वसंत पंचमी, जिसे बसंत पंचमी, सरस्वती पूजा या वसंतोत्सव भी कहा जाता है। प्राचीनकाल से इसे ज्ञान और कला की देवी मां सरस्वती का जन्मदिवस माना जाता है और इसलिए हर साल बसंत पंचमी पर मां सरस्वती की विधिवत पूजा की जाती है।
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गणेश जयंती माघ शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को मनाई जाती है। ये त्योहार मुख्य रूप से महाराष्ट्र व कोंकण के तटीय क्षेत्रों में मनाया जाता है। इस दिन श्रद्धालु उपवास रखते हैं और शुभ मुहूर्त में विधि-विधान भगवान गणेश की पूजा करते हैं। इस त्योहार को महाराष्ट्र में माघ शुक्ल चतुर्थी, तिल कुंड चतुर्थी और वरद चतुर्थी के नाम से भी जाना जाता है।मान्यता है कि इसी दिन भगवान गणेश का जन्म हुआ था, इसलिए इसे उनके जन्म दिवस के रूप में मनाया जाता है.
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सालासर बालाजी -आज के दर्शन
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माघ माह के गुप्त नवरात्र शुरू हो रहे हैं. गुप्त नवरात्र रहस्यमय साधनाओं के लिए श्रेष्ठ माने जाते हैं. इस साल गुप्त नवरात्र 19 जनवरी से शुरू होकर 27 जनवरी तक रहने वाले हैं..
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उदयातिथि के अनुसार तिल द्वादशी और कूर्म द्वादशी व्रत 15 जनवरी को रखा जाएगा।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, तिल की उत्पत्ति भगवान विष्णु के पसीने से हुई है, इसलिए यह उन्हें अत्यंत प्रिय है। महाभारत में उल्लेख है कि इस दिन तिल दान करने वाला व्यक्ति कभी नरक के दर्शन नहीं करता..
पद्म पुराण के अनुसार, इस दिन तिल के प्रयोग और दान से जाने-अनजाने में हुए सभी पापों का नाश होता है। तिल द्वादशी पर तिल दान करने से व्यक्ति को अश्वमेध यज्ञ के समान पुण्य फल प्राप्त होता है। माना जाता है कि जो व्यक्ति इस व्रत को करता है, वह जन्म-जन्मांतर तक रोगों, जैसे कुष्ठ, अंधापन आदि से मुक्त रहता है।
हिन्दु पञ्चाङ्ग के अनुसार पौष शुक्ल द्वादशी को मनायी जाने वाली कूर्म द्वादशी के लगभग पन्द्रह दिवस पश्चात् आने वाली कृष्ण पक्ष द्वादशी को कृष्ण कूर्म द्वादशी कहा जाता है। कृष्ण कूर्म द्वादशी का नाम भगवान विष्णु के कूर्म अवतार पर आधारित है। पूर्वकाल में समुद्रमन्थन के समय जब मन्दराचल पर्वत समुद्र में डूबने लगा तब भगवान विष्णु ने कूर्म रूप में अवतरित होकर मन्दराचल को अपनी पीठ पर धारण किया था।
द्वादशी तिथि पर भगवान विष्णु की उपासना करने से मनुष्य का कल्याण हो जाता है। द्वादशी के दिन किये गये जप-तप, हवन-यज्ञ तथा दान आदि का अनेक गुणा फल प्राप्त होता है। प्राचीनकाल में विभिन्न ऋषियों एवं राजाओं ने अपने कष्टों के निवारण हेतु द्वादशी व्रत का अनुष्ठान किया है। विद्वानों ने इस व्रत को परम पुण्यदायक व्रत कहा है।
भविष्यपुराण में प्राप्त वर्णन के अनुसार इस द्वादशी का संयोग मूल नक्षत्र अथवा पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र से होने पर तिल द्वादशी नामक व्रत का पालन किया जाता है। पुराण में उल्लेख प्राप्त होता है कि तिल द्वादशी व्रत करने से मनुष्य किसी भी जन्म में अन्ध, बधिर, कुष्ठी आदि नहीं होता तथा सदैव आरोग्यवान रहता है।
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लगभग 23 सालों के बाद एक ही दिन पर षटतिला एकादशी और मकर संक्रांति पड़ रही है। मकर संक्राति और एकादशी एक दिन होने के कारण इसे अक्षय फल देने वाला माना जा रहा है।
सनातन धर्म में एकादशी व्रत को अत्यंत पुण्यदायी और कल्याणकारी माना गया है। यह तिथि भगवान श्रीहरि विष्णु को समर्पित होती है, जिनकी कृपा से जीव के समस्त पाप नष्ट होते हैं, जीवन के कष्ट दूर होते हैं और साधक मोक्ष की दिशा में अग्रसर होता है। माघ कृष्ण पक्ष की एकादशी को आने वाली षटतिला एकादशी विशेष रूप से दान, तप और करुणा का पर्व है। वर्ष 2026 में यह पावन व्रत भक्तों के लिए आध्यात्मिक उन्नति का एक अनुपम अवसर लेकर आ रहा है।
सनातन धर्म में एकादशी व्रत को अत्यंत पुण्यदायी और कल्याणकारी माना गया है। यह तिथि भगवान श्रीहरि विष्णु को समर्पित होती है, जिनकी कृपा से जीव के समस्त पाप नष्ट होते हैं, जीवन के कष्ट दूर होते हैं और साधक मोक्ष की दिशा में अग्रसर होता है। माघ कृष्ण पक्ष की एकादशी को आने वाली षटतिला एकादशी विशेष रूप से दान, तप और करुणा का पर्व है।
षटतिला एकादशी का नाम ही इसके विशेष महत्व को प्रकट करता है। ‘षट’ अर्थात छह और ‘तिला’ अर्थात तिल। इस दिन तिल का छह प्रकार से प्रयोग करने का विधान है।
तिल मिश्रित जल से स्नान,
तिल का उबटन लगाना,
हवन में तिल का प्रयोग,
तिल से तर्पण करना,
भोजन में तिल का सेवन ,
तिल का दान ..
शास्त्रों के अनुसार, तिल भगवान विष्णु को अत्यंत प्रिय है और इसका उपयोग करने से दरिद्रता का नाश, पापों का क्षय तथा सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है।
पुराणों में वर्णन मिलता है कि जो व्यक्ति इस दिन श्रद्धापूर्वक व्रत रखता है, तिल का दान करता है और श्रीहरि का स्मरण करता है, उसके पूर्व जन्मों के दोष भी समाप्त हो जाते हैं। षटतिला एकादशी मन, वचन और कर्म – तीनों स्तरों पर शुद्धि का पर्व है।
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माँ लक्ष्मी मंत्र
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सकट चौथ की शुभकामनाएँ
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कब है सकट चौथ व्रत
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