपा से देवी महाप्रत्‍यांगिरा प्रकट हुईं और युद्ध में हस्तक्षेप कर सभी को शांत की। भगवान शरभ के दो पंखों में देवी अथर्वणाभद्रकाली और देवी शूलिनीदुर्गा वास करती हैं।‌ उनके केशों में देवी ज्वालामालिनी (भगवान मार्तण्ड सूर्य की शक्ति)। उनके दोनों जांघों में व्याधि और मृत्यु, हृदय में भैरव, पेट में आग्नेयगिरि निवास करते हैं। आगमों में भगवान शरभ के स्वरूपों को — श्मशानेश्वर, प्रलयकालाग्निरुद्र, नीलभैरव, महाभैरव और उग्रभैरव कहा गया है। आकाश भैरव कल्प अनुसार, भगवान सदाशिव ने सृष्टि में धर्म और रक्षण हेतु तीन रूपों में प्रकट हुए: 1. आकाश भैरव, 2. #आशुगरुड़, 3. शरभ। (यद्यपि कुछ शास्त्रों के अनुसार शरभ वीरभद्र के अवतार हैं, शरभके वीरभद्र अवतार होने पर भगवान सदाशिव वहां विराटशरभ रूप में होते हैं- शिवसहस्रनाम में कुछ नाम- शरभाधिपति, पक्षीराजाधिप") शरभ (मानव, सिंह और गरुड़ का मिश्रण अष्टभुज, कहीं पर 18भुज) सालुब (दो सिंहमुख वाले दशभुज) पक्षीराज (पूर्णतः चीलके स्वरूप- कहीं कहीं पर अग्नि की माला से लिपटे हुए। कोकमुखी(धूमावती) देवी के समेत 10 पंख और 20 हाथों वाले। शरभेश्वर महारुद्र की तीन पत्नियाँ हैं:- देवी अथर्वण भद्रकाली, देवी सिद्धिदात्री और माँ शूलिनी दुर्गा। परंतु परमेश्वर शरभ के शक्ति मुख्यतः आठ देवी हैं: जिन्हें "शरभाष्टनायिका" कहा गया है- दारुणा धूमावती (जो पराधूमावती के निग्रह रूप हैं), आसुरी लक्ष्मी, ज्वालामालिनी, आकाशदुर्गा / पक्षी दुर्गा / शूलिनी दुर्गा, महालक्ष्मी, निग्रहचामुंडा, प्रत्यांगिरा / भद्रकाली। देवी नागेश्वरी पद्मावती (जिन्हें शरभतंत्र में एक अन्य पत्नी रूप में स्वीकारा गया है, सप्तशती के छठवें अध्याय में ध्यान है, यह सर्वज्ञेश्वर शरभभैरव के अंक में विराजमान रहती हैं।) कहीं-कहीं पर इन शरभेश के अष्टानायिका को ही उनकी पत्नी बताया गया है। भगवान #शरभेश्वर महारुद्र के ३१ रूपों का वर्णन तंत्रशास्त्रों में उपलब्ध है: 1. गौरीशरभ 2. शूलिनी शरभ 3. अथर्वण शरभ 4. प्रत्यांगिरा शरभ 5. नटेश शरभ 6. प्रचंड शरभ 7. नागेश शरभ 8. #नागचण्डेश्वर शरभ 9. अघोर शरभ 10. नक्षत्र शरभ 11. भीषण शरभ 12. कपाल शरभ 13. भेरुंड शरभ 14. श्रीसुंदरी सहित ललित शरभ 15. त्रिमुखी मंगल शरभ 16. चतुर्मुखी ब्रह्म शरभ 17. पंचमुखी सौंदर्य शरभ 18. रिपुदाहक महा-रौद्र शरभ 19. सप्तमुखी महा-ज्वालांग शरभ 20. अष्टमुखी विश्वशरभ(शरभतंत्र और सालुवतंत्र के अनुसार गंडभेरुण्डमहानरसिंह यही विश्वशरभ के भेद मात्र है और महाशरभ से पराजित होकर विश्वशरभ के मध्य में विलीन हो गये थे।) 21. वैरोचन शरभ 22. गरुड़ेश्वर शरभ 23. महा पक्षीराज 24. चंद्रहास शरभ 25. विजय शरभ 26. अंतरिक्ष शरभ 27. उग्रभैरव 28. पाताल शरभ 29. सालुबेश 30. श्मशान शरभेश्वर 31. गंधर्व शरभ। वस्तुतः यह कहना सही होगा भगवती शूलिनीदुर्गा जो शरभ भगवान के पत्नी है, इन माता के 62 से भी ज्यादा रूपभेद है, (शूलिनीकल्प) और मां शूलिनीदुर्गा के 62 से ज्यादा रूपभेद में माता के उसी रूप के अनुरूप भगवान शरभ 62 अलग अलग रूप में रहते हैं। वैष्णवमत अनुसार भगवान शरभ नरसिंह को शांत करने पर भगवान नरसिंह और उग्र बन के गण्डभेरुण्डमहानृसिंह मूर्ति धारण कर शरभ को विनाश किए थे। लेकिन शैवमत के अनुसार भगवान शिव शरभेश स्वरूप हैं भगवान नरसिंह को शांत करने पर भगवान नरसिंह और अधिक उग्र हो गए और अपने गण्डभेरुण्डमहानृसिंह मूर्ति धारण करते ही तभी भगवान शरभेश्वर अपने ललाट के अग्नि से शतमुखी भगवती उग्रप्रत्यांगिरा कालिका को उत्पन्न कर गण्डभेरुण्डमहानृसिंह को परास्त कर स्वयं में विलीन करवा दिए। जैसा की त्रयोदश चतुर्दश शताब्दी के परमशैवाचार्य श्री श्री उमापति शिवाचार्य परपीठ चिदम्बरम स्थित परंब्रह्म श्रीनटराज केलिए रचित "कुंचिताङ्घ्रि स्तवराज" में कहते हैं:- भीत्या सन्त्रासमाने नरहरिवपुषो देवतानां समूहे धात्रा संस्तूयमानः शरभवरतनुः सालुवः पक्षिराजः । वेगात्तं छेदयित्वा स्वपदनखमुखैस्तत्त्वचाऽलङ्कृतोऽभूत् दंष्ट्रासन्दीप्तलोकस्तमखिलवरदं कुञ्चिताङ्घ्रिं भजेऽहम् ॥ युद्धे भग्नोरुकायं नरहरिवपुषं गण्डभेरुण्डरूपी- भूत्वा गर्जन्तमग्रे शरभखगपतिर्यः स्वफालाक्षिकुण्डात् । उग्रप्रत्यङ्गिराख्यां शतशतवदनां कालिकामाशु सृष्ट्वा तस्या जिह्वाग्रवह्निं सुचरुवदनयत्कुञ्चिताङ्घ्रिं भजेऽहम् ॥ अर्थात्:- जब भगवान नरसिंह के उग्र रूप को देखकर देवताओं का समूह भय से कांप रहा था, तब ब्रह्मा जी के द्वारा स्तुति किए गए श्रेष्ठ 'शरभेश्वर पक्षीराज सालुवेश' का शरीर धारण करने वाले परमेश्वर महादेव प्रकट हुए। उन्होंने अत्यंत वेग से अपने पंजों के नखों और चोंच से नरसिंह की त्वचा को विदीर्ण कर स्वयं को नरसिंह के चमड़ों से सुशोभित किए। जिनकी दाढ़ों की चमक से संपूर्ण लोक आलोकित हो रहे हैं, उन सभी वरदानों को देने वाले और अपने चरणों को मोड़कर (नृत्य की मुद्रा में) स्थित भगवान 'कुञ्चिताङ्घ्रि' का मैं भजन करता हूँ। वही युद्ध में जब नरसिंह का शरीर क्षत-विक्षत हो गया, तब वे 'गण्डभेरुण्ड' पक्षी का रूप धारण कर सामने गर्जना करने लगे। उस समय शरभेश्वर रूपी पक्षीराज शिव ने अपने ललाट पर स्थित अग्नि-कुंड रूपी नेत्र से 'उग्र प्रत्यङ्गिरा' नामक भगवती कालिका को उत्पन्न किए , जिनके सैकड़ों मुख थे। उन काली की जिह्वा से निकलती हुई अग्नि को जिन्होंने अपने सुंदर मुख में समाहित कर लिया, उन चरणों को मोड़कर स्थित भगवान 'कुञ्चिताङ्घ्रि' का मैं भजन करता हूँ। लेकिन शाक्तों में ऐसा नहीं है शाक्तमत में सबसे पहले भगवान नरसिंह को शांत करने के लिए भगवान से वीरभद्र को भेजते हैं लेकिन जब वीरभद्र असमर्थ हो जाते हैं तब भगवान शिव स्वयं शरभेश्वर रूप में प्रकट होकर नरसिंह को शांत करते हैं पर तभी नरसिंह और उग्र होकर "अघोरमहावीरनरसिंह" गण्डभेरुण्डमहानृसिंह मूर्ति में स्थित होकर शरभको ही भक्षण करने लगे तभी भगवान शरभ मां आदिपराशक्ति को स्तुति कर प्राणरक्षा केलिए प्रार्थना करने पर जगदंबा त्रिपुरा स्वयं सहस्रमुखी महाप्रत्यांगिरा रूप में आकर दोनों को बांध कर शांत करती हैं... यथा अथर्वणरहस्ये-उत्तरभागे-चतुर्थसर्गे-ईश्वरपार्वतीसंवादे:- ईश्वर उवाच:- नृसिंहवपुषा देवो जगद् ध्वंसाय संस्थितः। त्रस्ताः सुरा महासंघा नारदं शरणं ययुः॥१ नारदं शरणं प्राप्य जग्मुः शम्भोः पदे ततः॥२॥ शिवं प्रपन्ना देवानां नारदेन समर्चितः। प्रार्थयामासुरेकेन क्रोधशान्तिं हरेः परम्॥३॥ ततः शिवः प्रसन्नात्मा पार्षदं वीरभद्रकम्। प्राह युद्धाय विष्णुं च शमयस्वेति भावतः॥४॥ वीरभद्रो ययौ शीघ्रं संग्रामाय हरिं प्रति। नृसिंहवपुषा तेन क्षिप्रं पातितवान् भुवि॥५॥ ततः क्रुद्धो महादेवः संप्रचक्रे महां तनुम्। नरसिंहजयार्थं स शरभं रूपमास्थितः॥६॥ अष्टबाहुरनेकाङ्घ्रिः त्रिनेत्रश्च महाद्भुतः। मनुष्यसिंहगृध्राङ्गी शरभस्तप्ततेजसः॥७॥ चत्वारः पक्षिणः तस्य तीव्रवेगवहाः स्मृतः। नखदंष्ट्रायुतं रूपं लोकसंहर्तृभीषणम्॥८॥ हिमवत्यां समायात्य शरभो भीषणाकृतिः। नृसिंहं समरं चक्रे यत्र लोका बभूवु भिः॥९॥ कम्पमानं जगत् सर्वं भिन्नाः पर्वतकोटयः। समुद्रे ज्वलनं तीव्रं जातं शरभतेजसः॥१०॥ भिन्नाः शैलेन्द्रशृङ्गाणि गगनं प्रज्वलं ज्वलन्। शरभस्य प्रभावेन कम्पमानं जगत्त्रयम्॥११ शरभस्य प्रभावेन क्षीयमाणोऽभवत् हरिः ततो नृसिंहः क्रोधेन विकृतः प्रलयं ययौ।।१२ गण्डभेरुण्डरूपेण बहुभुजमुखान्वितः॥ नृसिंहः संप्रकुपितः गण्डभेरुण्डरूपधृत्।।१३ आसीदष्टमुखो घोरो त्रिंशभुजबलान्वितः। दंष्ट्राकोट्याः नखैः तीक्ष्णैः शरभं च विधार्य सः।।१४ स शरभं च संक्रुद्धं नखदंष्ट्रैः समाकुलः। छिनत्ति स्म बलात्तूर्णं समरे दारयन् दृढम्॥१५ व्यथितः शरभो भीतः त्राहि त्राहीति चोदितः। ततस्तु शरभो दुःखात् नृसिंहेनार्दितः भृशम्।। १६ त्रिपुरां लोकजननीं स्मृत्वा चक्रे नमः पुनः । जगदम्बां समाराध्यं भुवनेशीं जगत्प्रभाम्॥१७ प्रणम्य त्रिपुरां देवीं शान्त्यर्थं शरणं ययौ॥१८ अर्थात्- ईश्वर ने कहा: भगवान विष्णु नृसिंह रूप धारण कर जगत का विनाश करने के लिए स्थित हो गए (उनका क्रोध शांत नहीं हो रहा था)। इससे भयभीत होकर देवताओं के समूह नारद जी की शरण में गए। नारद जी की शरण लेकर वे शिव के चरणों में पहुँचे। नारद जी द्वारा पूजित उन देवताओं ने भगवान शिव की शरण ली और श्रीहरि (नृसिंह) के क्रोध को शांत करने की प्रार्थना की। तब प्रसन्न मन वाले शिव ने अपने पार्षद वीरभद्र से कहा कि युद्ध के भाव से जाकर विष्णु को शांत करो। वीरभद्र शीघ्र ही हरि (नृसिंह) से युद्ध करने पहुँचे, किंतु नृसिंह ने उन्हें शीघ्र ही पृथ्वी पर पटक दिया। तब क्रोधित होकर महादेव ने विशाल शरीर धारण किया और नृसिंह को जीतने के लिए 'शरभ' रूप धारण किया। वह शरभ रूप अत्यंत अद्भुत था, जिनके आठ पैर, कई हाथ और तीन नेत्र थे। वह मनुष्य, सिंह और गिद्ध के अंगों वाला तेजस्वी रूप थे। उनके चार पंख थे जो तीव्र वेग वाले थे। नाखूनों और दाढ़ों से युक्त वह रूप प्रलयकारी और भयानक था। हिमालय पर वह भयावह आकृति वाला शरभ प्रकट हुए और नृसिंह के साथ युद्ध करने लगे। जिससे सभी लोक भयभीत हो गए। सारा जगत कांपने लगा, पर्वतों के शिखर टूटने लगे और शरभ के तेज से समुद्र में तीव्र अग्नि धधक उठी। पर्वत की चोटियाँ खंडित हो गईं और आकाश जलने लगा। शरभ के प्रभाव से तीनों लोक कांप उठे और श्रीहरि (नृसिंह) का तेज क्षीण होने लगा। तब नृसिंह ने अत्यंत क्रोधित होकर विकराल प्रलयंकारी रूप धारण किये। वे 'गण्डभेरुण्डमहानृसिंह' बन गए, जिनके अनेक हाथ और मुख थे। वह गण्डभेरुण्डमहानृसिंह रूप आठ मुख वाले और तीस भुजाओं के बल से युक्त थे। उन्होंने अपनी करोड़ों दाढ़ों और तीखे नाखूनों से शरभ को पकड़ लिया और युद्ध में उन्हें विदीर्ण (फाड़ना) करना शुरू कर दिया। नृसिंह द्वारा अत्यधिक पीड़ित और व्यथित होकर भयभीत शरभ (शिव) "रक्षा करो, रक्षा करो" पुकारने लगे। तब शरभ ने दुखी होकर लोकमाता परंब्रह्म त्रिपुरासुंदरी का स्मरण किए और उन्हें प्रणाम किया। जगदम्बा भुवनेश्वरी की आराधना कर वे शांति के लिए उनकी शरण में गए।.... वस्तुतः भगवान शरभ, भगवान वीरभद्र दोनों अलग ही है, भगवान वीरभद्र के पत्नी जो प्रत्यङ्मुखा भद्रकाली है वह भगवान शरभेश्वर की पत्नी अथर्वणाभद्रकाली के लघुविद्या है । जब यही शरभ विश्वशरभ रूप धारण करते हैं तभी अथर्वणाभद्रकाली ही शतमुखी भगवती उग्रप्रत्यांगिरा कालिका बन जाती है... लेकिन जो सहस्रमुखी विपरीत महाप्रत्यांगिरा है वह स्वयं परंब्रह्म आदिपराशक्ति दक्षिणाकाली ही है जो भगवान परमशिव महाकालकी कामिनी है। इन महाप्रत्यांगिरा के यहां दशमहाविद्या सेविका रूप में द्वारपालिका के रूप में स्थित रहती हैं। भगवान शरभेश्वर अपने अन्यमूर्ति जो पक्षीराज मूर्ति तथा "आशुगरुड" है इस रूप में वह भगवान विष्णु के वाहन हैं। #दारुणनिग्रहतंत्र नामक शैव आगम में भगवान नरसिंह जब हिरण्यकशिपु को वध करने के लिए स्वयं को समर्थ समझे तब वह भगवान साम्बसदाशिव की उपासना किए, भक्ति से प्रसन्न सदाशिव उन्हें अपने ही नरसिंह स्वरूप को प्रदान किए, लेकिन जब नारायण जगन्नाथ भगवान सदाशिव के नरसिंह मूर्ति को धारण कर अपने वाहन गरुड़ पर बैठे तब गरुड़ के कमर टुट गए, क्योंकि शिवके नरसिंहरूप को वेदमूर्ति गरुड़ धारण न कर सके, तभी नृसिंहरूपी नारायण के प्रार्थना से भगवान सदाशिव स्वयं महागरुड़मूर्ति धारण कर अपने उस रूप को विष्णुवाहन गरुड़ को प्रदान किए, जो सारूप्यमुक्ति हैं। भगवान शरभेश्वर के मुख्यतः दो ही पत्नी हैं मां प्रत्यांगिरा काली और शूलिनीदुर्गा। बाकी जितने पत्नी हैं सब इन दोनों के ही विस्तार मात्र है। धूमावती, चामुण्डा, ज्वालामालिनी, नागेश्वरी, यस सब प्रत्यंगिरा के विस्तार और महालक्ष्मी, आसुरी लक्ष्मी, पक्षीदुर्गा, सिद्धिदात्री यह शूलिनीदुर्गा के विस्तार है। इन सभी के अलावा भगवान शरभ के और एक अन्य शक्ति श्वेतदुर्गा(जलदुर्गा) भगवती गंगा भी है.. शरभध्यान- चन्द्रार्काग्निस्त्रिदृष्टिः कुलिशवरनखश्चञ्चलोऽत्युग्रजिह्वः काली दुर्गा च पक्षौ हृदयजठरगो भैरवो वाडवाग्निः । ऊरूस्थौ व्याधिमृत्यू शरभवरखगश्चण्डवातातिवेगः संहर्ता सर्वशत्रून् स जयति शरभः शालुवः पक्षिराजः..1 अर्थ- जिन परमेश्वर शरभदेव की तीन नेत्र— चंद्रमा, सूर्य और अग्नि के समान प्रकाशमान हैं, जिनके नख महावज्र के समान प्रचंड और तीव्र हैं; जिसकी जिह्वा अत्यंत उग्र और जगत को भक्षण करने केलिए चंचल है; जिनके दोनों पंखों में मा अथर्वणा भद्रकाली और शूलिनीदुर्गा देवी स्थित हैं; जिनके हृदय और पेट में भैरव तथा समुद्र-ज्वाला वाडवाग्नि स्थित हैं; जिनकी जांघों में रोग और मृत्यु तथा दोनों का संहार करने की शक्ति निवास करती है; जो शरभ रूप में पक्षीराज महापक्षी के रूप में चण्डमहावायु से भी अधिक वेगशील है, ऐसा शत्रुनाशक, महाशक्ति-संपन्न शरभदेव भगवान शालुवपक्षिराज सदा विजय प्राप्त करें। ज्वलनकुटिलकेशं सूर्यचन्द्राग्निनेत्रं निशिततरनखाग्रोद्धूतहेमाभदेहम् । शरभमथ मुनीन्द्रैः सेव्यमानं सिताङ्गं प्रणतभयविनाशं भावयेत्पक्षिराजम्।।....2 अर्थ- जो भगवान शरभदेव अग्नि-जैसे ज्वलंत और टेढ़े बालों से युक्त हैं, जिनकी आँखें सूर्य, चंद्र और अग्नि के समान दीप्तिमान हैं; जिनका शरीर स्वर्ण के समान चमकता है और तेज़, धारदार नखों से युक्त है; जो शरभदेव महान ऋषियों द्वारा पूजित हैं, जिनका शरीर शुभ्र है, जो शरणागत भक्तों के भय को दूर कर देते हैं — ऐसे पक्षीराज रूप शरभदेव का ध्यान करना चाहिए। #📢 ताज़ा खबर 🗞️ #🚀SC बूस्ट के साथ Views को सुपरचार्ज करें #🪔नरसिम्हा जयंती 🦁 #🌷शुभ बुधवार
📢बंगाल में किसकी बनेगी सरकार❓ - Balparashakthi sevak Adiparashakth Adiparashakthi ~ 507 Ad सालुव शरभेश्वर जयंती Sri Saluva Sharabheswara Jayanti वेद विभूषण पण्डित आकाश कु. पाण्डेय जी महाराज Balparashakthi sevak Adiparashakth Adiparashakthi ~ 507 Ad सालुव शरभेश्वर जयंती Sri Saluva Sharabheswara Jayanti वेद विभूषण पण्डित आकाश कु. पाण्डेय जी महाराज - ShareChat
#🪔नरसिम्हा जयंती 🦁 #🚀SC बूस्ट के साथ Views को सुपरचार्ज करें #🌷शुभ रविवार
🪔नरसिम्हा जयंती 🦁 - भगवती जगदम्बा के अवतार भगवान नरसिंह जयंती॰ की हार्दिक शुभकामनाएं 93 6 विभूषण पण्डित आकाश कु. पाण्डेय जी महाराज भगवती जगदम्बा के अवतार भगवान नरसिंह जयंती॰ की हार्दिक शुभकामनाएं 93 6 विभूषण पण्डित आकाश कु. पाण्डेय जी महाराज - ShareChat
#🪔नरसिम्हा जयंती 🦁 प्रेम करना हैं तो रात की तरह करिए जिसे चांद भी स्वीकार्य है और उसके दाग भी। #🚀SC बूस्ट के साथ Views को सुपरचार्ज करें #📢 ताज़ा खबर 🗞️ #🎁चैटरूम: अर्न & लर्न🤑
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#📢बंगाल: वोटिंग के दौरान हिंसक झड़प 🤯 छोटकी माई #🚀SC बूस्ट के साथ Views को सुपरचार्ज करें #📢 ताज़ा खबर 🗞️ #🌷शुभ रविवार #🌷शुभ बुधवार
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