Ram Das ( राम जी का दास )
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भक्ति,अहिंसा,मेहनत,वैराग्य ही खुशहाली के मार्ग है।
#🙏🏻आध्यात्मिकता😇 : --- अगर किसी व्यक्ति को पता हो कि उसके पास मृत्यु से पहले केवल 30 दिन बचे हैं — संत कबीर दास जी के अनुसार उसे क्या करना चाहिए? संत कबीर दास जी कहते हैं कि मृत्यु कभी भी आ सकती है। इसलिए जो काम अंतिम 30 दिनों में करना चाहिए, वही काम हर दिन करना चाहिए। फिर भी अगर किसी को यह ज्ञात हो जाए कि अब केवल 30 दिन शेष हैं, तो कबीर साहेब की शिक्षा बहुत स्पष्ट है। --- 1. झूठे मोह और लगाव को छोड़ देना संत कबीर दास जी साहेब कहते हैं कि यह शरीर, धन, घर-परिवार और मान-सम्मान — सब नश्वर हैं। ---> “माटी कहे कुम्हार से, तू क्या रोंदे मोहे” अर्थ: जिस शरीर को तुम सँवारते हो, वही एक दिन मिट्टी बन जाएगा। अंतिम दिनों में व्यक्ति को चाहिए कि: धन और संपत्ति का मोह छोड़ दे ज़रूरत से ज़्यादा चीज़ें दान कर दे पुराने झगड़े सुलझा ले सभी को क्षमा करे और स्वयं भी क्षमा माँगे --- 2. अहंकार (मैं–पन) को समाप्त करना संत कबीर दास जी साहेब के अनुसार अहंकार ही सबसे बड़ी बाधा है। ---> “जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि हैं मैं नाहिं” अर्थ: जब तक “मैं” हूँ, तब तक ईश्वर नहीं। अंतिम समय में: अपने सही-गलत की जिद छोड़ दें पद, ज्ञान, धर्म या जाति का घमंड न रखें स्वयं को छोटा और सरल बना लें --- 3. ईश्वर के नाम का स्मरण करना (नाम-सिमरन) संत कबीर दास जी साहेब कहते हैं कि मृत्यु के बाद केवल ईश्वर का नाम ही साथ जाता है। ---> “राम नाम रस पीजिए, छूटे माया रोग” यहाँ “राम” का अर्थ किसी एक धर्म का देवता नहीं, बल्कि निराकार परम सत्य है। अंतिम दिनों में: कम बोलें व्यर्थ बातों से दूर रहें मन ही मन ईश्वर का स्मरण करें --- 4. दिखावे के कर्मकांड छोड़कर सच्चे मन से भक्ति संत कबीर दास जी साहेब बाहरी पूजा-पाठ के विरोधी थे। ---> “पाथर पूजे हरि मिले, तो मैं पूजूं पहाड़” अर्थ: अगर पत्थर पूजने से भगवान मिलते, तो पहाड़ ही पूज लेते। इसलिए: डर से किए गए कर्मकांड न करें ईश्वर से सौदेबाज़ी न करें सच्चे मन से समर्पण करें --- 5. मृत्यु से डरना नहीं संत कबीर दास जी साहेब कहते हैं कि मृत्यु से डरना व्यर्थ है। ---> “जो आया सो जाएगा, राजा रंक फकीर” अर्थ: जो जन्मा है, उसे जाना ही है — चाहे राजा हो या भिखारी। जो व्यक्ति: ईश्वर को याद करता है अहंकार छोड़ देता है उसके लिए मृत्यु शांति होती है, सज़ा नहीं। --- 6. अपने कर्मों को स्वीकार करना अंतिम समय में: “मेरे साथ ही ऐसा क्यों?” यह न पूछें दुख और पीड़ा को शांति से स्वीकार करें ईश्वर पर दोष न डालें संत कबीर दास जी साहेब कहते हैं — स्वीकार करने से दुख कम हो जाता है। --- 7. मौन और आत्म-चिंतन अंतिम दिनों में: शांति से बैठें विचारों को आते-जाते देखें बीते हुए जीवन से चिपकें नहीं भविष्य की चिंता छोड़ दें यह अभ्यास आत्मा को शरीर से सहज रूप से अलग होने में सहायता करता है। --- संत कबीर दास जी की अंतिम शिक्षा यदि कबीर साहेब एक ही बात कहें, तो वह यह होगी: ---> “सांई इतना दीजिए, जा में कुटुंब समाय” अर्थ: जीवन में संतोष, विनम्रता और समर्पण रखो। --- सारांश (संक्षेप में) संत कबीर दास जी के अनुसार, मृत्यु से पहले के 30 दिनों में व्यक्ति को: मोह छोड़ देना चाहिए अहंकार समाप्त करना चाहिए ईश्वर का नाम स्मरण करना चाहिए सबको क्षमा करना चाहिए मृत्यु से न डरना चाहिए हर परिस्थिति स्वीकार करनी चाहिए जो व्यक्ति जीते-जी “मैं” को छोड़ देता है, उसके लिए मृत्यु बंधन नहीं, मुक्ति बन जाती है । ---
#🥑हेल्दी फूड : आसान तरीका : जब आप नाम सिमरन ( ईश्वर रब खुदा सिमरन – मन से याद करना – कर ले उसके बाद यह नाश्ता आप खा सकते है । ) कठीन तरीका : फल का सेवन करें । अनाज का नही । --- अंकुरित मूंग और अंकुरित चने को नाश्ते में खाने की आसान, देसी और रोज़मर्रा की विधियाँ दी गई हैं । सभी तरीके घर पर जल्दी बनने वाले हैं । --- अंकुरित मूंग और चने के नाश्ते बनाने के तरीके 1. सादा अंकुरित सलाद अंकुरित मूंग + अंकुरित चना थोड़ा नमक, नींबू चाहें तो प्याज़, टमाटर डालें --- 2. गुड़ वाला अंकुरित मिक्स अंकुरित मूंग + चना कद्दूकस किया गुड़ ऊपर से तिल या मूंगफली --- 3. नमकीन अंकुरित चाट अंकुरित मूंग-चना थोड़ा नमक, नींबू, भुना जीरा हल्की मीठी चटनी (वैकल्पिक) --- ज़रूरी टिप्स अंकुर ज़्यादा बड़े न हों सुबह खाली पेट या हल्के नाश्ते में उत्तम ---
#🥑हेल्दी फूड : नीचे दिए गए है “Raw Jaggery Mix” ( कच्चा गुड़ वाला नाश्ता/भोजन ) recipe को आसानी से बनाने की विधि बताई गई है । --- कच्चा गुड़ वाला मिक्चर (Raw Jaggery Mix) रेसिपी : सामग्री (~500 ग्राम के लिए) कैटेगरी सामग्री मात्रा तैयारी की टिप्स मूंगफली/नट्स मूंगफली 50 ग्राम कच्ची, छिली हुई बादाम 40 ग्राम कच्चे, काट लें काजू 30 ग्राम कच्चे, काट लें अखरोट 30 ग्राम कच्चे, छोटे टुकड़े करें बीज तिल (सिसम) 20 ग्राम कच्चा कद्दू के बीज (पम्पकिन) 20 ग्राम कच्चे, छिले हुए सूरजमुखी के बीज 20 ग्राम कच्चे, छिले हुए अलसी (Flax seeds) 15 ग्राम हल्का पीस लें चिया बीज 10 ग्राम पानी में 10 मिनट भिगो सकते हैं अनाज ओट्स (Rolled oats) 50 ग्राम कच्चे मूँगफली 50 ग्राम खाने के लिए तैयार अंकुरित मूंग 40 ग्राम 1–2 दिन अंकुरित करें अंकुरित काबुली चना 30 ग्राम 1–2 दिन अंकुरित करें राजगीरा (अमरनाथ) 20 ग्राम कच्चा या पॉप किया हुआ रागी (Finger millet) 20 ग्राम अंकुरित या भिगोया हुआ मिठास गुड़ 150 ग्राम कद्दूकस किया हुआ या पाउडर । --- बनाने की विधि 1. अनाज और दाल की तैयारी: मूंग, चना और रागी को रात भर (8–12 घंटे) भिगो कर अंकुरित करें। पानी निकाल दें। अलसी को हल्का पीस लें ताकि पोषक तत्व आसानी से मिलें। तिल, कद्दू और सूरजमुखी के बीज भी स्वादानुसार मिलाए । 2. सभी सामग्री मिलाएं: नट्स, बीज, ओट्स और अंकुरित दाल को एक बड़े बाउल में अच्छी तरह मिलाएं। 3. गुड़ डालें: गुड़ को अच्छी तरह मिलाएं ताकि सारे नट्स और बीजों पर चिपक जाए। 4. सर्व या स्टोर करें: इसे डायरेक्ट मिक्स के रूप में खा सकते हैं या बार की तरह ट्रे में दबाकर रख सकते हैं। एयरटाइट कंटेनर में 1–2 हफ्ते तक कमरे के तापमान पर स्टोर कर सकते हैं। --- खाने के तरीके 2–3 या अधिक चम्मच एनेर्जी स्नैक के रूप में। --- टिप: स्वाद के लिए इसमें दालचीनी पाउडर, इलायची या चुटकी भर नमक डाल सकते हैं— सभी कच्चे खाने के लिए ठीक हैं। ---
#🙏🏻आध्यात्मिकता😇 : संत कबीरदास जी की शिक्षाएँ बहुत ही गहरी और व्यवहारिक हैं। उन्होंने जीवन में बार-बार गलतियाँ करने वाले व्यक्ति के लिए न केवल चेतावनी दी है बल्कि सुधार और आत्मज्ञान के रास्ते भी सुझाए हैं। उनके विचारों और नसीहतों को विस्तार यह है । --- संत कबीरदास जी की नसीहतें – बार-बार गलतियाँ करने वाले व्यक्ति के लिए 1. सत्य की राह अपनाओ संत कबीरदास जी कहते हैं कि हमेशा सच बोलो और सच की राह पर चलो। झूठ और छल से बचो, क्योंकि यही आपकी गलतियों का मूल कारण बनता है। 2. अहंकार को त्यागो स्वयं को बड़ा या दूसरों से श्रेष्ठ समझना गलतियों को जन्म देता है। संत कबीरदास जी कहते हैं: “अहंकार से बड़ा कोई शत्रु नहीं।” 3. सकारात्मक सोच अपनाओ बार-बार गलतियाँ करने वाला व्यक्ति नकारात्मक सोच में फँसा होता है। संत कबीरदास जी बताते हैं कि मन की शुद्धि और सकारात्मक दृष्टिकोण से ही सुधार संभव है। 4. अंतर्मुखी ध्यान और आत्मचिंतन करो अपने कर्मों और विचारों का निरंतर मूल्यांकन करो। संत कबीरदास जी कहते हैं: “जो भीतर देखता है, वही सच देख पाता है।” 5. सत्संग और अच्छे संगति का महत्व अच्छे लोगों और संतों के संग में रहो। बुरे संग से बुराई बढ़ती है और सुधार कठिन होता है। 6. क्रोध और लोभ से बचो क्रोध और लालच बार-बार गलतियों की वजह बनते हैं। संत कबीरदास जी कहते हैं कि यह दोहरी आग है, जो मन को जलाती है। 7. क्षमा और धैर्य का अभ्यास करो अपनी गलतियों के लिए खुद को क्षमा करो, पर उन्हें दोहराने से बचो। धैर्य से जीवन में सुधार संभव है। 8. ईश्वर और आत्मा पर भरोसा रखो हर गलती के बाद ईश्वर की शरण में जाना और आत्मा की शुद्धि का प्रयास करना चाहिए। संत कबीरदास जी कहते हैं: “ईश्वर का नाम जपो, मन का दर्पण साफ करो।” 9. साधु का मार्ग अपनाओ संतों और विद्वानों की शिक्षा को अपनाना चाहिए। संत कबीरदास जी कहते हैं कि गुरु और साधु से सीखना मानव को सही राह दिखाता है। 10. अतीत को भूलो और वर्तमान में सुधार करो बार-बार की गई गलतियों में फँसकर पछताने की बजाय, वर्तमान में सही कर्म करना ज़रूरी है। 11. काम, क्रोध, मोह से बचो यह तीन दोष मनुष्य को बार-बार गिराते हैं। संत कबीरदास जी ने कहा: “काम क्रोध मोह का त्याग कर, आत्मा का प्रकाश पाओ।” 12. अहंकार और लोभ छोड़कर सेवा करो दूसरों की मदद करने से और निस्वार्थ भाव रखने से मन का बोझ हल्का होता है। 13. नियमित आत्म-अवलोकन करो रोज़ अपने कर्मों और विचारों का निरीक्षण करना चाहिए। संत कबीरदास जी कहते हैं: “मन का काम जाँचो, तब ही जीवन सफल होगा।” 14. संगति और भाषा पर नियंत्रण रखो बुरी संगति और कठोर शब्द बोलने से भी गलतियाँ बढ़ती हैं। 15. ज्ञान और अनुभव से सीखो बार-बार गलती करने वाला व्यक्ति ज्ञान और अनुभव से सीखकर सुधर सकता है। संत कबीरदास जी का संदेश है: “सिखो वही, जो सही राह दिखाए।” --- संक्षेप में: संत कबीरदास जी बार-बार गलती करने वाले व्यक्ति को यही सलाह देते हैं कि वह सत्य, धैर्य, अहंकार त्याग, ईश्वर भक्ति, साधु संग और आत्म-निरीक्षण अपनाए । इससे न केवल गलतियाँ कम होंगी बल्कि मन और जीवन दोनों की शुद्धि होगी। --- अध्यात्मिक शब्दों की संत कबीरदास जी के दृष्टिकोण और सिद्धांतों के अनुसार परिभाषा दिए गए है । --- 1. सत्य परिभाषा (संत कबीरदास जी के अनुसार): सत्य का अर्थ है मन, वचन और कर्म में सच होना। संत कबीरदास जी के अनुसार, सत्य केवल बोलने या दिखावे का विषय नहीं है, बल्कि अंदर से सच्चा और निर्मल होना है। सत्य का पालन करने वाला व्यक्ति ईश्वर के निकट होता है। ---> उदाहरण: कबीर कहते हैं – “सत्य का पालन कर, संसार में तू उजियार।” --- 2. धैर्य परिभाषा (संत कबीरदास जी के अनुसार): धैर्य का अर्थ है कठिनाइयों और चुनौतियों में संयम रखना और बिना क्रोध या चिंता के कर्म करना। कबीरदास जी कहते हैं कि मनुष्य का मन स्थिर रहे, तभी वह आध्यात्मिक उन्नति कर सकता है। धैर्य मन की शक्ति है जो सत्य और भक्ति की राह पर टिकाए रखता है। ---> उदाहरण: “धीरज राखो, मन को मत हिलाओ; समय आने पर फल स्वतः मिलेगा।” --- 3. अहंकार त्याग परिभाषा (संत कबीरदास जी के अनुसार): अहंकार त्याग का अर्थ है स्वयं को बड़ा समझने, दूसरों को नीचा आंकने और स्वार्थ में फँसने से मुक्त होना। संत कबीरदास जी कहते हैं कि अहंकार मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है। जब अहंकार छोड़ देते हैं, तभी मन और आत्मा का प्रकाश जागृत होता है। ---> उदाहरण: “जहाँ मैं त्यागा, वहाँ राम दिखे।” --- 4. ईश्वर भक्ति परिभाषा (संत कबीरदास जी के अनुसार): ईश्वर भक्ति का अर्थ है हर कार्य और विचार में परमात्मा को याद रखना और उसकी शरण में रहना। संत कबीरदास जी के अनुसार, भक्ति केवल मंदिर या पूजा तक सीमित नहीं है; सच्ची भक्ति वह है जो कर्म, वचन और विचारों में झलकती है। ---> उदाहरण: “नाम जप, काम छोड़, मन को शुद्ध कर।” --- 5. साधु संग परिभाषा (संत कबीरदास जी के अनुसार): साधु संग का अर्थ है संतों, ज्ञानी लोगों और निस्वार्थ व्यक्तियों के संग में रहना। संत कबीरदास जी कहते हैं कि बुरे संग से मन भ्रष्ट होता है, जबकि साधु संग ज्ञान, भक्ति और सुधार की दिशा में मार्गदर्शन करता है। ---> उदाहरण: “साधु की संगति ज्यों उजियारा, अंधकार मिटे सब धरा।” --- 6. आत्म-निरीक्षण परिभाषा (संत कबीरदास जी के अनुसार): आत्म-निरीक्षण का अर्थ है अपने मन, विचार, भाव और कर्मों की गहराई से जांच करना। संत कबीरदास जी कहते हैं कि अपने अंदर झाँकने वाला व्यक्ति गलतियों को पहचानकर उन्हें सुधार सकता है, और वही सच्चे अर्थ में आध्यात्मिक प्रगति करता है। ---> उदाहरण: “मन का काम जाँचो, तब जीवन सफल हो।” --- सारांश: संत कबीरदास जी के अनुसार, ये सभी सिद्धांत एक-दूसरे से जुड़े हैं। सत्य पर चलो, धैर्य रखो, अहंकार त्यागो, ईश्वर भक्ति करो, साधु संग में रहो और आत्म-निरीक्षण करते रहो— यही जीवन और आत्मा की शुद्धि का मार्ग है। ---
#🙏🏻आध्यात्मिकता😇 : --- प्रतिष्ठा के पीछे भागने वाला इंसान अंत में मृत्यु के समय मूर्ख बन जाता है । मृत्यु का काम है इंसानों को प्रतिष्ठा का लालच दिखाकर मूर्ख बनाना । कभी भी प्रतिष्ठा मान समान के पीछे न भागे । ( मृत्यु हमारा पीछा कर रही है । हमे ईश्वर का मन से स्मरण करना चाहिए । हमे ईश्वर को मन से याद करना चाहिए । हमारे मन को ईश्वर का पीछा करना चाहिए । वरना बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ सकती है । मृत्यु तो अटल सत्य हैं । मृत्यु से बचा नही जा सकता है । जो पैदा हुआ है वह तो मरेगा । अगर हमे मरना नहीं है तो हमे पैदा भी नही होना चाहिएं । जन्म मरण चलता रहता है । किसी के मरने का अफसोस नही करना चाहिए । यह शरीर विष का पुतला है । इस विष के पुतले का सही उपयोग कर लीजिए इसके पहले की यह विष का पुतला आप से छीन लिया जाय । आपकी मर्जी हो य न हों यह विष का पुतला आप से आपकी मर्जी के बिना छीन लिया जायेगा । तब बाद में पछताने से कोई फायदा नही मिलेगा । इंसान में बुद्धि अक्ल नहीं होती है । अर्थ है बहुत ही कम बुद्धि और अक्ल होती है । जब भी समय मिले तो जीवन का क्या उद्देश्य है और जीवन कैसे जीना चाहिए इसके बारे में जानकारी प्राप्त करते रहे । और हमेशा याद रखे हम मूर्ख है । कम बुद्धि वाले और कम अक्ल वाले है । चींटी में जितनी अक्ल होती है हम इंसान में उतनी भी अक्ल नहीं है । इस कारण से हमे हमेशा जीवन का उद्देश्य क्या है और जीवन कैसे जीना चाहिए इसके बारे में जानकारी लेते रहे । समय को व्यर्थ बिताने वाले को तो जो सजा मिलती है उस बात को बताने का तो कोई फायदा ही नही है । वह तो समय के पार की कल्पना है । दुख कभी भी पीछा नही छोड़ेंगे ।) संत कबीर दास जी ने “status” यानी सामाजिक प्रतिष्ठा, पद या मान-सम्मान के बारे में बहुत स्पष्ट रूप से कहा है कि सामाजिक पहचान और दिखावा जीवन का उद्देश्य नहीं होता है । उनके अनुसार सच्चा जीवन मन, आचरण और भक्ति में है, न की बाहरी प्रतिष्ठा में व मान सम्मान की प्राप्ति में । इसे विस्तृत रूप में समझाया गया है: --- संत कबीरदास जी के अनुसार Status / प्रतिष्ठा 1. सामाजिक प्रतिष्ठा अस्थायी है – यह जन्म, संपत्ति या पद से तय होती है। 2. Status का मोह भ्रम है – बाहरी पहचान में खुश रहना आत्मज्ञान में बाधा डालता है। 3. सच्चा मान-सम्मान कर्म और गुण से आता है, जन्म या पद से नहीं। 4. दिखावा और दिखावटी शान अहंकार बढ़ाती है। 5. संत कबीर दास जी कहते हैं कि “जाति, धन और पद देखकर कोई बड़ा नहीं होता।” 6. जो व्यक्ति दूसरों की प्रशंसा की लालसा करता है, वह सच्चे ज्ञान से दूर है। 7. Status की इच्छा मन को बांधती है, जैसे बंधन। 8. सामाजिक मान-सम्मान केवल भ्रम और अहंकार पैदा करता है। 9. सच्चा संत या ज्ञानी किसी प्रतिष्ठा के पीछे नहीं भागता। 10. बाहरी पहचान से आत्मा की उन्नति नहीं होती। 11. मनुष्य की असली प्रतिष्ठा उसके चरित्र और आचरण में है। 12. धन, पद या शक्ति स्थायी नहीं होती; गुण और भक्ति स्थायी होती हैं। 13. Status को लेकर अहंकार करना अधर्मी और अशुद्ध है। 14. सच्चा आत्मज्ञानी समाज की नजर में छोटा या बड़ा मानता नहीं। 15. जो व्यक्ति केवल पद और प्रतिष्ठा चाहता है, वह जीवन का मूल उद्देश्य भूल जाता है। 16. सत्य और भक्ति में ही वास्तविक उच्चता है, न कि बाहरी सम्मान में। 17. संत कबीर दास जी कहते हैं कि ईश्वर की नजर में हर मनुष्य समान है। 18. बाहरी सम्मान पर भरोसा करना आत्मा की कमजोरी है। 19. Status के लिए किए गए कर्म निष्फल और अहंकारी होते हैं। 20. संत कबीर दास जी का संदेश: जीवन में सच्ची प्रतिष्ठा दिल की शुद्धता, कर्म की निष्ठा और भक्ति से आती है। --- सारांश बाहरी Status: जन्म, पद, संपत्ति, दिखावा – अस्थायी और भ्रमपूर्ण। असली Status: आचरण, गुण, प्रेम, भक्ति और ज्ञान – स्थायी और आत्मिक। संत कबीर दास जी के अनुसार सच्चा मान-सम्मान भगवान और समाज में किए गए अच्छे कर्मों से बनता है, न कि दिखावे या पद से। ---
#🙏🏻आध्यात्मिकता😇 : --- संत कबीर दास जी के अनुसार जीवन और मृत्यु केवल शारीरिक घटना नहीं, बल्कि आध्यात्मिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण विषय हैं। उन्होंने इसे गहरे दर्शन और भक्ति की दृष्टि से समझाया है। --- 1. जीवन (जीवन का संत कबीर दास जी के अनुसार अर्थ और दर्शन) 1. जीवन का उद्देश्य आत्मा का ज्ञान है। 2. जीवन केवल भौतिक सुख के लिए नहीं है। 3. जीवन में सच्चा धन सत्य, प्रेम और भक्ति है। 4. जीवन अस्थायी है, इसलिए क्षणिक आनंद में न उलझें। 5. जीवन का सही उपयोग कर्म और साधना में होना चाहिए। 6. जीवन में संयम और अनुशासन आवश्यक हैं। 7. जीवन में दूसरों के प्रति दया और सेवा महत्वपूर्ण है। 8. जीवन में अहंकार और लालच से बचना चाहिए। 9. जीवन में नाम-स्मरण (ईश्वर का स्मरण) मुख्य साधना है। 10. जीवन केवल शरीर का नहीं, बल्कि मन और आत्मा का भी है। 11. जीवन में आत्मशुद्धि पर ध्यान देना चाहिए। 12. जीवन में सच्चे मित्र और शिक्षकों का महत्व है। 13. जीवन में ज्ञान अर्जित करना आवश्यक है। 14. जीवन में भौतिक सुखों की बजाय मानसिक शांति को प्राथमिकता दें। 15. जीवन में मानवता और नैतिकता का पालन जरूरी है। 16. जीवन में समय का सदुपयोग करना चाहिए। 17. जीवन में अज्ञान और माया से बचना चाहिए। 18. जीवन में प्रेम और करुणा के भाव बनाए रखें। 19. जीवन में जन्म-मृत्यु चक्र का ज्ञान रखना चाहिए। 20. जीवन केवल शरीर के लिए नहीं, बल्कि आत्मा के विकास के लिए है। --- 2. मृत्यु (मौत के बारे में संत कबीर दास जी का दृष्टिकोण) 1. मृत्यु केवल शरीर का अंत है, आत्मा अमर है। 2. मृत्यु को भय की दृष्टि से नहीं देखना चाहिए। 3. मृत्यु जीवन का प्राकृतिक और अवश्यंभावी हिस्सा है। 4. मृत्यु से बचना असंभव है। 5. मृत्यु का डर मनुष्य को भटकाता है। 6. मृत्यु में शरीर मिटता है, कर्म और गुण शाश्वत रहते हैं। 7. मृत्यु से पहले किए गए कर्मों का फल मिलता है। 8. मृत्यु जीवन की अंतिम परीक्षा है। 9. मृत्यु में किसी का भौतिक बल काम नहीं आता। 10. मृत्यु जीवन की सार्थकता और कर्म पर आधारित है। 11. मृत्यु में ईश्वर की इच्छा सर्वोपरि है। 12. मृत्यु शांति और मुक्ति का द्वार भी है। 13. मृत्यु में अहंकार समाप्त हो जाता है। 14. मृत्यु में शरीर को छोड़कर आत्मा यात्रा करती है। 15. मृत्यु में नाम-स्मरण करने वाला शांति पाता है। 16. मृत्यु केवल परिवर्तन है, विनाश नहीं। 17. मृत्यु में जो मनुष्य भक्ति और प्रेम करता है, वही मुक्त होता है। 18. मृत्यु में धन और सत्ता का कोई काम नहीं आता। 19. मृत्यु जीवन का अंतिम सत्य और शिक्षा है। 20. मृत्यु को समझने वाला जीवन में भयमुक्त और संतुलित रहता है। --- सारांश जीवन: कर्म, भक्ति, प्रेम, सेवा और आत्मज्ञान के लिए अवसर। मृत्यु: शरीर का अंत, आत्मा की यात्रा, कर्मों का फल और मुक्ति का द्वार। संत कबीर दास जी कहते हैं कि जो जीवन में सच्चा ज्ञान और भक्ति अपनाता है, उसे मृत्यु में भय नहीं होता। ---
#🙏🏻आध्यात्मिकता😇 : --- संत कबीर दास जी ने तारीफ और प्रशंसा की लालसा ( भीख मांगने के समान है ) को नकारात्मक मानते हुए इसे अहंकार और आत्ममोह से जोड़ा है। उनके अनुसार सच्चा संत या ज्ञानी इंसान प्रशंसा में न उलझता है और न उसके लिए प्रयास करता है। इसे नीचे बिंदुवाद रूप में समझा जा सकता है: --- संत कबीर दास जी के विचार – तारीफ पाने की लालसा 1. तारीफ की लालसा मन को अहंकार से भर देती है। 2. व्यक्ति अपनी सच्चाई और सरलता खो देता है। 3. प्रशंसा पाने की इच्छा आत्ममोह का परिचायक है। 4. जो व्यक्ति दूसरों की नजरों में अच्छा दिखना चाहता है, वह भीतर से कमजोर होता है। 5. सच्चा संत बिना प्रशंसा के भी संत रहता है। 6. तारीफ के लिए किए गए कर्म शुद्ध नहीं होते। 7. लालच और स्वार्थ से प्रेरित कर्म मनुष्य को बंधन में डालते हैं। 8. दूसरों की तारीफ की तलाश में समय और ऊर्जा बर्बाद होती है। 9. आत्ममूल्य का ज्ञान होना चाहिए, दूसरों की राय पर निर्भर नहीं होना चाहिए। 10. संत कबीर दास कहते हैं कि “जहाँ मन में अहंकार है, वहाँ सच्चा ज्ञान नहीं हो सकता।” 11. दूसरों की तारीफ से खुशी अस्थायी होती है। 12. स्थायी संतोष और आत्मशांति प्रशंसा में नहीं, आत्मज्ञान में है। 13. सच्चा ज्ञानी अपने कर्मों में निष्ठावान होता है, परिणाम या पहचान की चिंता नहीं करता। 14. प्रशंसा की लालसा से व्यक्ति विनम्र नहीं रह पाता। 15. लालसा मन के स्थिर ध्यान और भक्ति को बाधित करती है। 16. संत कबीर दास जी ने कहा कि “संत माने वही, जो न जनता न जाने।” 17. प्रशंसा पाने की चाह में व्यक्ति ईश्वर की ओर से भटका रहता है। 18. सच्चा अनुशासन और भक्ति में आत्मकेंद्रितता होती है, बाहरी मान्यता में नहीं। 19. दूसरों की सराहना की अपेक्षा छोड़कर मन को स्वतंत्र बनाना चाहिए। 20. आत्मज्ञान ही असली पुरस्कार है, और प्रशंसा केवल बाहरी नाटक है। ---
#🙏🏻आध्यात्मिकता😇 : --- नीचे महात्मा गांधी जी के अहिंसा संबंधी विचारों पर प्रकाश डाला गया है: ( अहिंसा को समझे और अपने जीवन में अपनाए ) --- महात्मा गांधी जी के अनुसार अहिंसा 1. अहिंसा केवल हिंसा न करना नहीं है। 2. अहिंसा मन, वचन और कर्म तीनों से होती है। 3. अहिंसा सबसे बड़ा धर्म है। 4. अहिंसा कायरों का नहीं, वीरों का गुण है। 5. सच्ची शक्ति अहिंसा में निहित है। 6. हिंसा कमजोरी की निशानी है। 7. अहिंसा आत्मबल को बढ़ाती है। 8. अहिंसा सत्य का स्वाभाविक साथी है। 9. सत्य के बिना अहिंसा अधूरी है। 10. अहिंसा के बिना सत्य टिक नहीं सकता। 11. अहिंसा का अर्थ प्रेम और करुणा है। 12. शत्रु से भी प्रेम करना अहिंसा है। 13. अहिंसा में क्षमा का भाव होता है। 14. बदले की भावना अहिंसा के विपरीत है। 15. घृणा को घृणा से नहीं मिटाया जा सकता। 16. प्रेम से ही घृणा का अंत होता है। 17. अहिंसा आत्मसंयम सिखाती है। 18. अहिंसा से मन की शांति मिलती है। 19. अहिंसा व्यक्ति को नैतिक रूप से ऊँचा बनाती है। 20. अहिंसा चरित्र निर्माण का आधार है। 21. अहिंसा सामाजिक जीवन के लिए आवश्यक है। 22. अहिंसा से समाज में सद्भाव बढ़ता है। 23. अहिंसा लोकतंत्र की आत्मा है। 24. अहिंसा बिना स्वतंत्रता संभव नहीं। 25. स्वतंत्रता संग्राम का मुख्य हथियार अहिंसा था। 26. अहिंसा अन्याय के सामने चुप रहना नहीं है। 27. अन्याय का विरोध अहिंसा से भी किया जा सकता है। 28. सत्याग्रह अहिंसा का व्यावहारिक रूप है। 29. अहिंसा में साहस और धैर्य आवश्यक है। 30. अहिंसा से ही स्थायी परिवर्तन आता है। 31. अहिंसा सभी जीवों के प्रति सम्मान सिखाती है। 32. अहिंसा जीवन के प्रति श्रद्धा है। 33. पशु-पक्षियों के प्रति दया भी अहिंसा है। 34. अहिंसा का पालन कठिन है, पर श्रेष्ठ है। 35. अहिंसा आदर्श ही नहीं, व्यवहारिक भी है। 36. अहिंसा विश्व शांति का मार्ग है। 37. युद्ध समस्याओं का समाधान नहीं है। 38. अहिंसा से मानवता सुरक्षित रहती है। 39. अहिंसा से मनुष्य ईश्वर के निकट पहुँचता है। 40. अहिंसा मानव जीवन का सर्वोच्च मूल्य है। --- निष्कर्ष महात्मा गांधी जी के अनुसार अहिंसा कोई कमजोर नीति नहीं, बल्कि सबसे शक्तिशाली एवम आवश्यक नैतिक अस्त्र है। उनके लिए अहिंसा व्यक्ति, समाज और राष्ट्र—तीनों के उत्थान का मार्ग है। ---
#❤️जीवन की सीख : #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 : --- यहाँ महात्मा गांधी जी के अनुसार दैनिक जीवन, अनुशासन का अर्थ, और दैनिक अनुशासन के नियम को प्रस्तुत किया गया है। --- 1. गांधी जी के अनुसार रोज़ का दैनिक जीवन कैसा होना चाहिए महात्मा गांधी जी के अनुसार मनुष्य का दैनिक जीवन सत्य, सादगी और सेवा पर आधारित होना चाहिए। उनका मानना था कि अच्छा जीवन वही है जिसमें विचार, वचन और कर्म में एकता हो। गांधी जी के अनुसार: जीवन सरल और संयमित होना चाहिए हर कार्य सत्य और ईमानदारी से करना चाहिए दूसरों की सेवा को जीवन का उद्देश्य बनाना चाहिए श्रम (मेहनत) और आत्मनिर्भरता को अपनाना चाहिए उनका कहना था कि जैसा जीवन, वैसा चरित्र बनता है, इसलिए रोज़मर्रा की आदतें ही व्यक्ति को अच्छा या पतित बनाती हैं। --- 2. गांधी जी के अनुसार अनुशासन क्या है गांधी जी के अनुसार अनुशासन का अर्थ है — स्वेच्छा से स्वयं पर नियंत्रण रखना। उनके लिए अनुशासन: डर या दबाव से नहीं बल्कि आत्मसंयम और आत्मनियंत्रण से आता है गांधी जी मानते थे कि: सच्चा अनुशासन बाहर से नहीं थोपा जाता वह अंतरात्मा की आवाज़ से पैदा होता है अनुशासन का उद्देश्य चरित्र निर्माण है उनका प्रसिद्ध विचार है कि बिना अनुशासन स्वतंत्रता अराजकता बन जाती है। --- 3. गांधी जी के अनुसार दैनिक अनुशासन के नियम (दैनिक जीवन में अपनाने योग्य नियमों की सूची) गांधी जी स्वयं इन नियमों का पालन करते थे और दूसरों को भी प्रेरित करते थे: 1. सत्य बोलना और सत्य का पालन करना 2. अहिंसा का पालन करना (विचार, वचन और कर्म से) 3. प्रातः जल्दी उठना और समय का सदुपयोग 4. शारीरिक श्रम करना (जैसे सफाई, कामकाज) 5. सादा भोजन और सादा वस्त्र पहनना 6. स्वच्छता का विशेष ध्यान रखना 7. नशे और बुरी आदतों से दूर रहना 8. स्वावलंबी बनना (अपने काम स्वयं करना) 9. प्रार्थना और आत्मचिंतन करना 10. अनावश्यक इच्छाओं पर नियंत्रण रखना 11. सभी के प्रति प्रेम और सहिष्णुता रखना 12. समय पर सोना और समय पर उठना --- निष्कर्ष महात्मा गांधी जी के अनुसार: अनुशासित दैनिक जीवन ही सच्चे चरित्र का आधार है सत्य, अहिंसा, संयम और सेवा से जीवन महान बनता है अनुशासन केवल नियम नहीं, बल्कि जीने की सही पद्धति है ---