"कायल"
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दिल प्यार के सुमार में हैं,
समय भी अपने सवाल में हैं...
अपने अंदाज को कुछ-कुछ,
इस तरह से समझाया उसने!
लब्ज बेकरार हैं यूँ भी की,
अब कुछ कह नही सकते...
धीरे से आँखें मारकर जो,
खामोशी से मुस्कुराया उसने!
निपट गए हैं काम सारे,
अब कुछ करीब भी आओ...
अपने नाजुक उंगलियों को,
फिर जो चटकाय उसने!
इतने पास हो तुम और,
फिर भी कोई खबर तक नही...
कुछ रोष में आकर ही जो,
बालों को झकझोर हिलाया उसने!
सो गए जमीन व आसमान,
मम्मी-पापा और घरके भी सब...
रुनझुन बनकर बारबार जो,
अपने झुमकों को छमकाया उसने!
बेबस हम और बेदर्दी तुम,
हर दोष ही मढ़ नजर से...
तीखे से खन खनाखन जो,
अपने कंगन को खनकया उसने!
समझते नही फिर से जो,
बहुत ही महंगा पड़ेगा तुम्हे...
तड़पकर आंखों से ही जो,
ओठ दबाकर ही धमकाया उसने!
किसी और को कहना फिर तुम,
अपने दिल के गुलाबी हाल...
जब मुँह फेरकर पायलों को,
बार-बार ही प्यार में छमछमाया उसने!
दिल कायल हो गया फिर से,
इस प्यारे से पागलपन पे...
जब गुलाबी गालों से रगड़कर,
आधीरात को प्यार से जगाया उसने!
हक दिखाकर अपनेपन में बारबार,
पगली बन मीठा-मीठा हो...
अपने गुलाबी अंदाज में ही,
इसबार भी देर राततक सताया उसने!!
प्यार बस इतना रहा क्या कहें,
दिल-धड़कन सब कायल हुए...
जहाँ तक दिखे निशान लिपिस्टिक के,
कुछ इस अंदाज में प्यार लुटाया उसने!
कुछ इस अंदाज में प्यार लुटाया उसने!💕💞
...........✍️रवि प्रताप सिंह("पंकज")🍒
🌳🌳🌳🌳🌳🌳मनमोहन🌳🌳🌳🌳🌳🌳
#💔पुराना प्यार 💔 #❤️ आई लव यू #🌹प्यार के नगमे💖 #💝 शायराना इश्क़ #❤️Love You ज़िंदगी ❤️
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नजर के जोर पे आजमाया न करो
अदाओं से सबकुछ चुराया न करो।
आदमी बेबस दिल कुछ काम न करे,
मीठे-मीठे तुम यूँ ही मुस्कुराया न करो।
***
जब-जब भी तुम अंजना बनकर,
आँखों से साँसों पे तकरार करती हो।
जान अंटक जाती है सीने में,
कसम से बहुत ही बेकरार करती हो।
***
कितना लूट लिया कोई हिसाब नही,
जिंदगी गुमसुम है कोई सवाल नही।
कमबख्त दिल भी यूँ खामोश बैठा है,
कलियों से होता है भौंरों का ख्याल नही।
****
घटाएँ आजकल जमकर बरसात करें,
पंखुड़ियाँ कुछ इस कदर बेकरार करें।
हवाएँ छूकर लबों को गजल गुनगुनाएँ,
चहकती पंछियाँ धुनों पे यूँ बेहिसाब करें।
****
बहुत ही जादूगरी है मौशम के,
करवट लेते इन अंगराइयों मे...
बिखरते हुए खुशबू पहुँच दिल तक,
धड़कन के हलचलों को बेसुमार करें!
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अब तुम ही बताओं कहाँ,
किस ख्वाबों में डूब जाएँ...
कोई दिल-ए-हाल समझ,
चाहतों संग कदमताल करे।
****
जब कोई चुपके-चुपके करीब आने लगे,
कोई हसीन पहुँच दिल मे हाँथ लगाने लगे।
तब शख्स पागल हो जाए और क्या करे,
जब कोई नजरों से इश्क कह खिलखिलाने लगे।💕💞
****
..........✍️रवि प्रताप सिंह("पंकज")🍒
🌳🌳🌳🌳🌳🌳मनमोहन🌳🌳🌳🌳🌳🌳
#💝 शायराना इश्क़ #❤️ आई लव यू #🌹प्यार के नगमे💖 #💔पुराना प्यार 💔 #❤️Love You ज़िंदगी ❤️
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चाहत के दामन में अबूझ,
चहकते हुए खुमार तुम्हे।।
नजरों के नोख पे पलकों के,
झपकते हुए सवाल तुम्हे।।
साँसों के बढ़ते और घटते,
बेकाबू हुए हर रफ़्तार तुम्हे।
उछलता कूदता मचलता ये,
गुदगुदाता दिल बेकरार तुम्हे।।
यूँ सादे पन्नों में ही लिख दिए,
हमने अपना इश्क बेसुमार तुम्हे।।💞
....✍️रवि प्रताप सिंह("पंकज")🍒
🌳🌳🌳🌳मनमोहन🌳🌳🌳🌳
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"Game of heart"
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A red flower with some green leaves,
Close suspense with deep smile,
Cross at front as cool as strangers,
Slowly jumping too striking feelings.
Firstly no one can judge simply,
What goes to mind and heart?
But the charms pleasants effects,
Shows the empathy & sympathy.
Hearts balloons can do anything,
Can fly can swipe can debite,
Then what will be at that time,
Sure heart will be try save me.
Oopps I mean the game of heart,
The place of green and hot coffee,
What's going on the roof & floors?
Swami save may farm pull & faith.
And Murugana also too me.......💕💞
................✍रवि प्रताप सिंह("पंकज")🍒
🌳🌳🌳🌳🌳🌳मनमोहन🌳🌳🌳🌳🌳🌳
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"अलबेली"
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बैठा रहता हूँ मै खामोशी मे,
और पिछे से तुम आती हो।
छूकर के बदन को हमरे,
यूँ ओझल क्यो हो जाती हो।
कभी सन्न सन्न शोर करे,
कभी सनासन बन जाती हो।
जैसे हृदय पे साँप लोटता,
ऐसे भाव कर जाती हो।
कभी कभी तो धीरे-धीरे,
कभी जोरों से बल खाती हो।
उष्ण बयार के शीतल स्पर्श से,
मन को व्याकुल यूँ कर जाती हो।
कहो किधर से आती हो,
और किधर को जाती हो।
थोड़ा-थोड़ा तड़पते हम है,
और थोड़ा ज्यादा तुम तड़पाती हो।1।
घनघोर घने घने पत्ते होते,
साथ मे मेरे गुनगुनाती तुम।
काश मै बड़ा कोई पेड़ ही होता,
चढ़कर डालों पे धूम मचाती तुम।
बहती फिर तुम जोरों से,
पत्तों संग शोर मचाती तुम।
खिंचता रहता मै जोर लगाकर,
छिटक कर हमसे खिलखिलाती तुम।
झूमेट मारती कभी उधर से,
कभी इधर से जोर लगाती तुम।
टूटने जैसा फिर हाल हो जाता,
फिर धीमे से हमे सहलाती तुम।
सर्दी होती या गर्मी होती,
बरसात मे ऐसे लुभाती तुम।
हरे भरे हो जाते हम भी,
कुछ ऐसे प्रित लूटाती तुम।2।
कभी गरजता कभी बरसता,
हँसी ठिठोली फिर हाथों हाथ।
जैसे मै कोई बादल होता,
उड़ते हम फिर साथ ही साथ।
या पतंग एक बड़ा सा होता,
उँचे आकाश मे खिल जाता मै।
अती वेग के दामन मे,
तुम्हरे हृदय से मिल जाता मै।
या नदी मे नौका होता,
पिछे से जोर लगाती तुम।
बड़े ही मदमस्त अंदाज से,
हमरे साथ निभाती तुम।
या कोई जो पंछी होता,
नजरों से नजर मिलाते हम।
छू जाती ये अंग-प्रत्यंग,
एक-दूजे मे डूब यूँ जाते हम।3।
सब समझ मे आता है,
पर तुम्हे समझ नही पाता हूँ।
ऐसी अदा दिखाती हो कि,
अपने-आप मे भी नही रह पाता हूँ।
मनोरम हो प्यारी हो तुम,
लगता जैसे तुम घरनी हो।
मन को वश मे कर लेती हो,
मै तो कहता हूँ तुम जादूगरनी हो।
ऐ हवा अलबेली मेरी,
तुम्हरी बात निराली है।
चूम ही लेता जो दिख जाती तुम,
हर चीज तुम्हारी मस्तानी है।
कहता हूँ कि प्रिय तुम्हरे,
स्पर्श से मै खो जाता हूँ।
कभी कही छुप जाती हो तो,
अपने को तन्हा पाता हूँ।💕
और संग जब होती हो तो,
सिर्फ तुम्हारा ही हो जाता हूँ।
पगली तुम्हारा ही हो जाता हूँ..💞
....✍️रवि प्रताप सिंह("पंकज")🍒
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"कामिनी"
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अभिलाषा और आकांक्षा के,
अंकन को मन पुलकित रहे...
अधरों के जो प्यास हमारे,
और तुम अधरों के ओट में!
कभी चित जिद पे ही बैठे,
कनक कलेवर कल्वित रह...
सानिध्य से सनिकट होकर,
तुम रहो अचल विश्वास में!
माया मोहन सुधर रहे,
कला कामिनी के आँचल से....
हृदय झूलता रहे ये हरदम,
तुम्हरे नूपुरों के झंकार में!
विशारद हो के कौन कहे,
मन के ही हैं अनुगामी हम...
पदचाप यूँ पहुंचे कानों को,
सोंच सतरंगी के साथ में!
करो सृंगार तुम फिर से,
सृजन जग को मोहित करे...
कामना चढ़कर नयणों पे,
सुधर पाने के प्रयास में!
चित को मन को बल मिले,
फूलों के सुगन्धित प्रसार को...
पूरित करो जो मन की होकर,
हरदम ही हृदय तुम्हरे प्यार में!
हरदम हृदय तुम्हरे अवकाश में..💕💞
....✍️रवि प्रताप सिंह("पंकज")🍒
🌳🌳🌳🌳मनमोहन🌳🌳🌳🌳
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मन के दर्पण में देखकर,
दिल को करार न आए!
गुलाब सी पंखुड़ियों पे,
यूँ भी ख्याल न आए!
अलबत्ता तुम्हे देख कर,
ओठों पर प्यास न आए!
इस दमकते खूबसूरती पे,
दिल से आवाज न आए!
एकबार तो वो खुदा भी,
गुनहगार हो जाए....
तुम्हरी हसीन अदाओं पर,
जो उसे भी यूँ प्यार न आए।💕💞
..... ✍️रवि प्रताप सिंह ("पंकज") 🍒
🌳🌳🌳🌳मनमोहन🌳🌳🌳🌳
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"दिल-ए-बेकरार"
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दिल के इस दाग का,
गहराइयों से हिस्सा है!
आजकल जिंदगी में,
अपना भी एक किस्सा है!
आदमी अकेला होकर,
भला क्या गुल खिलाएगा!
बगैर फूलों के भार के,
काँटा कहाँ पेड़ों पे मुस्कुरायेगा!
भला इश्क-ए-आग को,
कोई सागर क्या आजमाएगा!
यूँ कहीं चूड़ियाँ खनकेंगी तब,
पायल ही संग प्यास बुझाएगा!
मौशम के फूलों की खूशबू,
भर जाती हैं इन आंखों में....
फिर उतर कर यूँ जेहन में,
दिल को करते हैं बेकरार!
अपना दिल एक आईना है,
बस तुम्ही को देखे बार-बार!
जबतक देखे ना चैन नही,
जो देख ले तो....
फिर मीले दिल को करार!💕💞
.....✍️रवि प्रताप सिंह("पंकज")🍒
🌳🌳🌳🌳मनमोहन🌳🌳🌳🌳
#🌹प्यार के नगमे💖 #❤️ आई लव यू #💔पुराना प्यार 💔 #💝 शायराना इश्क़ #❤️Love You ज़िंदगी ❤️
-: कुछ बातें ठेठ देहाती अंदाज़ में :-
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:- दिमाग तो डरे हुए और
शौखिन लोग रखा करते हैं,
दिलों में उतरने के लिए तो बस
इश्क में डूबना भर ही काफी है!🤩
:- वो मंज़िल ही बेलगाम है,
जो सरककर पा नहीं सकते....
इश्क की भी विसात पगली
जो दिल-ए-नयाब को ठुकरा दे।😉
:- चाहे अकल कितनी भी तेज ह़ो,
नसीब के बिना नही जीत सकते।
दिमागी अकलमंद होने के बावजूद..
लोल दिलों पे राज नही कर पाते हैं।😋
:- बस लफ्जों से न कर
किसी के किरदार का फैसला,
गाढ़े वजूद मिटते बनते जाऍंगे
बस दिल-ए-हकीकत ढूंढते ढूंढते!😎
:- दिल में कुछ है तो
अब भी बता दे पगली,
इश्क बुढ़ापे में कर लेंगे
कुछ और इंतजार ही सही!!😍
:- अब जनाब मत पूछिए,
हद अनोखे गुस्ताखियों की।
आईना ज़मीं पर रखकर,
आसमां चूमने का हुनर रखते हैं।।😌
:- मुस्कान अभी वो ही है
"हंसी का गोलगप्पा" ही फोड़ा है हमने।
सारे शिकयत छोड़ दिए,
कुछ इस तरह से दिल को मोड़ा है हमने!😴
:- यूँ अपने तरीके से
जिन्दगी में आ तो गये,
मगर जरा ख्याल रखना।
भले याद चले जाएँगे..
पर जिंदगी से कभी जा नही पाओगे।🙃
:- सोचते हैं जान अपना दिल
बस मुफ्त में ही दे दें,
लोल इतने मासूम खरीददार से
मोलभाव क्या करना !!😇
:- लोल तेरी कलाकारीयों ने
ले लिए शरारतें मेरी,
और कम्बख्त लोग समझते हैं कि,
सुधर गया हूँ मैं...!!😉😍🤩
.....✍️Mgr. Er साह-जू-चेरूआ("मोर्गन")🍒
🌳🌳🌳🌳🌳🌳मनमोहन🌳🌳🌳🌳🌳🌳
#💝 शायराना इश्क़ #❤️ आई लव यू #i miss you 💞 #💔पुराना प्यार 💔 #❤️Love You ज़िंदगी ❤️
"अर्पण"
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अब खाली होकर भी हम,
भला खाली कैसे रह पाएँगे!
एक-एक होकर के एक जब,
फिर से कहकर हमको तड़पाएँगे!
अब कहाँ प्रेम को ढूँढो तुम,
कहाँ किधर को जाएँ हम!
सरकती हुई नजरों में भला,
कहो कैसे डूब जाएँ हम!
घबराती हुए धड़कन से,
दिल कैसे भला ये साथ करे!
सामने दिखे जो नयन ही फिरे,
अनजाने बन कैसे बात करें!
जान निकल रहे जान देखकर,
कुछ गलती जैसे कर बैठा हूँ!
लगा ऐसे जैसे कि हूँ दोषी मैं,
जबरन ही मन में घूँस बैठा हूँ!
फलक आंखों के सोंझे हो,
जब खुद ही कोई कतराने लगे!
सिमट कर अपने ही छाया में,
विवश होकर यूँ ही मुर्झाने लगे!
समझता है दिल भी अपना,
मर्यादाओं के शिखरों को भी!
प्रेम दर्पण के समक्ष जो कोई,
विह्वलता के कर अर्पण को भी!
भले कुछ मद्धिम है चाहत में,
जो अनुशासन के हैं भय-प्रीत!
पर उससे भी जो अच्छा है,
विरल सरल तुम हृदयी विनीत!
अधरों से अंजुलों से ख्यालों से,
हो आसपास उपकार जो यूँ करती हो!
यही बहुत है जीने को हँसकर,
जो सबकुछ देकर भी आहें भरती हो!
सबकुछ पाया है मैन पल में,
बस तुम्हरा ही मुझको पता नही!
है बेदर्दी ये उद्वेलित धड़कन,
किसी के बस में भी कभी ये हुआ नही!
बहुत दिनों ही बाद आज फिर,
किसी को देखदेख मुस्कुराया हूँ मैं!
बवाले हुए पाँव घूम-घूम कर,
पर हाँथों दिल बटोर कर लाया हूँ मैं!
सरल चित हो जबजब भी यूँ,
दिल को तुम कभी भी परेशान करो!
बस साँस लेकर गहरी-गहरी सी,
हमपर भी तनिक वहीं उपकार करो!
समय अवकाश के दर्पण को,
कह कुछ फिर से इतराएँगे!
पगपग बढ़कर फिर से कभी,
जब कहीं दूर भीड़ से पाएँगे!
खिले बसंत फिर पूछेंगे जब भी,
अधरों को हो अधरें टकराएँगे!
सकुचाते शर्माते मौशम भी,
आँखों के पानी पी मुस्काएँगे!
फिर से कभी...
कहीं किसी ख्वाबों में मुस्कुराएँगे!!!🌹
...........✍️रवि प्रताप सिंह("पंकज")🍒
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