Gautam Jadhav
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"जिस दिन समझ आया कि मैं खुद को ही ढो रहा था" कुछ बोझ ऐसे होते हैं जिनका वजन कंधों पर नहीं महसूस होता। वे चलते समय कदम नहीं रोकते, साँस नहीं फूलने देते, न ही किसी डॉक्टर की रिपोर्ट में दिखाई देते हैं। फिर भी वे इतने भारी होते हैं कि आदमी पूरी ज़िंदगी उन्हें उठाए-उठाए थक जाता है। मुझे हमेशा लगता था कि थकान काम की वजह से है। फिर लगा कि शायद जिम्मेदारियाँ ज़्यादा हैं। कुछ समय बाद मैंने लोगों को जिम्मेदार ठहराया। परिस्थितियों को भी। लेकिन एक दिन अचानक यह शक पैदा हुआ कि कहीं ऐसा तो नहीं कि मैं दुनिया को नहीं, खुद को ढो रहा हूँ। यह विचार किसी किताब से नहीं आया था। किसी गुरु ने भी नहीं बताया था। वह धीरे-धीरे पैदा हुआ था उन दिनों में जब कोई बड़ी समस्या नहीं थी, फिर भी भीतर एक अजीब बेचैनी बनी रहती थी। सब कुछ ठीक होने के बावजूद कुछ ठीक नहीं था। मैं वही काम कर रहा था जो हमेशा करता आया था। वही लक्ष्य, वही योजनाएँ, वही भागदौड़। बाहर से देखने वाला शायद कहता कि जीवन पटरी पर है। लेकिन भीतर जैसे कोई लगातार पूछ रहा था "अगर यह सब मिल भी गया, तो फिर क्या?" पहले मैं उस सवाल को अनसुना करता रहा। फिर उससे बहस की। फिर उसे गलत साबित करने की कोशिश की। लेकिन कुछ सवाल ऐसे होते हैं जो उत्तर मांगने नहीं आते। वे केवल यह दिखाने आते हैं कि जिस रास्ते पर हम चल रहे हैं, वह अब हमारे लिए पर्याप्त नहीं रह गया है। उसके बाद मैंने अपने भीतर एक अजीब चीज़ देखनी शुरू की। हर बार जब कोई मेरी तारीफ़ करता, मुझे अच्छा लगता, लेकिन वह अच्छा लगना बहुत देर तक नहीं टिकता था। हर उपलब्धि कुछ दिनों तक चमकती और फिर सामान्य हो जाती। हर मंज़िल के बाद अगली मंज़िल सामने खड़ी मिलती। जैसे कोई अदृश्य प्यास हो जो पानी से नहीं भरती। बहुत बाद में समझ आया कि मैं सफलता नहीं खोज रहा था। मैं अपने बारे में एक कहानी बचाए रखने की कोशिश कर रहा था। एक कहानी जिसमें मुझे महत्वपूर्ण होना था। ज़रूरी होना था। कुछ विशेष होना था। और शायद उसी कहानी को बचाने में मेरी सबसे ज़्यादा ऊर्जा खर्च हो रही थी। यहीं से मेरी सबसे कठिन सीख शुरू हुई। क्योंकि किसी आदत को छोड़ना आसान है। किसी वस्तु को छोड़ना भी आसान है। लेकिन अपने बारे में बनाई हुई कहानी को छोड़ना यह किसी पुराने घर को छोड़ने जैसा नहीं, बल्कि अपनी ही त्वचा से बाहर निकलने जैसा होता है।यह शुरुआत अधिक मानवीय लगती है क्योंकि यह किसी सार्वभौमिक कथन से नहीं, बल्कि एक निजी अनुभव, आत्म-स्वीकृति और धीरे-धीरे खुलते एहसास से शुरू होती है। Gauti ✒️✒️ #🎭Whatsapp status
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ठुकरा दिया था तूने मुझे वो वक़्त याद कर उस वक़्त मेरी जाँ ज़मीं पर नहीं थी तू।। शुभ रात्रि ।।।। #🎭Whatsapp status
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सोमवार, 01/06/26 सुन यारा______ मेरी हर नज़र में बसी हो तुम..!! मेरी हर क़लम पे लिखी हो तुम..!! तुझे सोच लूँ तो ग़ज़ल मेरी..!! न लिख सकूँ तो वो ख्याल हो तुम..!! #🎭Whatsapp status
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अपनों के साथ अपना भी ख्याल रखा करो ये कोई नहीं कहेगा कि आप थक गयीं हैं आराम करो #🎭Whatsapp status
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रोमांस भी तो जरूरी है जिंदगी में, सिर्फ बातों से इश्क थोड़े बढ़ता है। तुम जिस रिश्ते से आना चाहो.आ जाना मेरे चारो तरफ़ मोहब्बत ही मोहब्बत है #🎭Whatsapp status
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"कष्ट करा पोटभर मिळेल" "विश्वास करा प्रेम मिळेल" "सेवा करा सुख मिळेल" "मदत करा फळ मिळेल" "कल्पना करा मार्ग मिळेल" "भक्ती कराआशिर्वाद मिळेल" "दोस्ती करा साथ मिळेल" "दान करा धन मिळेल" "आदर करा सन्मान मिळेल" "सत्कार करा संस्कार मिळेल" 🍁🍃🌿🌻🌿🌻🌿🍃🍁 "जिवनांत चांगल्या माणसांना शोधू नका" "स्वतः चांगले व्हा" "कोणीतरी तुम्हाला नक्की शोधत येईल".... 🌹🙏🚩सुप्रभात 🚩🙏🌹 🙏🌹🚩 मेरी दोस्त राणी 🚩🌹🙏 #🎭Whatsapp status
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हो जाऊ तुमसे दूर फिर मौहब्बत किससे करूं...!! तुम हो जाओ नाराज फिर शिकायत किससे करूं...! इस दिल में कुछ भी नहीं तुम्हारी चाहतों के सिवा...!! अगर तुम्हें ही भूला दूं तो फिर प्यार" किससे करूं...!! #🎭Whatsapp status
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मकान जले तो बीमा ले सकते हैं सपने जले तो क्या किया जाए... आसमान बरसे तो छाता ले सकते हैं आँख बरसे तो क्या किया जाए... शेर दहाड़े तो भाग सकते हैं अहंकार दहाड़े तो क्या किया जाए... काँटा चुभे तो निकाल सकते हैं कोई बात चुभे तो क्या किया जाए... दर्द हो तो गोली(medicine)ले सकते हैं वेदना हो तो क्या किया जाये... एक अच्छा मित्र एक दवा जैसा ही होता है 🌹🙏सुप्रभात🙏🌹 🙏🌹Meri Dost Rani 🙏🌹 #🎭Whatsapp status
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