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🔥🚩वैदिक ब्राह्मण 🙏 पुराण प्रवक्ता🚩🙏धर्मगुरु🙏
#🙏परशुराम जयंती🪔📿 🌹अग्रतः चतुरो वेदाः पृष्ठतः सशरं धनुः । इदं ब्राह्मं इदं क्षात्रं शापादपि शरादपि ।।🌹 आगे से अर्थात मुख में चारो वेद, पीछे धनुष वाण। यही ब्राह्मण हैं और यही क्षत्रिय। ऋषि ऋचीक के दिये शाप के कारण भी और शस्त्र धारण से भी। ब्राह्मण समाज में विगत कुछ वर्षों से भगवान श्रीपरशुराम के नाम और कीर्ति का बहुधा प्रसार हो रहा है। तत्व और यथार्थ से अनभिज्ञ भगवान श्रीपरशुराम को एक जाति सूचक योद्धा और महापुरुष के रूपमें देखते हैं। इसी क्रम में इन्हें क्षत्रियद्रोही भी कल्पित कर लिया जाता है। 'जय परशुराम' के उद्घोष में भी ब्राह्मण वर्चस्व अथवा क्षत्रिय प्रतिकार की गंध स्वाभाविक रूप से अनुभव की जाती है। यह चलन बढ़ा तो हिंदुत्व के बृहद आयाम को प्रभावित कर सकता है। विश्व आज विनाश के मुहाने पर खड़ा है। ऐसे में सनातन संस्कृति ही राह दिखा सकती है। जबकि स्वयं सनातन पर ही कई ग्रहण लगे हुए हैं। हमें तय करना होगा कि किस-किस से हमें लड़ना है। कहीं हम अदम्य उत्साह में अकेले ही न बँचें। हमारी क्रियाएं हमें अपनों से दूर करदें। लक्ष्य से विरत करदें। आखिर हमें अकेले आइलैंड में तो नहीं रहना है? ब्राह्मण क्षत्रिय समाज को समझना आवश्यक है कि भगवान परशुराम उन अनादि ब्रह्म स्वरूप श्रीमन्नारायण विष्णुके अंशावतार हैं जो आगे क्षत्रियवंशविभूषण भगवान राम के रूप में प्रकट हुए और उन्होंने धर्मविमुख ब्राह्मण असुर रावणादि का वधकर पृथ्वीका भार उतारा। क्षत्रिय संहारके नायक परशुराम ने क्षत्रिय कुमार श्रीराम के समक्ष सर्पण कर शस्त्रका परित्याग ही कर दिया। परशुराम का समूर्ण चरित्र ब्राह्मण और क्षत्रिय के एकत्व का प्रतीक है। इनकी एकरसता में ही मानव, मानवता और राष्ट्रधर्म का संरक्षण सन्निहित है। ब्राह्मण क्षत्रिय के बलिदान को शून्य कर दें तो अतीत और भविष्य दोनों संदिग्ध हो जाएंगे। चौबीस अवतारों के क्रम में भगवान परशुराम का अवतार सोलहवां है तथा दशावतार के वर्णन में परशुराम छठे अवतार हैं। स्वयं भगवान विष्णु ने इन्हें विषयलोलुप और तमोगुणी क्षत्रियों के विनाश के लिए पृथ्वी पर भेजा था। नाम तो इनका भी राम ही था । शिवप्रदत्त परशु धारण करने के कारण ये परशुराम कहलाये। वास्तवमें भगवान परशुरामके जन्मसे लेकर समस्त लीलाएं ब्राह्मण और क्षत्रिय की परस्पर प्रगाढ़ युति की उदाहरण हैं। परशुराम ने केवल और केवल हयहयवंशीय क्षत्रियों का ही विनाश किया। उसी समय अन्यान्य क्षत्रियों सूर्य वंश या कुशिक वंश आदि का तनिक भी प्रतिकार नहीं किया। अन्य वर्ग और वर्ण के लोगों को तो परशुराम द्वारा छूने का भी प्रसंग नहीं मिलता। परशुराम के पितामह ऋषि ऋचीक की पत्नी सत्यवती कुशिक वंशी क्षत्रिय राजा महाराज गाधि की पुत्री थीं। राजर्षि विश्वामित्र सत्यवती के सहोदर भ्राता थे। अतः परशुराम की मातृ परंपरा क्षत्रिय वंश और अंश का योग है। विश्वामित्र की यही बहन सत्यवती कौशिकी नदी के पुण्य स्वरूप में परिणत हो आज भी विद्यमान हैं। विश्वामित्र के सौ पुत्र भी हुए जिनसे विभिन्न गोत्र और प्रवर बने। कौशिक गोत्र से भूमिहार ब्राह्मणों की उत्पत्ति कही जाती है जो बल-विक्रम में क्षत्रिय तुल्य और काशिराज्य आदि राज्योंके अधिपति रहे। इन्हीं परशुराम ने विश्वके महान ब्राह्मण योद्धा द्रोणाचार्य को तथा क्षत्रिय महाबली महाराज भीष्म को दुर्जेय धनुर्विद्या की शिक्षा दी और अपना शिष्यत्व प्रदान किया। अब विचार करें तो परशुराम के जीवन में ब्राह्मण-क्षत्रिय का परस्पर अन्योन्याश्रित सद्गुण और संबंध निरंतर चलता रहा। दोनों ही वर्णों में भेदबुद्धि का सर्वथा लेश भी नहीं था। वही सहस्रार्जुन जिसने नर्मदा नदी के प्रवाह को उलट दिया था और रावण को बन्दी बनाकर पशुओं के स्थान में बांध रखा था, इसे भयंकर युद्ध में धराशायी कर परशुराम ने बछड़े सहित अपह्रत कामधेनु को लाकर पिता को सौंप दिया और सहस्त्रार्जुन के बधका वृतांत भी सुनाया। जमदग्नि ऋषि राजा के बधके समाचारसे विचलित हो उठे तथा उन्होंने पुत्र परशुराम के इस कृत्य को अतिशय जघन्य कह कर उन्हें प्रायश्चित स्वरूप एक वर्ष की तीर्थयात्राका आदेश दिया। सहस्रार्जुनके दस हजार पलायित पुत्र परशुराम की अनुपस्थिति में जमदग्नि ऋषि का शीश काट ले गए।परशुराम जब तीर्थ यात्रा से लौटे तो यह दारुण दृश्य और माताका विलाप देख कर आक्रोश से भरे शस्त्र धारण कर सहस्त्रार्जुन के दस हजार पुत्रों का वध कर उनके मुंड राशि का पहाड़ लगा दिया। महर्षि जमदग्नि का कटा सिर लाकर परशुराम ने संजीवनी विद्या से धड़ से जोड़ दिया। जमदग्नि नक्षत्र रूप में लीन होकर प्रवर्तमान मन्वन्तर में सप्तर्षि मंडल में विराजमान हैं। पिता की आज्ञा से माता और भाइयों का बध करने तथा पुनः माता रेणुका और सात भाइयों को जीवित करने के बाद पिता ने परशुराम को चिरंजीवी होने तथा अपराजेय होने का वरदान प्रदान किया। "परासुराम पितु अग्या राखी। मारी मातु लोक सब साखी।।" जनकराज के स्वयंवर में जब श्रीराम द्वारा परशुराम का शिव धनुष भंग हुआ तो वे क्रोधाकुल हो उठे। पश्चात अपना धारण किया हुआ विष्णु धनुष जब श्रीराम की परीक्षा हेतु उन्हें देना चाहा तो वह आप से आप अपने स्वामी के पास चला गया। परशुराम ने अनुभव कर लिया कि रामजन्म के साथ अब क्षत्रिय वंश पवित्र होगया। अब धर्म धरा और धेनु की रक्षा करने में क्षत्रिय समर्थ होंगे। परशुराम ने तुरंत शस्त्र त्याग दिया और तपस्या हेतु दक्षिण में महेंद्र पर्वत पर चले गए। परशुराम कल्पांतजीवी हैं और अब भी किसी किसी को दर्शन दिया करते हैं। ब्राह्मणों के बल विक्रम पराक्रम और तेज की रक्षा करते हुए ये आगामी मन्वन्तर में सप्तर्षि मंडल को सुशोभित करेंगे। "अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषणः। कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरजीविनः।।" भारतीय संस्कृति में तीन राम जिनमे प्रथम प्राकट्य परशुराम का हुआ, हमारी शक्ति की धुरी हैं-- परशुराम, श्रीराम और बलराम। ये तीनों ही भगवान हैं। सनातन धर्म मे सर्वसमाज के समन्वय भी हैं। जातियों में जन्म लेकर भी इनकी कोई जाति नहीं है। ये भगवान हैं। सब के हैं। सर्वान्तर्भूत हैं। सभी के इच्छित मनोरथ पूर्ण करने वाले हैं। जिन्हें जातियों का प्रतीक मानना आत्मघाती विचार है। "रामत्रयं वेणु बलिर्युधिष्ठिरः कुर्वन्तु वः पूर्ण मनोरथं सदा।" दुर्जेय ब्राह्मण योद्धा जिनका नाम सुनकर विधर्मी कांपते थे, जिनकी रौद्र मूर्ति देखनेमें विरुद्धों के नेत्र सक्षम नहीं थे, वही जनकपुरी में भगवान राम को पहचान कर द्रवीभूत हो उठते हैं और भक्तिगर्भित स्तवन करते हैं। इसका सर्वश्रेष्ठ वर्णन रामचरितमानस में श्रीगोस्वामीजी ने किया है। जाना राम प्रभाउ तब, पुलक प्रफुल्लित गात। जोरि पानि बोले बचन, हृदयँ न प्रेमु अमात।। जय रघुबंस बनज बन भानू। गहन दनुज कुल दहन कृसानू।। जय सुर बिप्र धेनु हितकारी। जय मद मोह कोह भ्रम हारी।। करउं काह मुख एक प्रसंसा। जय महेस मन मानस हंसा।। कहि जय जय जय रघुकुल केतू। भृगुपति गए बनहि तप हेतू।। #🌷शुभ रविवार #🎁चैटरूम: अर्न & लर्न🤑 #📢 ताज़ा खबर 🗞️ #🆕 ताजा अपडेट
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🙏परशुराम जयंती🪔📿 - vivo v4oe 04/127 vivo v4oe 04/127 - ShareChat
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🙏परशुराम जयंती🪔📿 - vivowoe 04/16/2026 00:06 vivowoe 04/16/2026 00:06 - ShareChat
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💐फेयरवेल पार्टी - ShareChat
#😱दिल्ली में डबल मर्डर, मचा हड़कंप🗞️ "बोझ बन जाने से, याद बन जाना बेहतर है प्यारे।
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