दिल-ए-डगर"
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इश्क के इस डगरी में तुम,
सुन लो भी एक आवाज!
मन चाहता है खोल भी दूँ,
मै दिल के अपने कुछ राज!
देखो तुम कुछ ऐसे जैसे,
मदहोश सी हो नजरें...
छा जाओ तुम फिर मन पे,
जैसे हो कोई खड़ी शराब!
खनके तुम्हारी कँगना कभी,
कहीं छमके तुम्हारी पायल...
रुनझुन बजता तब दिल हो,
कुछ ऐसे भी करो तुम बात!
ना बंदिशें हो कोई फिर,
ना ही हो कोई बहाना...
ये दिन अपनी बाँहों में,
और सुंदर सी हो ये रात!
छेड़ो भी तुम कुछ ऐसे जैसे,
बजता प्यारा सा कोई धुन...
बढ़ता हुआ धड़कन हो और,
फिर चढ़ती हुई हो हर साँस!
एक सुन्दर तुम कली सी,
बन जाओ अब कुछ ऐसे...
मन को मोह लो फिर यूँ,
जैसे खिलता हुआ गुलाब!
सपने आजाद हैं मेरे भी,
कुछ ख्वाहिशों के संग...
आसमान के तले पंछी मै,
और तुम रहो फिर मेरे यूँ साथ!💕💞
.....✍️रवि प्रताप सिंह("पंकज")🍒
🌳🌳🌳🌳मनमोहन🌳🌳🌳🌳
#🌹प्यार के नगमे💖 #❤️ आई लव यू #💝 शायराना इश्क़ #💔पुराना प्यार 💔 #❤️Love You ज़िंदगी ❤️
"आँखें"
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छेर ना हमको ऐसे कि,
घायल हो जाएँ तेरी बातों से।
दिल बहुत बेताब हो जाए,
तेरी नशीली सी इन आँखों से।
घबराहट सी हो जाती है,
तेरी मदहोसी भरी इन साँसो से।
बेचैनी सी भी होती है हमको,
तेरी उछलती कूदती यादों से।
होश ना रहता एकदम से ही,
तेरी आँखों के इन काजल से।
पागल सा हो जाता हूँ अकसर,
तेरी सुनहरी सी इन आँचल से।
कानों के ये झूमके तेरी,
लहराते हुए तेरे बालों से।
जान निकल जाते है हमरे,
तेरी खूबसूरत गहरी गालों से।
नाक की ये नथिया तेरी,
बिंदिये के छोटे दानों से।
मर ना जाएँ कही किसी दिन,
तेरी थिरकते होठो के चालों से।
धकधक धकधक धड़कन करते,
तेरी उलट-फेर के साथो से।
राहत भी नही मिलती है हमको,
इन काली काली रातों से।
मिठी-मिठी मुस्कानोँ से,
तेरी प्यारी-प्यारी बातों से।
छेर ना हमको ऐसे की हम,
घायल हो जाएँ तेरी आँखों से।
पगली पागल हो जाएँ तेरी....💕💞
......✍️ रवि प्रताप सिंह("पंकज")🍒
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"गुलनाड़"
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वो आई सड़ककर पास भी,
पर मुस्कुराई और गुजर गई....
हम सोचते रहे अब बात बनी और,
उसने पूछा ही लिया अब चाल कैसा है?
नाजुक सी हरएक कशिश,
और मन पागल हुए बैठे...
खूबसूरत से कली गुलजार रहे,
बस समझ न आया ये सवाल कैसा हैं?
गुलाबी मौशम में दिखने लगे,
खिलते हुए चमेली के फूल...
धड़कन धकधक करते रफ्तार में रहे,
आखिर ये जज्बाती ख्याल कैसा है?
जो मिल जाओ तो भी बेहाल,
और न मिलो तो भी बेहाल...
बदमाश हुआ ये दिल नासमझ,
आखिर पगले ये मलाल कैसा है?
साँझ के आड़े छुपी हुई हर भोर,
आसमान के उड़ते हुए परिंदे...
अनायास बड़बस ही पूछ बैठे,
सच-सच बताओ ये कमाल कैसा है?
बीते पतझर बारिस भी बीते,
गुजरती रही ठंढी सरद सलोनी...
पूरा नही तो कोई कुछ ही बता दे,
मौशम में फैलता ये गुलाल कैसा है?
टपकते आंखों के नूर चढ़े सर पे,
मन दौड़कर फिर दिल से पूछे....
गुड़ कुछ पिघले भी मीठे हुए,
ये बीतता हुआ साल-दर-साल कैसा है?
ख्वाबो के बारिश ख्वाबो में हुए,
फिर वही टूट गई कमसिन नींद....
पगली फिर खिलखिलाई जोरों से,
बताओ साहेब दिल का हाल कैसा है?
और बताओ....
साहेब दिल का अब हाल कैसा है?💕💞
........✍️रवि प्रताप सिंह("पंकज")🍒
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"महकता प्यार"
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बहती नदी दिल-ए-दरिया में,
अनोखी धार बाकी है!
गहरा समंदर तुम्हरा प्यार भरा,
महकता इजहार बाकी है!
बोलती तस्वीरें आजकल,
कुछ ज्यादा खुश नही हैं!
चाहतों के दरम्यान अभी,
सुनहरी सी दीवार बाकी है!
बड़ा सुकून है सच में,
यूँ साथ पाकर फकीरों के..
जिंदगी में राहगीर के अभी,
कीमती किरदार बाकी है!
बहुत बोझ डाल दिया है,
उसने यूँ ही सर पर मेरे...
सायं-सायं ही आजकल,
दो कदमों में रफ्तार बाकी है!
बड़े जिद पर तुम भी,
सर दबाने को अड़े हो..
सर बिछाने को शख्स,
कब से तैयार बाकी है!
यहाँ दिल में होकर भी,
कभी भेंट नही बातों में..
बीच जिंदगी के अभी भी,
लेटा हुआ हसीन बाजार बाकी है!
चलो भी हँसता खिलखिलाता,
कोई गुमसुदा ही सही...
दिल-ए-ताजमहल का अभी,
कोई देखासुना हकदार बाकी है!💕💞
......✍रवि प्रताप सिंह("पंकज")🍒
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"पूछता मन"
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पास आकर छू जाओ तुम,
मदमस्त मचलते लहरों सी...
हरदम दूर से भला दिल की,
उलझे हुए बात बताए कौन?
भला कैसे धडकता रहता है,
आजकल ये बेकाबू हरपल..
धड़कनों की आवाज यूँ,
हरपल ही अब सुनाए कौन?
हटाकर बचे हुए सिलवटें,
अपने हाँथों ही समझ लो..
दिल पे नाम किसके हैं भला,
हरबार ही अब दिखाए कौन?
चाहतों के डोर से आजकल,
जो बँधे हुए हैं हर साँसे...
फलक से उतर दरिया में,
डूबकर खुद ही जताए कौन?
कौंन है जो पलपल हमे,
बेबस-बेचैन किए बैठे है...
खुद बेताब है फिर दूसरे को,
बेबाकी में यूँ ही जलाए कौन?
अजनबी होते तो कुछपल को,
ऐसा-वैसा भी कर लेते..
मगर तुम तो अपने हो,
फिर यूँ ही ऐसे सताए कौन?
आँखों से उतर दिल मे जो,
बहुत ही गहरा हुए बैठे है..
जान हथेलियों पे रखकर,
साँसों को भला छुपाए कौन?
जब दिल मे ही रखकर कोई,
खुद के दिल मे ही डुबाए...
जान जोखिम में डालकर,
फूलों को हाँथ लगाए कौन?
हर रसगुल्ले की सकल जब,
गोलगप्पे सी लगे दिखने...
भला खिलखिलाते भी रहो,
कहकर अब मुस्कुराए कौन?💕💞
.........✍️रवि प्रताप सिंह("पंकज")🍒
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"सतरंगी"
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झिनी-झिनी इस परदे मे,
जबसे तुम यूँ रहती हो।
ये घुँघट मे चेहरा तुम्हरा,
बड़ी कयामत करती हो।
जैसे बिजली बिना तार के,
बे रोक-टोक बढ़ती हो।
बड़ी धार की छोटी कटारी,
दिल पे रगड़ती चलती हो।
बोलो कहाँ से सिखा तुमने,
यूँ ओझल सी हो जाना।
सामने होकर नजर ना आना,
जादूगरनी बन उलझाना।
जैसे नवेली कली खिली,
भौंरो सा सबका मँडराना।
जबरन ही फिर वश मे करती,
दिलपर फिर जोड़ चलाना।
कभी सड़कती है जो ये,
तुम्हरी प्यारी सी घुँघटिया।
करे दिवाना मन मोहे,
जब सड़के ये चुन्दरिया।
ऐ सलोनी ये तुम्हरी बनावट,
बिछ जाती है यूँ नजरिया।
करे बेहाल हर राही जन को,
जब लचकती तुम्हरी कमरिया।
जैसे तुमने छुपकर के,
राग-मोह सिखा है।
वैरागी भी अनुराग करे,
जो तीर-नयण खिंचा है।
जिसने देखा तुमको एकपल,
समय बेचैन ही बिता है।
जिसने पाया तुमको चित्त पे,
हरपल रसस्वप्न ही पिता है।
बसकर के जब हर धड़कन मे,
जो पीड़ हृदय पर रखती हो।
मचलता रहता बेचैन ये मन,
और ये प्रित जो तुम करती हो।
बात बढ़ाकर हमे तड़पाकर,
यूँ अनजानी बन रहती हो।
ऐ सतरंगी घुँघट मे चेहरा,
जो हमपर तुम मरती हो।
झिनी-झिनी इस परदे मे,
बड़ी कयामत करती हो।
झिनी-झिनी इस परदे मे,
तुम बड़ी कयामत करती हो....💕💞
.....✍️रवि प्रताप सिंह("पंकज")🍒
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"हम-तुम"
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सोचता हूँ मै कभी कभी,
कि तुम होती मेरे राहों मे।
मंद-मंद मुस्काता मै,
रास्तों के लंबी बाँहों मे।
थोड़ी सी घबरा के यूँ,
नजर झुका शर्माती तुम।
मै छेरता भौरे सा,
कली सी फिर इठलाती तुम।
कभी चमकती कभी छमकती,
नैनो से ओझल हो जाती फिर।
बात बढ़ा के साँस बढ़ा के,
सामने तुम आजाती फिर।
धीरे-धीरे बढ़ती तुम,
पिछे-पिछे आता मै।
इन नशीली अदा के आगे,
कही किधर खो जाता मै।
ना कोई शोर वहाँ,
ना ही कोई साथी होते।
दिल मे सिर्फ एक लहर होती,
एक दिल दो राही होते।
चोरी-चोरी फिर-फिर से चोरी,
दिल ही दिल से करते हम।
कोई ना कहता हमको कुछ भी,
एक दूजे पे ऐसे मरते हम।
नजर मिला के हमसे फिर,
सिने पे दबन बढ़ाती तुम।
मै सोचता रहता हूँ,
कभी कही से आजाती तुम।💕
सोचता हूँ मैं कभी-कभी.........💞
......✍️रवि प्रताप सिंह("पंकज")🍒
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"अल्हड़ यौवन"
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गोरे-गोरे से हसीन चेहरे वाली,
जबसे यूँ पलपल मुस्कुराने लगी है!
दिल अपना अब काबू में नही रहा,
अजकक वो कुछ यूँ इठलाने लगी है!!
सोंचता हूँ आज न देखूँगा पर,
वो यूँ अदाएँ दिखाने लगी है!
हर बार समझाता हूँ खुद को,
पर मन को यूँ भरमाने लगी है!!
नयन नक्स भी कुछ ऐसे कि,
पलपल बिजली गिराने लगी है!
कमर कमान संग चढ़ता यौवन,
घने-घने बादल बिखराने लगी है!!
गुलाबी होंठो की कसक ऐसी,
जानबूझ धड़कन बढ़ाने लगी है!
नथुनों की गर्मी गालों के गढे,
हर हथियार से ही सताने लगी है!!
इंसान ही हूँ आखिर कोई फकीर नही,
कैसे रोकूँ जो उभारों संग अँगराने लगी!
मैं जो घायल हो कहीं धड़कता मिलूँ,
दोष उसी का जो साँसों से टकराने लगी है!!
कबतक बचोगे प्यार के हर वार से,
रसभरी इशारों-इशारों में बताने लगी है!
कामनाओं के देवता माफ कर दें मुझे,
पगलीं यूँ मादक बन हमका तड़पाने लगी है!!💕💞
.........✍️रवि प्रताप सिंह("पंकज")🍒
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🌹इतनी खूबसूरत नजाकत कि
बिन पूछे ही इश्क कर बैठें,💕
❤️तरंगों की रानी सचमूच हसीन भी हो
और फिर लाजवाब हो तुम।💞
................✍रवि प्रताप सिंह("पंकज")🍒
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