#श्री महाकाल शाही सवारी 2023
🛕꧁ जय द्वारकाधीश꧂🛕
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सोमनाथ पांचाल
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बर्बरीक दुनिया के सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर थे। बर्बरीक के लिए तीन बाण ही काफी थे जिसके बल पर वे कौरवों और पांडवों की पूरी सेना को समाप्त कर सकते थे। युद्ध के मैदान में भीम पौत्र बर्बरीक दोनों खेमों के मध्य बिन्दु एक पीपल के वृक्ष के नीचे खड़े हो गए और यह घोषणा कर डाली कि मैं उस पक्ष की तरफ से लडूंगा जो हार रहा होगा। बर्बरीक की इस घोषणा से कृष्ण चिंतित हो गए।
भीम के पौत्र बर्बरीक के समक्ष जब अर्जुन तथा भगवान श्रीकृष्ण उसकी वीरता का चमत्कार देखने के लिए उपस्थित हुए तब बर्बरीक ने अपनी वीरता का छोटा-सा नमूना मात्र ही दिखाया। कृष्ण ने कहा कि यह जो वृक्ष है इसके सारे पत्तों को एक ही तीर से छेद दो तो मैं मान जाऊंगा। बर्बरीक ने आज्ञा लेकर तीर को वृक्ष की ओर छोड़ दिया।
जब तीर एक-एक कर सारे पत्तों को छेदता जा रहा था उसी दौरान एक पत्ता टूटकर नीचे गिर पड़ा। कृष्ण ने उस पत्ते पर यह सोचकर पैर रखकर उसे छुपा लिया की यह छेद होने से बच जाएगा, लेकिन सभी पत्तों को छेदता हुआ वह तीर कृष्ण के पैरों के पास आकर रुक गया। तब बर्बरीक ने कहा कि प्रभु आपके पैर के नीचे एक पत्ता दबा है कृपया पैर हटा लीजिए, क्योंकि मैंने तीर को सिर्फ पत्तों को छेदने की आज्ञा दे रखी है आपके पैर को छेदने की नहीं।
उसके इस चमत्कार को देखकर कृष्ण चिंतित हो गए। भगवान श्रीकृष्ण यह बात जानते थे कि बर्बरीक प्रतिज्ञावश हारने वाले का साथ देगा। यदि कौरव हारते हुए नजर आए तो फिर पांडवों के लिए संकट खड़ा हो जाएगा और यदि जब पांडव बर्बरीक के सामने हारते नजर आए तो फिर वह पांडवों का साथ देगा। इस तरह वह दोनों ओर की सेना को एक ही तीर से खत्म कर देगा।
तब भगवान श्रीकृष्ण ब्राह्मण का भेष बनाकर सुबह बर्बरीक के शिविर के द्वार पर पहुंच गए और दान मांगने लगे। बर्बरीक ने कहा- मांगो ब्राह्मण! क्या चाहिए? ब्राह्मणरूपी कृष्ण ने कहा कि तुम दे न सकोगे। लेकिन बर्बरीक कृष्ण के जाल में फंस गए और कृष्ण ने उससे उसका शीश मांग लिया।
बर्बरीक द्वारा अपने पितामह पांडवों की विजय हेतु स्वेच्छा के साथ शीशदान कर दिया गया। बर्बरीक के इस बलिदान को देखकर दान के पश्चात श्रीकृष्ण ने बर्बरीक को कलियुग में स्वयं के नाम से पूजित होने का वर दिया। आज बर्बरीक को खाटू श्याम के नाम से पूजा जाता है। जहां कृष्ण ने उसका शीश रखा था उस स्थान का नाम खाटू है।
अनजाने रहस्य :
1. खाटू श्याम अर्थात मां सैव्यम पराजित:। अर्थात जो हारे हुए और निराश लोगों को संबल प्रदान करता है।
2. खाटू श्याम बाबा दुनिया के सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर हैं उनसे बड़े सिर्फ श्रीराम ही माने गए हैं।
3. खाटूश्याम जी का जन्मोत्सव हर साल कार्तिक शुक्ल पक्ष की देवउठनी एकादशी को बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है।
4. खाटू का श्याम मंदिर बहुत ही प्राचीन है, लेकिन वर्तमान मंदिर की आधारशिला सन 1720 में रखी गई थी। इतिहासकार पंडित झाबरमल्ल शर्मा के मुताबिक सन 1679 में औरंगजेब की सेना ने इस मंदिर को नष्ट कर दिया था। मंदिर की रक्षा के लिए उस समय अनेक राजपूतों ने अपना प्राणोत्सर्ग किया था।
5. खाटू श्याम मंदिर परिसर में लगता है बाबा खाटू श्याम का प्रसिद्ध मेला। हिन्दू मास फाल्गुन माह शुक्ल षष्ठी से बारस तक यह मेला चलता है। ग्यारस के दिन मेले का खास दिन रहता है।
6. बर्बरीक देवी के उपासक थे। देवी के वरदान से उसे तीन दिव्य बाण मिले थे जो अपने लक्ष्य को भेदकर वापस उनके पास आ जाते थे। इसकी वजय से बर्बरिक अजेय थे।
7. बर्बरीक अपने पिता घटोत्कच से भी ज्यादा शक्तिशाली और मायावी था।
8. कहते हैं कि जब बर्बरिक से श्रीकृष्ण ने शीश मांगा तो बर्बरिक ने रातभर भजन किया और फाल्गुन शुक्ल द्वादशी को स्नान करके पूजा की और अपने हाथ से अपना शीश काटकर श्रीकृष्ण को दान कर दिया।
9. शीश दान से पहले बर्बरिक ने महाभारत का युद्ध देखने की इच्छा जताई तब श्रीकृष्ण ने उनके शीश को एक ऊंचे स्थान पर स्थापित करके उन्हें अवलोकन की दृष्टि प्रदान की।
10. युद्ध समाप्ति के बाद जब पांडव विजयश्री का श्रेय देने के लिए वाद विवाद कर रहे थे तब श्रीकृष्ण कहा कि इसका निर्णय तो बर्बरिक का शीश ही कर सकता है। तब बर्बरिक ने कहा कि युद्ध में दोनों ओर श्रीकृष्ण का ही सुदर्शन चल रहा था और द्रौपदी महाकाली बन रक्तपान कर रही थी।
11. अंत में श्रीकृष्ण ने वरदान दिया की कलियुग में मेरे नाम से तुम्हें पूजा जाएगा और तुम्हारे स्मरण मात्र से ही भक्तों का कल्याण होगा।
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#श्री महाकाल शाही सवारी 2023
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उलूपी द्वारा अर्जुन को पुनर्जीवित करने की अद्भुत कथा
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महाभारत में अर्जुन के जीवन से जुड़ी अनेक रहस्यमयी घटनाएँ मिलती हैं, लेकिन उनमें से एक अत्यंत भावुक और अद्भुत प्रसंग है — नागकन्या उलूपी द्वारा अर्जुन को पुनः जीवित करना।
यह कथा प्रेम, श्राप, प्रायश्चित और पुनर्जन्म जैसे गहरे भावों से भरी हुई है।
अर्जुन का वनवास और उलूपी से भेंट
जब पांडव इंद्रप्रस्थ में रहते थे, तब एक नियम बनाया गया था कि यदि कोई भाई दूसरे भाई और द्रौपदी के एकांत में प्रवेश करेगा, तो उसे वनवास जाना होगा।
एक दिन एक ब्राह्मण सहायता के लिए अर्जुन के पास आया।
उसकी गायों को चोर ले गए थे। अर्जुन को अपने शस्त्र लेने पड़े, लेकिन वे उसी कक्ष में रखे थे जहाँ युधिष्ठिर और द्रौपदी उपस्थित थे।
धर्म की रक्षा के लिए अर्जुन वहाँ गए और बाद में स्वयं वनवास पर निकल पड़े।
यात्रा करते हुए वे गंगा नदी के तट पर पहुँचे।
वहाँ उन्होंने स्नान किया। उसी समय पाताल लोक की नागकन्या उलूपी ने उन्हें देखा।
उलूपी अत्यंत सुंदर, तेजस्विनी और मायावी शक्तियों वाली नाग राजकुमारी थीं।
वे अर्जुन के रूप, तेज और वीरता पर मोहित हो गईं।
उलूपी अर्जुन को पाताल लोक ले गई
उलूपी ने अपनी नाग शक्ति से अर्जुन को जल के भीतर खींच लिया और उन्हें पाताल लोक ले गईं।
अर्जुन आश्चर्यचकित रह गए।
तब उलूपी ने विनम्रता से कहा—
“हे पार्थ! मैं आपसे प्रेम करती हूँ।
कृपया मुझे स्वीकार करें।”
अर्जुन पहले संकोच में पड़े, क्योंकि वे वनवासी ब्रह्मचर्य का पालन कर रहे थे।
लेकिन उलूपी ने समझाया कि उनका व्रत केवल द्रौपदी के संदर्भ में था, अन्य विवाहों पर नहीं।
अंततः अर्जुन ने उलूपी को स्वीकार किया।
कुछ समय बाद उनसे एक पुत्र उत्पन्न हुआ, जिसका नाम इरावान रखा गया।
इरावान आगे चलकर कुरुक्षेत्र युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुआ।
भीष्म पितामह का वध और श्राप
कुरुक्षेत्र युद्ध में भीष्म पितामह को पराजित करना लगभग असंभव था।
वे इच्छामृत्यु वाले महान योद्धा थे।
श्रीकृष्ण की योजना से अर्जुन ने शिखंडी को आगे करके भीष्म पर बाण चलाए।
भीष्म शिखंडी पर अस्त्र नहीं उठाते थे, क्योंकि वे उन्हें स्त्री मानते थे।
अर्जुन के बाणों से भीष्म शरशय्या पर गिर पड़े।
हालाँकि यह धर्मयुद्ध की आवश्यकता थी, फिर भी भीष्म के दिव्य भाई — वसु — इससे अप्रसन्न हुए।
उन्होंने अर्जुन को श्राप दिया—
“जिस प्रकार तुमने छलपूर्वक भीष्म का वध किया है, उसी प्रकार तुम्हें भी अपने ही पुत्र के हाथों मृत्यु प्राप्त होगी।”
उलूपी को इस श्राप का ज्ञान था।
अश्वमेध यज्ञ और बभ्रुवाहन
महाभारत युद्ध समाप्त होने के बाद युधिष्ठिर ने अश्वमेध यज्ञ करने का निश्चय किया।
उस यज्ञ के घोड़े की रक्षा का दायित्व अर्जुन को मिला।
घोड़ा अनेक राज्यों में घूमता हुआ मणिपुर पहुँचा।
मणिपुर वही राज्य था जहाँ अर्जुन ने पहले राजकुमारी चित्रांगदा से विवाह किया था।
चित्रांगदा और अर्जुन का पुत्र था — बभ्रुवाहन।
जब बभ्रुवाहन को पता चला कि अर्जुन आए हैं, तो वे विनम्रता से उनका स्वागत करने पहुँचे।
लेकिन उलूपी वहाँ पहले से उपस्थित थीं।
वे जानती थीं कि अर्जुन को श्राप से मुक्त करने का समय आ चुका है।
उलूपी ने बभ्रुवाहन को युद्ध के लिए प्रेरित किया
उलूपी ने बभ्रुवाहन से कहा—
“तुम क्षत्रिय हो।
यदि अश्वमेध का घोड़ा तुम्हारे राज्य में आया है, तो तुम्हारा धर्म है कि तुम युद्ध करो।”
बभ्रुवाहन पहले संकोच में थे, क्योंकि सामने उनके पिता थे।
लेकिन धर्म पालन के लिए उन्होंने युद्ध स्वीकार किया।
पिता और पुत्र का भयंकर युद्ध
इसके बाद अर्जुन और बभ्रुवाहन के बीच भयंकर युद्ध हुआ। ⚔️
दोनों महान धनुर्धर थे।
बाणों की वर्षा होने लगी।
धरती काँप उठी और आकाश युद्ध की गर्जना से भर गया।
अंततः बभ्रुवाहन ने एक दिव्य बाण चलाया, जो सीधे अर्जुन के हृदय में लगा।
अर्जुन भूमि पर गिर पड़े।
उनका शरीर निश्चल हो गया।
चित्रांगदा का विलाप
जब चित्रांगदा ने अर्जुन को मृत देखा, तो वे रोने लगीं।
बभ्रुवाहन भी अत्यंत दुखी हुए।
उन्होंने कहा—
“मैंने अज्ञानवश अपने ही पिता का वध कर दिया!”
पूरा वातावरण शोक से भर गया।
उलूपी लाई दिव्य नागमणि
तब उलूपी आगे आईं।
उन्होंने बताया कि यह सब एक श्राप को समाप्त करने के लिए आवश्यक था।
इसके बाद वे पाताल लोक गईं और वहाँ से एक दिव्य नागमणि लेकर आईं।
वह मणि अत्यंत तेजस्वी थी।
उससे दिव्य प्रकाश निकल रहा था।
उलूपी ने वह नागमणि अर्जुन की छाती पर रख दी।
क्षणभर में चमत्कार हुआ—
अर्जुन के शरीर में फिर से प्राण लौट आए।
उन्होंने धीरे-धीरे आँखें खोलीं और उठ बैठे।
सभी अत्यंत प्रसन्न हो गए।
श्राप से मुक्ति
उलूपी ने अर्जुन को बताया—
“हे पार्थ! यह सब वसुओं के श्राप से मुक्ति दिलाने के लिए किया गया था।
अब आप उस दोष से मुक्त हो चुके हैं।”
अर्जुन ने उलूपी, चित्रांगदा और बभ्रुवाहन को प्रेमपूर्वक अपनाया।
इस प्रकार यह दुखद घटना अंततः मंगलमय बन गई।
इस कथा से मिलने वाली शिक्षाएँ
1. कर्म का फल अवश्य मिलता है
महान योद्धा अर्जुन को भी अपने कर्मों का परिणाम भोगना पड़ा।
2. श्राप भी कल्याणकारी हो सकता है
अर्जुन की मृत्यु वास्तव में उनके दोषों से मुक्ति का मार्ग बनी।
3. सच्चा प्रेम त्यागमय होता है
उलूपी ने अपने प्रिय अर्जुन के कल्याण के लिए कठिन निर्णय लिया।
4. धर्म पालन सर्वोपरि है
बभ्रुवाहन ने पुत्र धर्म से पहले क्षत्रिय धर्म निभाया।
अंत में यह कथा हमें सिखाती है कि ईश्वर की योजना मनुष्य की समझ से कहीं अधिक गहरी होती है।
जो घटना दुखद प्रतीत होती है, वही भविष्य में मुक्ति और कल्याण का कारण बन
सकती है।
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#श्री महाकाल शाही सवारी 2023
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सोमनाथ पांचाल
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हरे-कृष्ण-हरे-कृष्ण कृष्ण-कृष्ण-हरे-हरे
हरे-राम-हरे-राम राम-राम-हरे-हरे
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