
md Rahmat sheikh
@469606002
समस्तीपुर जिला के संगठन प्रभारी मो०रहमत (RLM)
26 जनवरी 2026
77 वां Republic Day🇮🇳समस्त देशवासियों को गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं🇮🇳 #❤️Love You ज़िंदगी ❤️ #❤ गुड मॉर्निंग शायरी👍 #💞दिल की धड़कन #💓 मोहब्बत दिल से
26 जनवरी 2026
77 वां Republic Day🇮🇳समस्त देशवासियों को गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं🇮🇳 #☝ मेरे विचार #💞दिल की धड़कन #❤ गुड मॉर्निंग शायरी👍 #💓 मोहब्बत दिल से #❤️Love You ज़िंदगी ❤️
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26 जनवरी 2026
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26 जनवरी 2026
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बरेली जेल के गेट पर खड़ा शख़्स #आज़ाद_ख़ान है, नाम आज़ाद, मगर ज़िंदगी के 25 साल सलाख़ों के पीछे गुज़ार चुका, यह रिहाई इंसाफ़ की जीत नहीं, बल्कि पुलिस, अदालत और प्रशासनिक सिस्टम की शर्मनाक नाकामी का सबूत है।
साल 2001 में मैनपुरी निवासी आज़ाद ख़ान को एक डकैती के मामले में गिरफ़्तार किया गया। न ठोस सबूत थे, न पुख़्ता गवाह, फिर भी जिला अदालत ने उम्रक़ैद सुना दी। एक ग़रीब मज़दूर, जिसके पास न पैसा था न ताक़त, सिस्टम की भेंट चढ़ गया।
दिसंबर 2025 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने साफ़ कहा कि पुलिस आरोप साबित नहीं कर सकी और आज़ाद को बरी कर दिया। लेकिन इसके बाद भी वह जेल में बंद रहा क्योंकि जेल प्रशासन को “रिहाई आदेश नहीं मिला” और एक पुराने मामले में 7,000 रुपये का जुर्माना जमा नहीं हो सका। एक बेगुनाह को जुर्माने के नाम पर एक साल और जेल झेलनी पड़ी।
मीडिया दबाव के बाद आदेश ईमेल से भेजे गए और सामाजिक संस्था ‘छोटी सी आशा’ ने जुर्माना अदा किया। तब जाकर 25 साल बाद आज़ाद जेल से बाहर आ सका।
लेकिन सवाल कायम हैं
गलत गिरफ़्तारी का ज़िम्मेदार कौन?
बिना सबूत सज़ा देने पर जवाबदेही क्यों नहीं?
क्या एक ग़रीब और मुसलमान की क़ीमत आधी ज़िंदगी होती है?
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साल 2022 में अफ्रीका के इन बुजुर्ग ने ऐसा काम किया जिसने हमे सोचने पर मजबूर कर दिया, उम्र के उस मुक़ाम पर, जब लोग आराम और सुकून की तलाश करते हैं, इस बुजुर्ग ने अपनी तमाम जमा पूंजी, यहाँ तक कि घर बार तक बेच डाला, सिर्फ़ इसलिए कि ज़िंदगी में एक बार अल्लाह के घर, काबा शरीफ़ की ज़ियारत कर सकें।
जब वो हरम शरीफ़ पहुँचे तो उनकी आँखें अश्कों से भरी हुई थीं, वो रो-रो कर दुआएँ मांग रहे थे और एक ही बात दोहरा रहे थे, "ऐ मेरे रब, मेरी आरज़ू थी कि मरने से पहले तेरा घर देख लूं, तूने मेरी दुआ सुन ली।"
ये नज़ारा देखने वालों की आँखें भी नम कर गया। सुबहान अल्लाह ऐसी मोहब्बत, ऐसा ईमान, और ऐसी कुर्बानी शायद ही देखने को मिले। #💓 मोहब्बत दिल से #❤ गुड मॉर्निंग शायरी👍 #💞दिल की धड़कन #❤️Love You ज़िंदगी ❤️ #☝ मेरे विचार
फरवरी 2022… ये वही वक्त था जब देश के माहौल में नफ़रत का ज़हर बहुत तेज़ी से फैलाया जा रहा था। कहीं मुसलमान को “नाम पूछ-पूछकर” सड़क पर रोका जा रहा था, कहीं बेगुनाहों को पीटा जा रहा था, और कहीं सिर्फ पहचान के शक में इंसान की इज्ज़त, जान और इमान सबको निशाना बनाया जा रहा था।
इस दौर में “मदद” और “इंसानियत” जैसे लफ्ज़ भी लोगों को पुराने लगने लगे थे।
लेकिन उसी फरवरी 2022 में भोपाल के बरखेड़ी इलाके से एक ऐसी तस्वीर सामने आई जिसने पूरी सोच हिला दी। मोहम्मद महबूब, जो पेशे से कारपेंटर हैं और साधारण जिंदगी जीते हैं उन्होंने वो काम कर दिखाया जो बड़े-बड़े दावे करने वाले भी नहीं कर पाते।
जब एक हिन्दू लड़की स्नेहा गौर रेलवे ट्रैक के पास फँस गई और मालगाड़ी चल पड़ी, तो वहां मौजूद बहुत से लोग सिर्फ तमाशा देखते रहे। लेकिन महबूब तमाशा नहीं बने… वो मदद बने। वो दौड़कर आए, और जान की परवाह किए बिना चलती ट्रेन के नीचे लेट गए, लड़की को अपने हाथों से दबाकर बचाए रखा… और ऊपर से मालगाड़ी के कई डिब्बे गुजर गए।
जरा सोचिए… एक सेकंड की गलती और महबूब की अपनी जिंदगी खत्म हो सकती थी। उनकी 3 साल की बेटी, घरवाले, बूढ़े।मां-बाप… सब पीछे रह जाते।।लेकिन महबूब ने कोई मजहब नहीं देखा उन्होंने सिर्फ एक जान को बचाना देखा।
यही तो सच्चाई है…।जहां कुछ लोग “नाम” पूछकर मारते हैं, वहीं मुस्लिम समाज के लोग अक्सर मदद के नाम पर अपनी जान तक दांव पर लगा देते हैं। #❤️Love You ज़िंदगी ❤️ #❤ गुड मॉर्निंग शायरी👍 #☝ मेरे विचार #💞दिल की धड़कन #💓 मोहब्बत दिल से
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