Tripathi Pravin
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#📚कविता-कहानी संग्रह
📚कविता-कहानी संग्रह - &IIR पृष्ठ- जागरूकता अभियान देश काल को चाल देख कर, कदम मिलाना हो होगा। जो समाज के हित में हो बह, कदम ठठाना ही होगा।  सर्व बुराई दूर हो सकें, मिलकर सभी प्रयास करें। दीचारें जो करें विभाजित, उन्हें गिराना हरी होगा।२ बीज रोपते विद्वेषों के, उनसे रहेॅ सतर्क सदा। उनका असली रूप देश को, आज दिखाना हो होगा।३ भेदद भाच की गहरी खाईं॰ निहित स्वार्थ नित खींच रहे। भेड़ खाल में छिपे भेड़िये, चाहर लाना ह्ी होगा१४ शान देश कौ धूमिल करना, कुछ लोगों को फितरत है। आन राष्ट को हर कीमत पर, हमें बचाना ही होेगा।५ नहीं शिखर पर कोई चिना दिये बलिदानों को। प्हुचे, निज सवंस्व लुटाने को अब, आगे आना ही होगा।६ देशपरेम या राष्टवाद को, नित्व तिरंगा दर्शांता। गौरव से कोने ्कोने गें॰ ध्नज फहराना ही होगा।७ कर्नल प्रवीण त्रिपाठी , नोएडा  &IIR पृष्ठ- जागरूकता अभियान देश काल को चाल देख कर, कदम मिलाना हो होगा। जो समाज के हित में हो बह, कदम ठठाना ही होगा।  सर्व बुराई दूर हो सकें, मिलकर सभी प्रयास करें। दीचारें जो करें विभाजित, उन्हें गिराना हरी होगा।२ बीज रोपते विद्वेषों के, उनसे रहेॅ सतर्क सदा। उनका असली रूप देश को, आज दिखाना हो होगा।३ भेदद भाच की गहरी खाईं॰ निहित स्वार्थ नित खींच रहे। भेड़ खाल में छिपे भेड़िये, चाहर लाना ह्ी होगा१४ शान देश कौ धूमिल करना, कुछ लोगों को फितरत है। आन राष्ट को हर कीमत पर, हमें बचाना ही होेगा।५ नहीं शिखर पर कोई चिना दिये बलिदानों को। प्हुचे, निज सवंस्व लुटाने को अब, आगे आना ही होगा।६ देशपरेम या राष्टवाद को, नित्व तिरंगा दर्शांता। गौरव से कोने ्कोने गें॰ ध्नज फहराना ही होगा।७ कर्नल प्रवीण त्रिपाठी , नोएडा - ShareChat
#😎मज़ेदार पोस्ट 🤩
😎मज़ेदार पोस्ट 🤩 - মাননীয় নিভননা . बिना पत्थरों जल उछलता नहीं है 4 दिये काट जंगल बिना कुछ विचारे। मनुज का मगर पेट भरता नहीं है I५ धरा का सभी ने किया खूब दोहन। शिखर पर जमा मगर आह कास्वर हिम पिघलता नहीं है। निकलता नहीं है ।६ जिधर देखिये हिमालय हुआ त्रस्त हो रही छेड़खानी दिखता नहीं है१ এল যল ক্িনন বং प्रगति हेतु निर्माण टलता नहीं है ।७ रोज मानव नदी में न पानी दिवाकर बिना ताप मिलता नहीं है D नहीं कूप में जल। नहीं नीर का मूल्य मूढ़ मानव मगर समझता नहीं है ।८ तब तक जहां में। नदी में वो। जब तक प्रदूषण यहाँ दानवी रूप धारे बदलता नहीं है ।३ प्रकृति का क्षरण नदी बिन पहाड़ों के अब सँभलता नहीं है I कब बन सकी है। নমন্ধ সপ্সান সনীতা স্িপানী दस्तक प्रभात, पटना. মাননীয় নিভননা . बिना पत्थरों जल उछलता नहीं है 4 दिये काट जंगल बिना कुछ विचारे। मनुज का मगर पेट भरता नहीं है I५ धरा का सभी ने किया खूब दोहन। शिखर पर जमा मगर आह कास्वर हिम पिघलता नहीं है। निकलता नहीं है ।६ जिधर देखिये हिमालय हुआ त्रस्त हो रही छेड़खानी दिखता नहीं है१ এল যল ক্িনন বং प्रगति हेतु निर्माण टलता नहीं है ।७ रोज मानव नदी में न पानी दिवाकर बिना ताप मिलता नहीं है D नहीं कूप में जल। नहीं नीर का मूल्य मूढ़ मानव मगर समझता नहीं है ।८ तब तक जहां में। नदी में वो। जब तक प्रदूषण यहाँ दानवी रूप धारे बदलता नहीं है ।३ प्रकृति का क्षरण नदी बिन पहाड़ों के अब सँभलता नहीं है I कब बन सकी है। নমন্ধ সপ্সান সনীতা স্িপানী दस्तक प्रभात, पटना. - ShareChat