#SacrificedAll_LostMoksha
God KabirJi Nirvan Diwas
♦️गरीब, काशी करोंत लेत हैं, आन कटावें शीश।
बन-बन भटका खात हैं, पावत ना जगदीश ।।
शास्त्र विरूद्ध साधक नकली-स्वार्थी गुरूओं द्वारा भ्रमित होकर कोई जंगल में जाता है। कोई काशी शहर में करौंत से सिर कटवाने में मुक्ति मानता है। इस प्रकार की व्यर्थ साधना जो शास्त्रोक्त नहीं है, करने से कोई लाभ नहीं होता। #📝गणपति भक्ति स्टेटस🌺#🙏कर्म क्या है❓#🙏गुरु महिमा😇#🙏गीता ज्ञान🛕#🙏शाम की आरती🪔
#SacrificedAll_LostMoksha
God KabirJi Nirvan Diwas
♦️गरीब, काशी करोंत लेत हैं, आन कटावें शीश।
बन-बन भटका खात हैं, पावत ना जगदीश ।।
शास्त्र विरूद्ध साधक नकली-स्वार्थी गुरूओं द्वारा भ्रमित होकर कोई जंगल में जाता है। कोई काशी शहर में करौंत से सिर कटवाने में मुक्ति मानता है। इस प्रकार की व्यर्थ साधना जो शास्त्रोक्त नहीं है, करने से कोई लाभ नहीं होता। #🙏गीता ज्ञान🛕#🙏शाम की आरती🪔#🙏गुरु महिमा😇#🙏कर्म क्या है❓#📝गणपति भक्ति स्टेटस🌺
#SacrificedAll_LostMoksha
God KabirJi Nirvan Diwas
♦️गरीब, काशी करोंत लेत हैं, आन कटावें शीश।
बन-बन भटका खात हैं, पावत ना जगदीश ।।
शास्त्र विरूद्ध साधक नकली-स्वार्थी गुरूओं द्वारा भ्रमित होकर कोई जंगल में जाता है। कोई काशी शहर में करौंत से सिर कटवाने में मुक्ति मानता है। इस प्रकार की व्यर्थ साधना जो शास्त्रोक्त नहीं है, करने से कोई लाभ नहीं होता। #🙏कर्म क्या है❓#📝गणपति भक्ति स्टेटस🌺#🙏गुरु महिमा😇#🙏शाम की आरती🪔#🙏गीता ज्ञान🛕
#SacrificedAll_LostMoksha
God KabirJi Nirvan Diwas
♦️ काशी करौंत काहे लेही, बिना भजन नहीं ढंग रे।
कोटी ग्रंथ का योही अर्थ है, करो साध सत्संग रे।।
मोक्ष प्राप्ति के लिए पूर्ण और सच्चे संत की शरण में जाना अनिवार्य है। इसी का समर्थन श्रीमद्भगवद्गीता भी करती है:
तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया।
उस परम ज्ञान को जानने के लिए तत्वदर्शी संत के पास जाओ, उन्हें दंडवत प्रणाम करो और निष्कपट भाव से सेवा करो। #🙏शाम की आरती🪔#🙏गीता ज्ञान🛕#🙏गुरु महिमा😇#📝गणपति भक्ति स्टेटस🌺#🙏कर्म क्या है❓
#SacrificedAll_LostMoksha
God KabirJi Nirvan Diwas
♦️ काशी करौंत काहे लेही, बिना भजन नहीं ढंग रे।
कोटी ग्रंथ का योही अर्थ है, करो साध सत्संग रे।। #📝गणपति भक्ति स्टेटस🌺#🙏कर्म क्या है❓#🙏गुरु महिमा😇#🙏गीता ज्ञान🛕#🙏शाम की आरती🪔
मोक्ष प्राप्ति के लिए पूर्ण और सच्चे संत की शरण में जाना अनिवार्य है। इसी का समर्थन श्रीमद्भगवद्गीता भी करती है:
तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया।
उस परम ज्ञान को जानने के लिए तत्वदर्शी संत के पास जाओ, उन्हें दंडवत प्रणाम करो और निष्कपट भाव से सेवा करो।