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सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। अब देश के सभी निजी और प्राइवेट स्कूलों में लड़कियों को Free Sanitary Pads उपलब्ध कराना जरूरी होगा।
यह कदम Menstrual Hygiene को हर लड़की का मौलिक अधिकार मानने की दिशा में बड़ा बदलाव है, ताकि कोई भी लड़की अपनी पढ़ाई बीच में ना छोड़े।
सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा है कि अगर कोई Private School इस नियम का पालन नहीं करेगा, तो उसकी मान्यता रद्द की जा सकती है।
साथ ही, हर स्कूल में Girls और Boys के लिए अलग Toilet और Disability-Friendly Facilities भी अनिवार्य होंगी।
यह फैसला लड़कियों के health, dignity और education rights को मजबूत करने वाला एक महत्वपूर्ण कदम है।
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लखनऊ में जब पहली बार म्युनिसिपैलिटी के चुनाव हुए,
तो चौक से अपने ज़माने की मशहूर तवायफ़, महफ़िलों की रौनक और नज़ाकत की मिसाल — दिलरुबा जान — उम्मीदवार बनीं। उनके रुतबे और लोकप्रियता का ऐसा असर था कि कोई भी उनके मुक़ाबिल खड़ा होने को तैयार न हुआ।
उन्हीं दिनों चौक में एक नाम बड़े अदब से लिया जाता था — हकीम शम्शुद्दीन साहेब। दवाख़ाना भी था, शोहरत भी, और मरीज़ों की भीड़ भी। दोस्तों ने ज़ोर-ज़बरदस्ती उन्हें दिलरुबा जान के मुक़ाबिल मैदान-ए-इंतिख़ाब में उतार दिया।
दिलरुबा जान का प्रचार शबाब पर था। चौक में हर शाम महफ़िलें सजतीं, मशहूर नर्तकियाँ बुलायी जातीं, और हुजूम उमड़ पड़ता। उधर हकीम साहेब के साथ बस वही गिने-चुने दोस्त थे, जिन्होंने उन्हें इस आज़माइश में धकेला था।
हकीम साहेब खिन्न होकर बोले, “तुम लोगों ने तो मुझे पिटवा ही दिया, हार अब मुक़द्दर है।”
दोस्तों ने हिम्मत न हारी और एक नारा गढ़ा —
“है हिदायत चौक के हर वोटर-ए-शौक़ीन को, दिल दीजिए दिलरुबा को, वोट शम्शुद्दीन को!”
जवाब में दिलरुबा जान ने अपनी नज़ाकत से तराशा हुआ नारा दिया —
“है हिदायत चौक के हर वोटर-ए-शौक़ीन को, वोट दीजिए दिलरुबा को, नब्ज़ शम्शुद्दीन को!”
नतीजा वही हुआ जो लखनवी ज़ेहनियत से मेल खाता था। हकीम साहेब का नारा दिलों में उतर गया और वो चुनाव जीत गए।
लखनऊ की तहज़ीब देखिए कि दिलरुबा जान ख़ुद हकीम साहेब के घर तशरीफ़ लाईं, मुबारकबाद पेश की और मुस्कुराकर बोलीं —
“मैं इंतिख़ाब हार गई और आप जीते, मुझे इसका कोई मलाल नहीं। मगर आपकी जीत ने एक हक़ीक़त साबित कर दी है
‘लखनऊ में मर्द कम हैं, मरीज़ ज़्यादा
साभार अज्ञात #🎞️आज के वायरल अपडेट्स #🎤 आज के दिन का इतिहास #🌷भाजपा 🟠 #✋कांग्रेस 🔵 #🚲समाजवादी पार्टी👍
पटना में नीट की तैयारी कर रही जहानाबाद की छात्रा की संदिग्ध परिस्थितियों में हुई मौत के मामले ने अब एक नया मोड़ ले लिया है. अब इस प्रकरण में पुलिस द्वारा दी गई प्रारंभिक जानकारी और मेडिकल बोर्ड की विस्तृत पोस्टमार्टम रिपोर्ट के बीच बड़े अंतर सामने आए हैं.नीट छात्रा की संदिग्ध मौ त ने अब एक ऐसा राजनीतिक और प्रशासनिक तूफान खड़ा कर दिया है, जिसकी तपिश में कई रसूखदार चेहरे झुलस सकते हैं. मामला अब केवल एक छात्रा की मौ त का नहीं रह गया है, बल्कि यह एक हाई-प्रोफाइल 'कवर-अप' की कहानी बयां कर रहा है. स्थानीय लोगों और सूत्रों के अनुसार इस हॉस्टल के बाहर शाम ढलते ही लग्जरी गाड़ियों की लंबी कतारें लगा करती थीं. सवाल यह है कि उन गाड़ियों में कौन आता था और उनका इस हॉस्टल के भीतर क्या काम था? क्या इन हाई-प्रोफाइल चेहरों को बचाने के लिए ही पुलिस और डॉक्टरों ने 'सुसाइड' की झूठी पटकथा लिखी?शुरुआत में पटना के एएसपी सदर अभिनव कुमार और सीनियर एसएसपी कार्तिकेय शर्मा ने जिस तरह से इस मामले को 'नींद की गोलियों का सेवन' और 'सु साइड सर्च हिस्ट्री' से जोड़कर पेश किया, वह अब पोस्टमार्टम रिपोर्ट के सामने आने के बाद पूरी तरह बेनकाब हो गया है. पुलिस ने दावा किया था कि छात्रा के शरीर पर चोट के कोई निशान नहीं हैं. लेकिन पोस्टमार्टम रिपोर्ट ने जो हकीकत बयां की है, वह रूह कंपा देने वाली है. मृतका की गर्दन पर नाखूनों के निशान, दाहिनी जुगुलर नस में पंक्चर और शरीर के विभिन्न अंगों जैसे छा ती, जां घ और पीठ पर नीले निशान मिले हैं. सबसे भयानक बात यह है कि जननांगों यानी प्राइ वेट पार्ट पर मिली चोटें साफ तौर पर जबरन शारीरिक सं बं ध और द रिंदगी की ओर इशारा कर रही हैं.5 जनवरी की रात 9 बजे छात्रा ने अपने माता-पिता से सामान्य बातचीत की थी. उसने कहा था कि वह खाना खाने जा रही है. लेकिन 6 जनवरी को वह हॉस्टल के भीतर बेहोश पाई गई. इस दरमियान जो कुछ भी हुआ, वही इस मर्डर मिस्ट्री का केंद्र है. हॉस्टल की वार्डन नीतू ठाकुर ने लड़की के माता-पिता को सूचित करने के बजाय उसकी एक सहेली के पिता जो एक्स-सर्विसमैन हैं को फोन क्यों किया? माता-पिता से सच क्यों छिपाया गया? क्या इस बीच साक्ष्यों को मिटाने की कोशिश की गई?हॉस्टल के मालिक मनीष कुमार रंजन, संचालक श्रवण अग्रवाल और उनकी पत्नी नीलम अग्रवाल अब जांच के घेरे में हैं. मनीष कुमार रंजन की गिरफ्तारी तो हुई, लेकिन उसे रिमांड पर लेकर पुलिस ने कड़ी पूछताछ क्यों नहीं की? परिजनों का आरोप है कि मनीष रंजन के प्राइवेट बॉडीगार्ड्स अस्पताल में उन्हें घेरे रहते थे और नीलम अग्रवाल केस मैनेज करने की कोशिश कर रही थी. चित्रगुप्त नगर की थानेदार रोशनी कुमारी पर भी उंगलियां उठ रही हैं. क्या उन्होंने रसूखदारों के दबाव में आकर शुरुआती जांच को जानबूझकर कमजोर किया? क्या हॉस्टल की अन्य लड़कियों के बयान रिकॉर्ड किए गए?शाहजानंद क्लीनिक से लेकर प्रभात मेमोरियल अस्पताल तक इलाज के नाम पर जो खेल हुआ, वह संदिग्ध है. डॉक्टर सतीश की भूमिका और उनकी शुरुआती रिपोर्ट जिसमें चोट के निशान न होने की बात कही गई थी, अब संदेह के घेरे में है. मृतका के मामा ने बताया कि अस्पताल में जब लड़की को कुछ पलों के लिए होश आया, तो वह अपनी मां से कुछ कहना चाहती थी. जब मां ने पूछा कि क्या उसके साथ कुछ गलत हुआ है, तो उसकी आंखों से आंसू छलक पड़े. वह कुछ बोल नहीं पाई और फिर सदा के लिए खामोश हो गई. क्या उसे जबरन चुप कराने के लिए कोई इंजेक्शन दिया गया था?अब इस पूरे मामले की जांच आईजी जितेंद्र राणा के नेतृत्व में गठित एसआईटी (SIT) कर रही है. उनके सामने कई सुलगते सवाल हैं:
1-लड़की के वे कपड़े कहां हैं जो उसने वारदात के वक्त पहने थे?
2-मोबाइल फोन से डिलीट किया गया डेटा क्या राज उगलेगा?
3-हॉस्टल के रजिस्टर से अतिथियों के नाम गायब क्यों हैं?
4-हॉस्टल का गार्ड उस रात कहां था?
5-विसरा रिपोर्ट आने से पहले पुलिस ने सुसाइड का दावा कैसे किया?
6- सीसीटीवी शंभू गर्ल्स हॉस्टल के आगे में लगा है, लेकिन गली वाले गेट पर सीसीटीवी क्यों नहीं लगा था? क्या इसी गेट से आरोपी हॉस्टल के अंदर घुसे?
कुलमिलाकर एम्स के विशेषज्ञों की राय और फॉरेंसिक लैब की रिपोर्ट अब इस मामले में अंतिम कील साबित होगी. पटना पुलिस की साख दांव पर है. अगर उन लग्जरी गाड़ियों वाले हाई-प्रोफाइल चेहरों के नाम सामने नहीं आए, तो यह बिहार के सिस्टम पर सबसे बड़ा धब्बा होगा. एक मां अब भी अपनी बेटी के इंसाफ के लिए दर-दर भटक रही है, जबकि सिस्टम के कुछ पुर्जे आज भी दरिंदों को ढाल प्रदान कर रहे हैं. #🎞️आज के वायरल अपडेट्स #🔴 क्राइम अपडेट #📰 बिहार अपडेट #🚘अक्षय कुमार की कार का भयानक एक्सीडेंट 😱 #😢मशहूर फैशन डिजाइनर का निधन 🙏
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