आज के दौर में शायद बहुत कम लोग उनका नाम जानते हों। नई पीढ़ी के लिए वह केवल पुराने जमाने की एक अभिनेत्री हो सकती हैं। लेकिन एक समय ऐसा था जब लाखों लोग उन्हें सिर्फ अभिनेत्री नहीं, बल्कि देवी का अवतार मानते थे। उनके सामने लोग सिर झुकाते थे। उनके दर्शन को सौभाग्य समझते थे। यहां तक कि सिनेमाघरों में उनकी तस्वीर आते ही लोग हाथ जोड़कर प्रार्थना करने लगते थे।
सोचिए, एक कलाकार की लोकप्रियता कितनी बड़ी रही होगी कि लोग पर्दे पर निभाए गए किरदार और वास्तविक जीवन के बीच का अंतर ही भूल गए। लेकिन क्या आप जानते हैं कि वही अभिनेत्री अपने जीवन के अंतिम वर्षों में अकेलेपन, बीमारी और दर्द से लड़ रही थीं? और उन्होंने अपनी अंतिम विदाई के लिए ऐसी इच्छा जताई थी, जिसे सुनकर हर कोई भावुक हो गया था।
यह कहानी है हिंदी सिनेमा की उस अभिनेत्री की, जिसे दुनिया ने "संतोषी माता" के रूप में पूजा और जिसने जीवन के आखिरी दिनों में अपने चेहरे को दुनिया से छिपा लिया था।
बर्मा के जंगलों से शुरू हुई थी एक असाधारण यात्रा
17 जनवरी 1939 को अनीता गुहा का जन्म बर्मा के एक छोटे से इलाके में हुआ था। उनके पिता ब्रिटिश भारत में वन अधिकारी थे। नौकरी के कारण परिवार लगातार अलग-अलग स्थानों पर रहता था। अनीता का बचपन दार्जिलिंग, सुंदरवन और पूर्वोत्तर भारत के कई हिस्सों में बीता।
फिर आया देश विभाजन का दौर। हालात बदले और परिवार कोलकाता आकर बस गया। यहीं से अनीता की शिक्षा पूरी हुई। वह बेहद खूबसूरत थीं और कॉलेज के दिनों में ही मॉडलिंग की दुनिया में पहचान बनाने लगी थीं। कहा जाता है कि उन्होंने "मिस कलकत्ता" का खिताब भी जीता था। लेकिन उस समय किसी ने नहीं सोचा था कि यह लड़की एक दिन करोड़ों लोगों की आस्था का केंद्र बन जाएगी।
15 साल की उम्र और किस्मत बदल देने वाला प्रतियोगिता मंच
साल 1952 में मुंबई के मशहूर कारदार स्टूडियो ने एक बड़े टैलेंट कॉम्पिटीशन का आयोजन किया। देशभर से हजारों युवाओं ने हिस्सा लिया। अनीता भी कोलकाता से मुंबई पहुंचीं।
कहा जाता है कि उन्होंने प्रतियोगिता के लगभग हर दौर में शानदार प्रदर्शन किया। हालांकि बाद में इस प्रतियोगिता के विजेता को लेकर अलग-अलग दावे सामने आए। लेकिन अनीता हमेशा कहती रहीं कि विजेता ट्रॉफी उन्हें मिली थी।
किस्मत उनके दरवाजे पर दस्तक दे चुकी थी। कॉन्ट्रैक्ट भी साइन हो गया था। लेकिन तभी उनकी मां ने उन्हें मुंबई भेजने से मना कर दिया। मजबूरी में उन्हें वह सुनहरा अवसर छोड़ना पड़ा। शायद किसी और के लिए यह सपना टूटने जैसा होता, लेकिन अनीता ने हार नहीं मानी।
बंगाली फिल्मों से हिंदी सिनेमा तक का संघर्ष
मुंबई का रास्ता बंद हुआ तो अनीता ने बंगाली फिल्मों में काम शुरू कर दिया। उनकी पहली फिल्म "बांशेर केल्ला" थी। लेकिन उनका सपना हिंदी फिल्मों में काम करने का था।
उसी दौरान अभिनेता ओमप्रकाश की नजर उन पर पड़ी। उन्होंने अनीता की प्रतिभा पहचानी और उन्हें मुंबई आने के लिए प्रेरित किया। आखिरकार 1955 में फिल्म "तांगा वाली" से उन्होंने हिंदी सिनेमा में कदम रखा।
लेकिन यह सफर आसान नहीं था। शुरुआती दिनों में उन्हें बी-ग्रेड फिल्मों में काम करना पड़ा। कई बार उन्हें ऐसे किरदार मिले, जिन्हें वह खुद भी नहीं करना चाहती थीं। फिर भी उन्होंने मेहनत जारी रखी। उन्हें विश्वास था कि एक दिन उनका समय जरूर आएगा।
जब पर्दे पर बनीं सीता माता
साल 1957 अनीता गुहा के करियर का निर्णायक मोड़ साबित हुआ। उन्हें फिल्म "पवनपुत्र हनुमान" में सीता माता का किरदार निभाने का अवसर मिला।
उनकी सादगी, चेहरे की मासूमियत और अभिनय ने दर्शकों का दिल जीत लिया। लोग उन्हें सिर्फ अभिनेत्री नहीं, बल्कि साक्षात सीता माता के रूप में देखने लगे।
इसके बाद "संपूर्ण रामायण", "श्री राम भरत मिलाप" जैसी कई पौराणिक फिल्मों में उन्होंने काम किया। धीरे-धीरे उनकी पहचान हिंदी सिनेमा की धार्मिक फिल्मों की सबसे विश्वसनीय अभिनेत्री के रूप में बनने लगी।
लोग उन्हें पत्र लिखते थे। आशीर्वाद मांगते थे। कई लोग उनके चरण छूने की कोशिश करते थे। लेकिन यह तो केवल शुरुआत थी।
वह फिल्म जिसने इतिहास बदल दिया
15 अगस्त 1975।
उसी दिन दो फिल्में रिलीज हुईं। एक तरफ थी विशाल बजट वाली "शोले" और दूसरी तरफ बेहद साधारण बजट की "जय संतोषी मां"।
शुरुआत में किसी को उम्मीद नहीं थी कि "जय संतोषी मां" कोई बड़ा चमत्कार करेगी। यहां तक कि अनीता गुहा खुद भी यह फिल्म करने को लेकर बहुत उत्साहित नहीं थीं। उन्हें संतोषी माता की कथा के बारे में ज्यादा जानकारी भी नहीं थी।
लेकिन निर्देशक विजय शर्मा के आग्रह पर उन्होंने फिल्म स्वीकार कर ली। उनका रोल बड़ा नहीं था। शूटिंग भी कुछ ही दिनों में पूरी हो गई।
फिर जो हुआ, उसने भारतीय सिनेमा का इतिहास बदल दिया।
जब सिनेमाघर मंदिर बन गए
फिल्म रिलीज हुई और धीरे-धीरे पूरे देश में इसकी चर्चा फैलने लगी। गांवों से लोग बैलगाड़ियों में भरकर फिल्म देखने आने लगे।
कई जगह दर्शक थिएटर में प्रवेश करने से पहले अपनी चप्पलें बाहर उतार देते थे। जैसे किसी मंदिर में प्रवेश कर रहे हों।
जब पर्दे पर अनीता गुहा संतोषी माता के रूप में दिखाई देतीं तो लोग हाथ जोड़ लेते थे। महिलाएं आरती उतारने लगती थीं। कुछ सिनेमाघरों में अगरबत्तियां तक जलाई जाती थीं।
फिल्म का प्रसिद्ध गीत "मैं तो आरती उतारूं रे संतोषी माता की" बजता तो पूरा हॉल भक्ति में डूब जाता था।
कहा जाता है कि लोग स्क्रीन पर सिक्के उछालते थे। कई दर्शक फिल्म खत्म होने के बाद भी सीटों से उठते नहीं थे।
एक अभिनेत्री के लिए इससे बड़ी लोकप्रियता शायद ही कोई हो सकती है।
लेकिन पर्दे के पीछे छिपा था गहरा दर्द
दुनिया उन्हें देवी मान रही थी। लेकिन वास्तविक जीवन में अनीता गुहा लगातार संघर्ष कर रही थीं।
उन्हें ल्यूकोडर्मा नाम की बीमारी थी। इस बीमारी के कारण उनके चेहरे पर सफेद दाग पड़ गए थे। कैमरे के सामने आने वाली अभिनेत्री के लिए यह बहुत बड़ा मानसिक आघात था।
इन दागों को छिपाने के लिए वह भारी मेकअप करती थीं। धीरे-धीरे उन्होंने सार्वजनिक कार्यक्रमों में जाना भी कम कर दिया।
उधर निजी जीवन में भी दुख कम नहीं थे। उन्होंने अभिनेता माणिक दत्त से विवाह किया था। लेकिन कुछ वर्षों बाद पति का निधन हो गया।
वह कभी मां नहीं बन सकीं। पति की मृत्यु के बाद उनका अकेलापन और गहरा होता गया।
अंतिम इच्छा जिसने सबको भावुक कर दिया
बीमारी और अकेलेपन के बीच भी अनीता गुहा ने कभी अपनी गरिमा नहीं छोड़ी।
एक इंटरव्यू में उन्होंने अपनी अंतिम इच्छा बताई थी। उन्होंने कहा था कि जब उनका अंतिम संस्कार किया जाए, तब उनके चेहरे पर पूरा मेकअप किया जाए।
वह नहीं चाहती थीं कि लोग उनके चेहरे के सफेद दाग देखें। शायद वह चाहती थीं कि दुनिया उन्हें उसी रूप में याद रखे, जिस रूप में उसने उन्हें प्यार दिया था।
20 जून 2007 को अनीता गुहा ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया।
कहा जाता है कि उनकी अंतिम इच्छा का सम्मान किया गया और अंतिम संस्कार से पहले उनका मेकअप किया गया।
एक अभिनेत्री नहीं, एक युग की याद
आज समय बदल चुका है। नई पीढ़ी शायद अनीता गुहा का नाम भी न जानती हो। लेकिन भारतीय सिनेमा के इतिहास में वह हमेशा उस अभिनेत्री के रूप में याद की जाएंगी, जिसे दर्शकों ने पर्दे पर देवी माना था।
उनकी कहानी केवल स्टारडम की कहानी नहीं है। यह संघर्ष, आस्था, लोकप्रियता और इंसानी दर्द की कहानी है।
एक तरफ लाखों लोगों की श्रद्धा थी। दूसरी तरफ अकेलेपन से भरा जीवन।
शायद यही वजह है कि अनीता गुहा की कहानी आज भी लोगों को भावुक कर देती है।
OLDISGOLDFILMS श्रद्धापूर्वक अनीता गुहा जी को नमन करता है और उनकी स्मृतियों को सहेजकर नई पीढ़ी तक पहुंचाने का प्रयास करता है।
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