खत के कोने पर अक्सर इक छोटा सजदा होता था।
बातें कम होती थीं लेकिन दिल में दरिया होता था।
थक कर जब सो जाते थे नीम की ठंडी छाँव में,
नींद सुहानी आती थी और मीठा सपना होता था।
दुनिया भर की सारी देवी साथ में चलती थीं,
जब तक माँ की मुट्ठी में
अपना कुनबा होता था।
बातों ही बातों में दुख-सुख की गाँठें खुल जाती थीं,
जब चूल्हे की आग के पास ही पूरा कुनबा होता था।
रातों को कमरे में भी इक नूर सा रहता था,
जब तक कोने वाले ताक़ में जलता दीया होता था।
सालों-साल गुज़र जाते थे बस इक ही सूरत तकते,
चिट्ठी के जब नीले काग़ज़ में कुछ लिखा होता था।
हाथ पकड़ने की हसरत में उम्र भी ढल जाती थीं,
महज़ दुपट्टा छू जाये तो कितना मस्त नशा होता था।
नाम हथेली पर लिखने की हिम्मत ही ना होती थी,
धड़कन की आवाज़ों में ही सारा किस्सा होता था।
शहर की ऊँची दीवारों ने 'सूरज' रस्ता रोक लिया,
गाँव में छोटा सा ही सही, वो खुला रस्ता होता था।
ग्रामीण परिवेश के उन पुराने सकून भरे लम्हों की यादों के साथ *शुभ रात्रि* मित्रों ✨️🪁💦
(बात कुछ यूँ है.. से साभार) #❤️Love You ज़िंदगी ❤️