नीलम जैन
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त्रिशला ग्रुप #जैन धर्म : jain dharm #🌺जय जिनेन्द्र🙏 #🙏जैन तीर्थंकर भगवान🪔 #🙏jain dharm 🙏 #जैन तीर्थंकर भगवान
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🌺जय जिनेन्द्र🙏 - a சa பa ~ # यिन जेन भारत 8e 4ంS0")  న ச9 81 ச சaி ச + Suurm3 ru a சசி ನಗ द्रव्यानुयोग n [ चरणानयीगा करणाानयोगा ~ पयमानयोग गन भारत 5 पुष्पदंत जी 5 भूतभली जी आचार्य आचार्य भारती -9 जेन भार बडात साच जैन धर्म के प्रथम ग्रंथ श्री बट्खण्डगम के रचना का पावन दिवस श्रुत पंचमी (जिनवाणी दिवस ) भारत ಭolc e रती delde নভান মোল भक्ति पात्र में जिनवचनामृत, श्रद्धा से जो पीते हैं। जन्म जरा से दूर अजर अविनाशी होकर जीते हैं।l जो पढ़ते हैं नित जिनवाणी दुख से ना घबराते हैें। क्षायिक नव लब्धि को पाकर पूर्णज्ञान पा जाते हैं।l a சa பa ~ # यिन जेन भारत 8e 4ంS0")  న ச9 81 ச சaி ச + Suurm3 ru a சசி ನಗ द्रव्यानुयोग n [ चरणानयीगा करणाानयोगा ~ पयमानयोग गन भारत 5 पुष्पदंत जी 5 भूतभली जी आचार्य आचार्य भारती -9 जेन भार बडात साच जैन धर्म के प्रथम ग्रंथ श्री बट्खण्डगम के रचना का पावन दिवस श्रुत पंचमी (जिनवाणी दिवस ) भारत ಭolc e रती delde নভান মোল भक्ति पात्र में जिनवचनामृत, श्रद्धा से जो पीते हैं। जन्म जरा से दूर अजर अविनाशी होकर जीते हैं।l जो पढ़ते हैं नित जिनवाणी दुख से ना घबराते हैें। क्षायिक नव लब्धि को पाकर पूर्णज्ञान पा जाते हैं।l - ShareChat
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जैन तीर्थंकर भगवान - श्रुत पंचमी की हार्दिक शुभकामनाएं [নতন্ন 5 अरे भाई मां के साथ जिनवाणी मांको भी सम्भाल कर रखना क्योकि एक जीवन देती है तो जीवन जीने की कला सिखाती है। दूसरी १९ जून जिनवाणी दिवस श्रुत पंचमी की हार्दिक शुभकामनाएं [নতন্ন 5 अरे भाई मां के साथ जिनवाणी मांको भी सम्भाल कर रखना क्योकि एक जीवन देती है तो जीवन जीने की कला सिखाती है। दूसरी १९ जून जिनवाणी दिवस - ShareChat
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🌺जय जिनेन्द्र🙏 - आत्मार्थी की faI @ मुझे इस पर्याय में मेरी आत्मा का कल्याण करना ही है | मेरी आत्मा का कल्याण जिनवाणी के अभ्यास से ही हो सकता है अतः मैं निरंतर जिनवाणी का अभ्यास करुंगा मैं जिनवाणी का अभ्यास आत्महित की भावना से ही करूंगा किसी लौकिक प्रयोजन की दृष्टि से नहीं | अन्य आत्मार्थी का चिंतन अनादि निधन वस्तुयें भिन्न भिग्न अपनी मर्यादा लिये हुये परिणमित होती हैं कोई किसी के आधीन नहीं है, कोई किसी के परिणमित कराने से परिणमित नहीं होती उन्हें परिणमित कराना चाह वह कोई उपाय नहीं है, वह तो मिथ्यादर्शन ही है | वस्तु की स्थिति सदैव एक जैसी नहीं है। रहती आत्मार्थी की faI @ मुझे इस पर्याय में मेरी आत्मा का कल्याण करना ही है | मेरी आत्मा का कल्याण जिनवाणी के अभ्यास से ही हो सकता है अतः मैं निरंतर जिनवाणी का अभ्यास करुंगा मैं जिनवाणी का अभ्यास आत्महित की भावना से ही करूंगा किसी लौकिक प्रयोजन की दृष्टि से नहीं | अन्य आत्मार्थी का चिंतन अनादि निधन वस्तुयें भिन्न भिग्न अपनी मर्यादा लिये हुये परिणमित होती हैं कोई किसी के आधीन नहीं है, कोई किसी के परिणमित कराने से परिणमित नहीं होती उन्हें परिणमित कराना चाह वह कोई उपाय नहीं है, वह तो मिथ्यादर्शन ही है | वस्तु की स्थिति सदैव एक जैसी नहीं है। रहती - ShareChat
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जैन धर्म : jain dharm - श्रुतपंचमी पर्व का महत्व जैन शासन में श्रुत पंचमी पर्व सबसे महान पर्व में से एक है इस तिथि को तीर्थंकर भगवान के उपदेश को मौखिक रूप से परिवर्तित करके अक्षर के रूप में शास्त्रों में , जिनवाणी में लिखा गया থা होने के मार्ग का तीर्थंकर भगवान समवशरण में मोक्ष का मार्ग, सुखी उपदेश देते है जो विश्व कल्याणकारी होता है होने का कल्याणकारी मार्ग नष्ट ना हो जाए इस चिंता के कारण  सुखी आचार्य धरसेन को इसे लिखने (लिपिबद्ध करने) का विचार आया आचार्य धरसेन ने मौखिक उपदेश देकर आचार्य पुष्पदंत और आचार्य को इसे लिपि के माध्यम से लिखने को कहा भूतबली इन दोनों आचार्य के माध्यम से षटखंडागम ग्रंथ लिखना प्रारंभ हुआ, इसी तिथि को षटखंडागम ग्रंथ की रचना पूर्ण हुई थी षटखंडागम ग्रंथ के मंगलाचरण में ही णमोकार मंत्र पहली बार लिखा है तब से आज तक तीर्थंकर भगवान के उपदेश सिर्फ जिनवाणी में सुरक्षित है, जिनवाणी में ही तीर्थंकर भगवान के मुक्ति प्रदान करने वाले महान वचन है हमारे सौभाग्य से और धरसेन आचार्य के कारण २५५० वर्ष बाद भी हमे तीर्थंकर के उपदेश सही सलामत मिले है इसीलिए यह दिवस प्रत्येक जैन बंधु ने बड़े उत्साह से मनाना  चाहिए जिनवाणी में महान रहस्यमय जिनेंद्र भगवान का संदेश है इसे हमें पंचम काल के अंत तक पढ़ना है और संभाल कर रखना है साडे अठारह हजार साल तक यदि कोई भव्य जीव आए तो उसे जिनवाणी पढ़कर मुक्ति का मार्ग और सुखी होने का मार्ग मिले यही भावना से हमने जिनवाणी को सदैव पढ़ना, सुनना, पढ़ाना और धर्म का मर्म सरक्षित रखना चाहिए श्रुतपंचमी पर्व का महत्व जैन शासन में श्रुत पंचमी पर्व सबसे महान पर्व में से एक है इस तिथि को तीर्थंकर भगवान के उपदेश को मौखिक रूप से परिवर्तित करके अक्षर के रूप में शास्त्रों में , जिनवाणी में लिखा गया থা होने के मार्ग का तीर्थंकर भगवान समवशरण में मोक्ष का मार्ग, सुखी उपदेश देते है जो विश्व कल्याणकारी होता है होने का कल्याणकारी मार्ग नष्ट ना हो जाए इस चिंता के कारण  सुखी आचार्य धरसेन को इसे लिखने (लिपिबद्ध करने) का विचार आया आचार्य धरसेन ने मौखिक उपदेश देकर आचार्य पुष्पदंत और आचार्य को इसे लिपि के माध्यम से लिखने को कहा भूतबली इन दोनों आचार्य के माध्यम से षटखंडागम ग्रंथ लिखना प्रारंभ हुआ, इसी तिथि को षटखंडागम ग्रंथ की रचना पूर्ण हुई थी षटखंडागम ग्रंथ के मंगलाचरण में ही णमोकार मंत्र पहली बार लिखा है तब से आज तक तीर्थंकर भगवान के उपदेश सिर्फ जिनवाणी में सुरक्षित है, जिनवाणी में ही तीर्थंकर भगवान के मुक्ति प्रदान करने वाले महान वचन है हमारे सौभाग्य से और धरसेन आचार्य के कारण २५५० वर्ष बाद भी हमे तीर्थंकर के उपदेश सही सलामत मिले है इसीलिए यह दिवस प्रत्येक जैन बंधु ने बड़े उत्साह से मनाना  चाहिए जिनवाणी में महान रहस्यमय जिनेंद्र भगवान का संदेश है इसे हमें पंचम काल के अंत तक पढ़ना है और संभाल कर रखना है साडे अठारह हजार साल तक यदि कोई भव्य जीव आए तो उसे जिनवाणी पढ़कर मुक्ति का मार्ग और सुखी होने का मार्ग मिले यही भावना से हमने जिनवाणी को सदैव पढ़ना, सुनना, पढ़ाना और धर्म का मर्म सरक्षित रखना चाहिए - ShareChat
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🌺जय जिनेन्द्र🙏 - श्रुत पंचमी पर्व महापुराण 90 सलकरण्डक श्रवकाचर gdei जिनवाणी माँ को नमन श्रुत पंचमी पर्व महापुराण 90 सलकरण्डक श्रवकाचर gdei जिनवाणी माँ को नमन - ShareChat
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🙏jain dharm 🙏 - श्रुतपंचमी कल्याण पर्व प्रथमानयोग निज निधि निज में बताई करणानयोग चरणानयाग यह अनन्त उपकार है। द्रव्यानुयोग उसके लिए जिनवाणी माँ को वन्दना शत बार है। श्रुतपंचमी कल्याण पर्व प्रथमानयोग निज निधि निज में बताई करणानयोग चरणानयाग यह अनन्त उपकार है। द्रव्यानुयोग उसके लिए जिनवाणी माँ को वन्दना शत बार है। - ShareChat
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🌺जय जिनेन्द्र🙏 - श्रत पंचमी जैन धर्म के पवित्र ग्रंथ आज लिपीबद्ध हुये मां जिनवाणी की रचना का पावन महापर्व धवला , जयधवला एवं महा धवला ( थवलात्रय ) ग्ंथाफे श्री जी को नमोस्तु  नमोस्तु  রসান रचयिता परम पूज्य आचार्य  ताड़पत्र पर तीर्थकर की दिव्य वाणी लिपिबद्ध करते युगल मुनि पुष्पदंत - भूतबलि।  श्रत पंचमी जैन धर्म के पवित्र ग्रंथ आज लिपीबद्ध हुये मां जिनवाणी की रचना का पावन महापर्व धवला , जयधवला एवं महा धवला ( थवलात्रय ) ग्ंथाफे श्री जी को नमोस्तु  नमोस्तु  রসান रचयिता परम पूज्य आचार्य  ताड़पत्र पर तीर्थकर की दिव्य वाणी लिपिबद्ध करते युगल मुनि पुष्पदंत - भूतबलि। - ShareChat