अगर भरत भूषण तिवारी की जगह कोई और होता, तो शायद अब तक सत्ता और विपक्ष दोनों के नेताओं की प्रेस कॉन्फ्रेंस हो चुकी होती। टीवी डिबेट में चीख-पुकार मची होती। निष्पक्ष जांच की मांग पूरे देश में गूंज रही होती।
लेकिन यहां सवाल किसी जाति का नहीं, सवाल न्याय का है।
जिस देश में माओवादी और नक्सली तक हथियार डालकर सरेंडर करते हैं तो उन्हें कानून के तहत सुनवाई का मौका दिया जाता है, पुनर्वास की बात होती है…
तो फिर अगर भरत भूषण तिवारी ने वास्तव में हथियार छोड़ दिए थे, तो उन्हें अदालत तक पहुंचने का मौका क्यों नहीं मिला?
यह सवाल इसलिए भी बड़ा है क्योंकि आज मामला सिर्फ एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि कानून के राज पर भरोसे का है।
और हां, एक बात और…
अगर भरत तिवारी की जगह कोई भरत पासवान, भरत मांझी, भरत यादव, भरत पटेल या भरत खान होता, तो शायद न्याय की मांग करने वालों की कतार कहीं लंबी होती। #❤️Love You ज़िंदगी ❤️